Jun ०३, २०२० ०९:५२ Asia/Kolkata
  • अपने ‘क़ैसर क़ानून’ से सीरिया और इस्लामी प्रतिरोधक मोर्चे को डरा रहे हैं ट्रम्प, अमरीकी राष्ट्रपति को अपने देश की हालत का अंदाज़ा है?

अमरीका की ट्रम्प सरकार एक बार फिर सीरिया और उसके घटकों को डराने की कोशिश कर रही है। अमरीकी कांग्रेस ने गत वर्ष दिसम्बर महीने में एक क़ानून पास किया था जिसे क़ैसर एक्ट कहा जाता है। इस क़ानून को दो हफ़्ते बाद लागू करने का एलान किया गया है।

इस क़ानून का मक़सद सीरिया का गला घोंटना और उसके समर्थकों विशेष रूप से लेबनान, ईरान और रूस को आर्थिक नुक़सान पहुंचाना है। इस क़ानून के निशाने पर वह सारी कंपनियां और लोग हैं जो सीरिया का समर्थन करते हैं या उसके साथ व्यापारिक लेनदेन कर रहे हैं।

 

क़ैसर क़ानून का नाम अमरीकी इंटैलीजेन्स के बहकावे में आकर सीरियाई सेना का साथ छोड़ने वाले सैनिक फ़ोटोग्राफ़र के नाम पर रखा गया है जिन्होंने 55 हज़ार तसवीरें अमरीकी इंटैलीजेन्स को दीं और इन तसवीरों के माध्यम से यह साबित करने की कोशिश की कि सीरिया की जेलों में क़ैदियों को यातनाएं दी जाती हैं। इस फ़ोटोग्राफ़र को अमरीका ने राजनैतिक शरण दी है और उनका कांग्रेस में आना जाना रहता है।

सीरिया पर इस क़ानून का कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि वह कई दशकों से अमरीकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और 9 साल तक चलने वाले गृह युद्ध के दौरान भी उसने अमरीकी प्रतिबंधों को झेल लिया। इस क़ानून का कुछ ख़ास असर ईरान पर भी नहीं होगा और न ही उस बेल्ट पर इसका असर पड़ेगा जो तेहरान से शुरू होकर इराक़ और सीरिया से गुज़रते हुए बैरूत तक पहुंचती है। ईरान ने पिछले 40 साल से अमरीकी प्रतिबंधों का सामना किया है और कर रहा है। इस क़ानून का हो सकता है कि लेबनान पर कुछ असर पड़े क्योंकि लेबनान की धरती पर कुछ धड़े हैं जो सीरिया के ख़िलाफ़ रची जाने वाली साज़िश में शामिल थे और अन्य साज़िशकर्ताओं के साथ मिलकर सीरिया को ध्वस्त कर देने पर तुले हुए थे। सीरिया की एक ही ग़लती थी कि उसने इस्राईल के ग़ैर क़ानूनी क़ब्ज़े को कभी मान्यता नहीं दी और इस्राईल के सामने कभी घुटने नहीं टेके। सीरिया ने ईरान का साथ छोड़ने से भी हमेशा इंकार किया हालांकि उसके सामने अरबों डालर की रिश्वत की भी पेशकश की गई।

ट्रम्प प्रशासन इस क़ानून की मदद से तीन लक्ष्य हासिल करने की कोशिश में है।

पहला लक्ष्य है सीरिया और लेबनान की संयुक्त सीमा को बंद करवाना ताकि इस सीमा से किसी तरह का लेनदेन न होने पाए।

दूसरा लक्ष्य है हिज़्बुल्लाह आंदोलन को निरस्त्र करने के लिए लेबनान पर अधिकतम दबाव डालना और इसके लिए सांप्रदायिकता की आग भड़काने सहित हर तरह की घटिया हरकत करना।

तीसरा लक्ष्य है लेबनान की सरकार पर दबाव डालकर उसे इस्राईल के साथ समुद्री सीमा का इस तरह निर्धारण करने पर मजबूर करना कि इस्राईल को ज़्यादा से ज़्यादा समुद्री संसाधन हासिल हो जाएं और वह लेबनान की गैस के भंडार हड़प ले।

अमरीका इससे पहले भी सीरिया, ईरान और लेबनान के ख़िलाफ़ बहुत से क़ानून पास कर चुका है और बहुत से प्रतिबंध लगा चुका है जो नाकाम रहे अतः यह नया क़ानून भी कुछ भी हासिल नहीं कर पाएगा। बल्कि इसके उल्टे नतीजे निकलेंगे।

ग्लोबल हाक

 

अमरीका ने ईरान पर बेहद कठोर और कमर तोड़ देने वाले प्रतिबंध लगाए तो नतीजे में ईरान बड़ी क्षेत्रीय ताक़त बन गया। ईरान के मिसाइल, पनडुब्बियां, ड्रोन विमान सब कुछ ईरान में ही बनते हैं। यानी अमरीकी प्रतिबंध और नाकाबंदी को आविष्कार की जननी कहना ग़लत न होगा। ईरानी मिसाइल से अमरीकी ग्लोबल हाक ड्रोन का मार गिराया जाना, 442 किलोमीटर ऊंचाई पर अंतरिक्ष में स्थापित होने वाला ईरान का सैनिक सैटेलाइट, वेनेज़ोएला जाने वाले ईरान के पांच तेल टैंकर यह सब कुछ इस विचार की पुष्टि करने वाले उदाहरण हैं जो हमने पेश किया है।

अमरीका अब पहले जैसा अमरीका नहीं रहा। वह कोरोना महामारी से जंग हार चुका है वह नस्लवाद के ख़िलाफ़ पूरे देश में जारी प्रदर्शनों के सामने नाकाम हो चुका है। अब हालत यह है कि अमरीका एक पराजय पर कराह रहा होता है कि इसी बीच दूसरी पराजय उस पर सवार हो जाती है। अब तो नस्लवाद और दूसरी सैकड़ों समस्याओं के कारण अमरीका की अखंडता तक ख़तरे में पड़ गई है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अमरीका उसी गढ़े में जा गिरा है जो उसने दूसरों के लिए खोदा था।

रह गई बात सीरिया की तो उसने पहले भी अंतर्राष्ट्रीय साज़िश को नाकाम बनाया और 9 साल तक भयानक युद्ध का कामयाबी से सामना किया तो क़ैसर क़ानून का मुक़ाबला करना उसके लिए कोई कठिन बात नहीं होगी।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

 

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