Aug ०४, २०२० २०:५६ Asia/Kolkata
  •  मिस्र अपने दो करीबी दोस्तों सऊदी अरब और यूएई की तरह ईरान का दुश्मन नहीं? मिस्री समाचार पत्र ने लिया जायज़ा

ईरान के खिलाफ सऊदी अरब और यूएई की दुश्मनी किसी से छुपी नहीं है लेकिन इन दोनों देशों का मुख्य घटक मिस्र ईरान के सामने इस तरह से खड़ा नज़र नहीं आता इसकी क्या वजह है ? फरास अबू हिलाल ने बताया है।

इस बात की कोई ज़रूरत नहीं कि हम यह याद दिलाएं कि किस तरह से मिस्र के सैन्य अफसर बश्शार असद की सरकार की मदद के लिए गये थे और किस तरह उन्होंने सन 2013 में बश्शार असद का साथ दिया और इस तरह से व्यवहारिक रूप से वह ईरानियों के साथ खड़े हुए जो बशार असद के सब से बड़े दोस्त हैं।

    सीरिया सरकार की जिस तरह से मिस्र मदद करता है वह वास्तव में सऊदी अरब के रूख से विरोधाभास रखता है जिसने औपचारिक रूप से बश्शार असद सरकार से सारे संबंध तोड़ लिये हैं, इसी तरह सीरिया के बारे में मिस्र का रुख, यूएईए के रुख से भी मेल नहीं खाता। यह सही है कि अबूधाबी ने सीरिया की तरफ धीरे धीरे बढ़ना शुरु कर दिया है और सऊदी अरब अब बश्शार असद की सरकार गिराने का व्यवहारिक रूप से समर्थन नहीं करता लेकिन यह दोनों देश, बश्शार असद को हटाए बिना और ईरान की जीत हुए बिना ही सीरिया के संकट का अंत चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि एक राजनीतिक समाधान तक पहुंचे जिससे उनके घटकों को सीरिया में भूमिका अदा करने का अवसर मिले।  मतलब यह कि बश्शार असद यह वादा करें कि वह सीरिया में ईरान की भूमिका को निंयत्रित करेंगे और यह वही बिन्दु है जहां सीरिया के बारे में मिस्र और सऊदी अरब के रुख में टकराव होता है, मिस्र की ओर से बश्शार असद का व्यापक समर्थन, सऊदी अरब और यूएईए के रूख से विरोधाभास रखता है जबकि मिस्र, यूएई और सऊदी अरब बेहद करीबी घटक हैं।

सऊदी अरब मिस्र को अभी तक इस्तेमाल नहीं कर पाया 

 

    सीरिया संकट के बारे में मिस्र की अस्सीसी सरकार का रुख स्पष्ट है। मिस्र किसी भी विद्रोह और सरकार पलटने की कोशिश का विरोधी है क्योंकि इस तरह के विद्रोह की सफलता, अस्सीसी सरकार के खिलाफ विद्रोह को प्रोत्साहन दे सकती है लेकिन इसी दौरान, यमन में सऊदी अरब के समर्थन का मिस्र का रुख हैरत में डालने वाला है और पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है।

    अस्सीसी के नेतृत्व में मिस्र ने यमन युद्ध के बारे में विवादस्पद रुख अपनाया है उसने फार्स की खाड़ी के अधिकांश देशों की भांति हादी सरकार के समर्थन की तो घोषणा की लेकिन इन देशों  की तरह अदन में अपना राजदूत नहीं भेजा। इसके साथ ही उसके एक प्रतिनिधि मंडल ने हौसियों से भेंट की और अली अब्दुल्लाह सालेह के खिलाफ उनका समर्थन भी किया।

     यमन और सीरिया के बारे में मिस्र का यह परस्पर विरोधी रुख एसी दशा में है कि जब सऊदी अरब और यूएई ने अस्सीसी की भारी आर्थिक मदद भी की है और यही वह दो देश हैं जिन्हों ने सन 2013 के विद्रोह को सब से पहले मान्यता दी और अस्सीसी सरकार को दसियों अरब डालर की मदद दी लेकिन सवाल यह है कि अस्सीसी क्यों ईरान के बारे में अपने इन मालदार मित्रों के सामने खड़े हो गये हैं?

    हमारे ख्याल में सब से पहली वजह यह है कि मिस्र की यह बड़ी कोशिश है कि आर्थिक मदद का बदला राजनीति के मैदान में दे। इसी लिए अगर सऊदी अरब मिस्र को ईरान के सामने खड़ा करना चाहता है तो उसे मिस्र को एक भारी भरकम आर्थिक मदद देना होगी जो किंग सलमान अभी तक नहीं दे पाए हैं।

    दूसरी वजह यह है कि मिस्र में विद्रोह के बाद एक विदेश नीति रही है और वह मुस्लिम ब्रदरहुड से संघर्ष है। अस्सीसी किसी भी दशा में मुस्लिम ब्रदरहुड की किसी भी अरब देश  में सफलता सहन नहीं कर सकते इसी लिए वह यमन में हौसियों के विरोधी मोर्चे से नहीं जुड़ सकते क्योंकि इस मोर्चे में मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध रखने वाले धड़े भी मौजूद हैं। इसी तरह मिस्र के राष्ट्रपति, बश्शार असद को उन संगठनों के सामने हारता नहीं देख सकते जिनमें से अधिकांश लोग कट्टरपंथी इस्लाम वादी हैं।

मिस्र वास्तव में अपनी क्षेत्रीय पोशीज़न को फिर से प्राप्त करने का इच्छुक है और सऊदी अरब और यूएई भी मिस्र की पोज़ीशन को तुर्की और ईरान को लगाम कसने के लिए प्रयोग करना चाहते हैं। अरब जगत में भी यह इच्छा है कि मिस्र क्षेत्र के नेतृत्व का भार उठाए और यह उसी समय होगा जब मिस्र में एक मज़बूत सरकार बनेगी लेकिन विचारधारा से वंचित एक सरकार मिस्र को उस पोज़ीशन पर कैसे पहुंचा सकती है जिसके वह योग्य है?  Q.A

ताज़ातरीन ख़बरों, समीक्षाओं और आर्टिकल्ज़ के लिए हमारा फ़ेसबुक पेज लाइक कीजिए!

हमारा व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए क्लिक कीजिए

टैग्स

कमेंट्स