Aug ०५, २०२० २०:४८ Asia/Kolkata
  •  अमरीका और सऊदी अरब ने क्यों इराकी प्रधानमंत्री को अपने यहां आने से रोका? क्या थी अमरीका की मांग? रूसी न्यूज़ एजेन्सी ने दिया ब्योरा

रूसी न्यूज़ एजेन्सी स्पूतनिक ने इराक़ के प्रधानमंत्री अलकाज़ेमी के लिए कठिन परिस्थितियों का सटीक रूप से जायज़ा लिया है जो पढ़ने योग्य है।

         हालांकि इराक़ के प्रधानमंत्री मुस्तफा अलकाज़ेमी,  अमरीका और सऊदी अरब से निकट समझे जाते हैं कार्यक्रम यह था कि वह ईरान के साथ इन दोनों देशों की यात्रा करें मगर वह केवल ईरान की ही यात्रा कर पाए।

     सऊदी अरब ने अलकाज़ेमी की यात्रा से एक दिन पहले किंग सलमान की बीमारी का बहाना बना कर उनकी यात्रा स्थगित कर दी और अमरीकियों  ने कहा कि वह स्टैंडबाई हैं और फिलहाल अलकाज़ेमी को बुलाने का उनका इरादा नहीं। ऐसा लगता है कि वह अलकाज़ेमी की अमरीका यात्रा से पहले अपनी कुछ मांगें उनसे मनवाने चाहते हैं और उनकी मांगों को पूरा करने की ही दशा में अलकाज़ेमी अमरीका की यात्रा कर सकते हैं जबकि ईरानियों  ने बिना किसी शर्त के अपने देश में अलकाज़ेमी की मेज़बानी की। हालांकि अलकाज़ेमी ने इराक़ में ईरान और ईरान के मित्रों के खिलाफ कुछ क़दम उठाए हैं लेकिन ईरानियों ने खुले दिल से उनका स्वागत किया ताकि दुश्मनों की साज़िशें नाकाम हो जाएं और अलकाज़ेमी को भी यह समझा सकें कि वह सऊदी अरब और अमरीका से जितने भी निकट हों, वह इराक़ी शिया मुसलमानों का हिस्सा हैं और उनकी शरणस्थली ईरान ही है।

 

     अमरीकी इराक़ के प्रधानमंत्री से यह चाहते हैं कि वह ईरान की आर्थिक घेराबंदी में उनके साथ सहयोग  करें और ईरान के साथ व्यापार के सभी रास्ते बंद कर दें लेकिन अलकाज़ेमी को बहुत अच्छी तरह से मालूम है कि यह संभव नहीं है और इसी तरह उन्हें रणनैतिक संतुलन के लिए भी अपने सभी पड़ोसियों के साथ आर्थिक सहयोग की ज़रूरत है।

     इराक़ और तुर्की के बीच 20 अरब डालर का व्यापार होता है जबकि ईरान और इराक़ के बीच मात्र 5 अरब डालर का व्यापार होता है जबकि फार्स की खाड़ी के तटवर्ती अरब देशों से इराक़ का व्यापार मात्र एक अरब डालर है हालांकि इन देशों को सद्दाम के काल से ही विशिष्टता प्राप्त थी और अगर चाहते तो बड़ी सरलता से तुर्की और ईरान को बहुत पीछे छोड़ चुके होते क्योंकि इन देशों से इराक़ आयात होने वाले सामानों पर सीमा शुल्क बहुत ही कम है लेकिन बात अस्ल में यह है कि इन देशों को  पास न तो एसे सामान हैं जिनका वह इराक़ को निर्यात कर सकें और न ही उन्हें इराक़ के साथ व्यापार में कोई रूचि है जिसकी वजह इराक़ से इन अरब देशों की पुरानी दुश्मनी है जिसकी वजह से वह इराक़ के साथ व्यापार करके उसका भला करना नहीं चाहते लेकिन इसके बावजूद जो यह देश इराक़ के साथ व्यापक स्तर पर आर्थिक व राजनीतिक  संबंधों के लिए यह शर्त रखते हैं कि इराक़ ईरान के साथ राजनैतिक संबंध बेहद सीमित कर ले तो वास्तव में यह भी एक जाल ही है जिसका इराक़ को बहुत अधिक नुकसान पहुंच सकता है क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि अगर इराकी, इन अरब देशों की इस मांग को मान लें तो क्या गारंटी है कि इन देशों के अरब निवेशक, इराक़ में ईरानियों के निवेश की जगह  ले लेंगें?

     इस बीच यह भी यकीनी है कि इराक़ से अरबों की मांग की सूचि, अमरीका की सूचि से छोटी है। अमरीका तो इराक़ से बहुत  कुछ मांग रहा है। अमरीकी यह चाहते हैं कि इराक़ फिर से ईरान विरोधी मोर्चे का सदस्य बने और इसी तरह इराक़ में ईरान समर्थक धड़ों और संगठनों को खत्म कर दे। इसी तरह इराक़ के प्रधानमंत्री अलकाज़ेमी ने जो मध्यावधिक चुनाव की बात की है वह अमरीका और सऊदी अरब की इच्छा है क्योंकि उन्हें लगता है अगले संसदीय चुनाव में वह अपने समर्थकों को जिता सकते हैं।  

     हालांकि इराक़ में प्रधानमंत्री सब से अधिक शक्तिशाली होता है लेकिन संसद से उसकी भिडंत, उसकी के नुकसान में हो सकती है क्योंकि अब भी संसद के पास, प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार है विशेषकर एसी दशा में जब इराक का प्रधानमंत्री एसा कोई काम करे जिससे यह लगे कि इराक़ फिर से तानाशाही की ओर बढ़ रहा है।

     इन सब के साथ इस बात पर भी  ध्यान रखना चाहिए कि अमरीका और सऊदी अरब की ओर से अलकाज़ेमी के समर्थन के बाद, इराक़ में उनका जनाधार और सामाजिक पोज़ीशन कमज़ोर हो जाएगी जबकि उनके अधिक शक्तिशाली नेता, इराक़ की सामाजिक परिस्थितियों की अनदेखी की वजह से सत्ता से बेदखल हो चुके हैं।

     इसी तरह इस बात पर भी ध्यान रहना चाहिए कि अमरीका और सऊदी अरब के लिए उनके मोहरे कभी भी महत्वपूर्ण नहीं रहे और जैसे ही उनको लगता है कि मोहरा पिटने वाला है, बड़ी तेज़ी से उसे छोड़ कर अलग हट जाते हैं ताकि वह एकदम से ही पिट जाए और फिर उठने की ताकत ही न रहे।

     इराक़ के प्रधानमंत्री को  पता है कि वह अमरीकियों की बहुत सी मांगों को किसी भी दशा में पूरी नहीं कर सकते और अगर पूरी करना चाहेंगे तो वह सब कुछ गंवा देंगे और यही वजह है कि उन्होंने अमरीका और सऊदी अरब की बहुत सी मांगों को कम से कम अब तक स्वीकार नहीं किया है और यही वजह है कि इन दोनों देशों  ने उन्हें अपने यहां आने से रोक दिया है। Q.A.

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