Jul ११, २०२० २२:१५ Asia/Kolkata
  • इराक़ में हो रही है नयी साज़िश, नये डेथ स्क्वाड का गठन, इराक़ियों को आपस में भिड़ाने और लेबनान का इतिहास दोहराने की कोशिश

राजनैतिक टीकाकारों का कहना है कि सुरक्षा मामलों के टीकाकार हेशाम अलहाशेमी की हत्या के बारे में बिना जांच पड़ताल के ही अमरीका द्वारा दूसरों पर आरोप लगाया जाना, इराक़ में नये मतभेद को हवा देने के कार्यक्रम का ही भाग है।

राजनैतिक टीकाकारों का यह कहना है कि घटना के बाद अमरीका ने बिना सबूत और प्रमाण के इराक़ी हिज़्बुल्लाह पर आरोप लगा दिया और उसने वही चाल चली जो लेबनान में पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक़ हरीरी की हत्या के समय चली थी।  उस समय भी अमरीका ने बिना किसी सबूत और प्रमाण के हिज़्बुल्लाह पर हत्या का आरोप लगा दिया था जबकि रफ़ीक़ हरीरी की हत्या से सबसे ज़्यादा नुक़सान हिज़्बुल्लाह को ही हुआ।

राजनैतिक टीकाकारों का यह मानना है कि हेशाम अलहाशेमी की ओर से हिज़्बुल्लाह और स्वयं सेवी बलों को कोई ख़तरा नहीं था और इस हत्या से केवल उस पक्ष को फ़ायदा हो सकता है जो इराक़ में अपनी सैन्य उपस्थिति के लिए औचित्य पेश करने और इराक़ के साथ लंबा सैन्य समझौता करने के प्रयास में है और जिसने दाइश को फिर से सक्रिय किया है।

जी हां अमरीका ही लक्ष्यपूर्ण तरीक़े से प्रदर्शनों द्वारा इराक़ में तनाव और अशांति पैदा करने के प्रयास में है। शक की सूई अमरीका की ओर घूमती है जिसने जनरल क़ासिम सुलैमानी और जनरल अबू महदी अलमुहन्दिस की हत्या की।

राजनैतिक टीकाकार इस बात पर बल देते हैं कि यह हत्या भी उसी तरह की गयी है जैसी वर्ष 2004 से 2006 में इराक़ में हुआ करती थीं।  उस समय अमरीकी जान निग्रो पोन्टी ने इराक़ में डेथ स्क्वाड बनाया था जिसने इराक़ में मतभेद को हवा देने के लिए कई शीया और सुन्नी नेताओं की हत्याएं की थीं।

सुरक्षा ट्रेनिंग के बहाने इराक़ में बहुत सी अमरीकी, इस्राईली, सऊदी और इमाराती कंपनियां आईं ताकि इराक़ में रक्षा और सुरक्षा ट्रेनिंग के चरण पूरे करें और कुछ टीकाकार इन्हीं कंपनियों पर हेशाम अलहाशेमी की हत्या का आरोप लगा रहे हैं।

टीकाकारों का यह भी कहना है कि अगर दाइश ने हाशेमी की हत्या की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली है तब भी यह गुट ख़ुद ही अमरीका की एक हथकंडा है जिसका समर्थन सऊदी कर रहा है। सऊदी अरब ने ही हज़ारों दाइश के आतंकियों को इराक़ भेजा। हमको दक्षिणी इराक़ के बूका जेल को नहीं भूलना चाहिए जिसे अमरीका ने दाइश का ट्रेनिंग केन्द्र बना दिया था और अबू बक्र अलबग़दादी जैसे आतंकी इसी ट्रेनिंग सेन्टर से निकले हुए हैं।

दूसरी ओर इराक़ के क़ानूनी मामलों के टीकाकारों ने हाशेमी की हत्या के लिए आंतरिक और विदेशी संदेशों की सूचना दी है। उनका यह मानना है कि हाशेमी की हत्या से जिन लोगों को लाभ होगा वह इराक़ में दंगे फ़साद और अराजकता फैलने के इच्छुक हैं और उनका यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं कि इराक़ अपने आंतरिक और बाहरी मामलों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है।

इन टीकाकारों का यह मानना है कि हाशेमी की हत्या से जिन पक्षों को फ़ायदा हो रहा है वह इराक़ की क्षेत्रीय भूमिका को सीमित करने और क्षेत्रीय और राजनैतिक तनाव की ओर खींचने के प्रयास में हैं। जब से मुस्तफ़ा अलकाज़ेमी ने सत्ता की बागडोर संभाली है और उन्होंने अपने एजेन्डे को चार आधार पर पेश किया इनमें आर्थिक संकट, कोरोना वायरस, जल्द चुनाव का आयोजन और सार्वजनिक सुरक्षा थी जबकि ख़ुद काज़ेमी का ही कहना है कि इन मुद्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।  

क़ानूनी मामलों के टीकाकारों का यह ख़याल है कि नये संकट सिर उठाने वाले हैं और यह हत्या उन्हीं संकटों में से एक है। क्या हत्या की नई शैली उन्हीं संकटों में से है जिसका इराक़ को सामना है और यह संकट जारी रहेगा? हाशेमी की हत्या का एक कारण, आतंकवादी गुट दाइश के बारे में उनकी बेबाक टिप्पणियां और दाइश के विनाश में उनकी अहम भूमिका है। इराक़ में यह मुहावरा मशहूर है कि अगर डरते हो तो बात न करो और अगर कह दिया तो न डरो, वह बिना किसी भय के चैनलों पर बयान दिया करते थे।

क़ानूनी मामलों के टीकाकारों का कहना है कि अमरीका इस हत्या और अज्ञात जगहों से बग़दाद में अपने दूतावास पर मीज़ाइल हमलों और इन कार्यवाहियों का आरोप स्वयं सेवी बलों पर लगाकर अपने सैनिकों को इराक़ में बाक़ी रखने का औचित्य तलाश कर रहा है।

राजनैतिक मामलों के टीकाकारों का यह ख़याल है कि इस हत्या से सबसे ज़्यादा फ़ायदा अमरीका को हो रहा है क्योंकि वह गुप्त समझौते की कोशिश में है और हर क़ीमत पर यह समझौता चाहता है। अब यहां पर सवाल यह पैदा होता है कि अमरीका स्वयं सेवी बलों पर ही हमेशा आरोप क्यों लगाता है और उसने इस हत्या और अमरीकी छावनियों पर बमबारी के बारे में थोड़ा सा भी शक दाइश पर क्यों नहीं किया? (AK)

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