Jul ०७, २०२० ०९:५५ Asia/Kolkata
  • क्या सऊदी अरब, बहरैन को निगल लेगा?

ब्रिटिश पत्रकार राबर्ट फ़िस्क ने सन 2011 में इंडिपेंडेंट में लिखा था कि बहरैन अब आले ख़लीफ़ा धरती नहीं है बल्कि अब वे सऊदी अरब का इलाक़ा और उसका एक राज्य है।

कई बरस बीत जाने के बाद सभी को यह बात समझ में आ गई है कि फ़िस्क की भविष्यवाणी बिल्कुल सही थी क्योंकि इस समय सभी राजनैतिक, आर्थिक, सुरक्षा, सामरिक यहां तक कि सामाजिक मामलों में भी बहरैन, पूरी तरह से सऊदी अरब के आदेशों का पालन कर रहा है और उसमें स्वाधीनता की झलक भी दिखाई नहीं देती। सऊदी अरब और बहरैन के बिके हुए लेखकों का कहना है कि इसका कारण यह है कि बहरैन भौगोलिक, राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर बहुत छोटा है लेकिन सच्चाई यह है कि बहरैन में एक संप्रभु व स्वाधीन देश में बदलने के सभी आवश्यक गुण पाए जाते हैं लेकिन दो कारणों से वह यह काम नहीं कर सकता। पहली वजह, बहरैन को निगलने की सऊदी अरब की दीर्घकालीन योजना है और दूसरी, अपनी जनता से आले ख़लीफ़ा की दूरी है और यही वजह है कि यह परिवार अपने सिंहासन की रक्षा के लिए आले सऊद के सामने हाथ फैलाने पर विवश हुआ है।

 

सऊदी अरब और बहरैन के बीच मालिक व दास का जो रिश्ता है वह दुनिया में कहीं भी नहीं दिखाई देता। इस बात को समझने के लिए कुछ बातें ध्यान योग्य हैंः

  • सन 1963 में सऊदी अरब और बहरैन की संयुक्त जल सीमा में अबू साफ़ा ऑयल फ़ील्ड का पता चला लेकिन रियाज़ ने उसे हड़प लिया और वह इसके तेल की बिक्री से होने वाले लाभ का केवल कुछ प्रतिशत बहरैन को देता है जबकि इस ऑयल फ़ील्ड का बड़ा भाग बहरैन में है।
  • 80 के दशक में सऊदी अरब ने अपने हितों के अंतर्गत बहरैन के साथ अपनी सीमाओं का रेखांकन किया और बहरैन के अलबय्येना द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया।
  • 90 के दशक में बहरैनी जनता के आंदोलन को कुचलने के लिए सऊदी अरब ने बड़ी संख्या में अपने सैनिकों व सुरक्षा बलों को बहरैन भेजा जबकि इस आंदोलन की मांगों में 1973 के संविधान को लागू करने, अपने भविष्य निर्धारण में जनता की भागीदारी और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने जैसी बातें शामिल थीं लेकिन आले सऊद ने इस क़बायली प्रदर्शनों का नाम देकर बड़ी निर्दयता से कुचल दिया।
  • सन 2011 में सऊदी अबर के सैनिकों ने खुल कर बहरैन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और अत्याचार, भेदभाव व वंशवादी सरकार के ख़िलाफ़ बहरैनी जनता के आंदोलन को कुचलने की कोशिश की लेकिन यह आंदोलन जारी है। सऊदी बल सैकड़ों बहरैनी नागरिकों की हत्या कर चुके हैं जबकि हज़ारों अन्य को जेलों में ठूंस दिया गया है।

 

बहरैनी शासक और आले ख़लीफ़ा परिवार, अपने देश की जनता के साथ न्याय, बराबरी और मानवता के सम्मान के आधार पर रिश्ता बनाने में विफल होने और वंशवाद, भेदभाव और अत्याचारपूर्ण नीतियों को प्राथमिकता देने की वजह से सऊदी अरब का पिट्ठू बन चुका है और उसने बहरैन को रियाज़ की ओर से निगलने का मार्ग समतल कर दिया है। अलबत्ता आले सऊद यह बात समझ नहीं पा रहा है कि राष्ट्रों को निगलने का ज़माना गुज़र चुका है।

 

अमरीका अपनी असीम शक्ति के बावजूद उन राष्ट्रों के सामने बुरी तरह परास्त हो चुका है जो स्वतंत्रता के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का संकल्प रखते हैं। इस आधार पर न तो सऊदी अरब, अमरीका से बड़ा है कि बहरैनी राष्ट्र को निगल सके और न बहरैनी जनता अपने देश और अपनी मातृभूमिक की रक्षा में अक्षम है। आले ख़लीफ़ा व अन्य अरब शासकों को समझ लेना चाहिए कि सऊदी अरब और अमरीका उनके शासन को नहीं बचा सकते और न ही वे हथियारों के बल पर अपने सिंहासन की रक्षा कर सकते हैं क्योंकि राष्ट्र जीवित हैं। (HN)

ताज़ातरीन ख़बरों, समीक्षाओं और आर्टिकल्ज़ के लिए हमारा फ़ेसबुक पेज लाइक कीजिए!

हमारा व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए क्लिक कीजिए

टैग्स

कमेंट्स