Aug १०, २०२० ०८:५० Asia/Kolkata
  • लीबिया, सीरिया और यमन को तबाह करने वाली ताक़तों के निशाने पर अब आ गया है लेबनान, बैरूत धमाके को लेकर मोज़ाम्बीक ने खोले राज़, हिज़्बुल्लाह के लिए फौरन आत्म मंथन ज़रूरी

लेबनान में इस समय हालात विस्फोटक हो चुके हैं और यह हालात बैरूत विस्फोट से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं। प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। सरकार के मंत्री त्यागपत्रे देते जा रहे हैं और बैरूत धमाकों के शहीदों और घायलों की संख्या बढ़ रही है। देश की अर्थ व्यवस्था पहले से संकट में डूबी हुई थी और अब उसकी हालात और भी ख़राब हो गई है।

यह स्थिति जारी नहीं रह सकती इसमें बुनियादी रूप से सुधार लाना ज़रूरी है। सवाल यह है कि बुनियादी बदलाव आएगा कैसे और बदलाव का यह मिशन संभालेगा कौन?

इस समय तीन धड़े हैं जो बुनियादी बदलाव के लिए कोशिश कर रहे हैं। लक्ष्य तीनों का एक है लेकिन रास्ते अलग अलग हैं।

एक धड़ा चाहता है कि ताक़त के इस्तेमाल से बदलाव हो और बाहरी ताक़तें लेबनान के पटल पर कूद पड़ें और उनमें भी सबसे आगे अमरीका और इस्राईल हों जबकि लेबनान के भीतर पहले से सक्रिय यह धड़ा उनका हाथ बटाए।

दूसरा धड़ा चाहता है कि लेबनान की वर्तमान लोकतांत्रिक शक्ल बची रहे संसद में नए युवा चेहरे आएं और भ्रष्ट लोगों को किनारे कर दिया जाए।

तीसरा धड़ा चाहता है कि देश के प्रशासनिक और राजनैतिक ढांचे की वर्तमान शक्ल बची रहे बस इतना बदलाव किया जाए कि भ्रष्टाचार रुक जाए। यह धड़ा चाहता है कि एक अंतरिम सरकार बन जाए ताकि लेबनानियों का आक्रोश शांत हो जाए। बंदरगाह पर काम करने वाले कुछ अधिकारी त्यागपत्र दे दें।

 

प्रधानमंत्री हस्सान दियाब ने कहा कि दो महीने के भीतर मध्यावधिक चुनाव कराए जाएं जिसके नतीजे में नई संसद और नई सरकार बने और संकट के समाधान की प्रक्रिया शुरू हो जाए मगर फौरन कुछ हल्क़ों ने कहना शुरू कर दिया कि चुनाव के क़ानून में बदलाव आना चाहिए और बैरूत घटना की विधिवत जांच कराई जानी चाहिए और दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए। कुछ लोग तथ्यों को सामने लाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय जांच की मांग कर रहे हैं। यह लोग देश के पूरे सिस्टम को संदेह के दायरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं।

हमारे ख़याल में इन सारी धारणाओं और रुजहानों में इस बिंदु को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है कि बैरूत घटना में बाहरी शक्तियों का हाथ हो सकता है। बाहरी शक्तियां इस समय हर संभव अफ़वाह फैला रही हैं ताकि हिज़्बुल्लाह को बदनाम कर सकें।

धमाके के मामले में पहला संदेह इस्राईल पर ही जाता है लेबनान के भीतर अपने घटकों और जासूसों की मदद से इस्राईल को सारी बातों की ख़बर रहती है। क्योंकि लेबनान के भीतर एसे धड़े मौजूद हैं जो इस्राईल को अपना दुशमन नहीं मानते। गुज़रे वर्षों में इन्हीं धड़ों की मदद से इस्राईल ने लेबनान के भीतर बहुत सी जगहों पर जासूसी के उपकरण लगवाए थे और उनके माध्यम से जासूसी कर रहा था। इसके अलावा इस्राईल के ड्रोन विमान रोज़ाना लेबनान की वायु सीमा में घुस जाते हैं। हमें पूरा यक़ीन है कि इस्राईल को अमोनियम नाइट्रेट के भंडार की पूरी जानकारी थी जो पिछले सात साल से बैरूत की बंदरगाह पर रखा हुआ था।

हो सकता है कि कुछ लोग हम पर साज़िश की थ्योरी अपनाने का आरोप लगाएं मगर इसी प्रकार के आरोप हम पर उस समय भी लगाए गए थे जब इराक़ में महाविनाश के हथियारों के दावे करने वालों को हमने झूठा कहा था। बाद में महाविनाश के इन्हीं काल्पनिक हथियारों को बहाना बनाकर इराक़ को तबाह कर दिय गया। इसलिए हमें इस प्रकार के आरोपों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मीडिया की बहुत सी रिपोर्टें हैं जिनमें इस्राईली कमांडरों और अधिकारियों ने धमकियां दी हैं कि वह लेबनान के बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करके रख देंगे।

रविवार को सीएनएन ने मोज़ाम्बीक की उस कंपनी के मालिक से बात की जिसके लिए कथित रूप से अमोनियम नाइट्रेट की यह खेप ले जाई जा रही थी। कंपनी के मालिक का कहना था कि इस खेप को बड़े अजीब ढंग से रोक लिया गया जबकि इसके अलावा सारे शिप निर्धारत शेड्यूल के तहत हमारे पास पहुंचे।

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सबसे पहले यह बात कही कि बैरूत का धमाका किसी हमले का नतीजा है और उनके जनरलों ने उन्हें यह बताया है।

 

धमाके के बाद इस्राईलियों ने जिस तरह आनन फ़ानन में बयान दिए कि इसमें उनका हाथ नहीं है और वह लेबनान के लिए सहायता भेजने को तैयार हैं उससे शक और भी बढ़ जाता है।

हम अपनी बात को समेटते हुए आख़िर में यह कहना चाहते हैं कि इस घटना के बाद अब लेबनान के चंगुल में जकड़ने की साज़िशें तैयार हो चुकी हैं। घटना के शुरु से ही सऊदी और कुछ लेबनानी टीवी चैनलों ने हिज़्बुल्लाह पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। वह ताक़तें हरकत में आ गई हैं जिन्होंने इससे पहले सीरिया को तबाह किया, यमन को तबाह किया और लीबिया की दुर्दशा की ज़िम्मेदार हैं।  

हिज़्बुल्लाह ने अब तक हद से ज़्यादा संयम दिखाया है और देश की एकजुटता के लिए उन धड़ों से सहयोग करना भी गवारा किया जो भ्रष्ट हैं जबकि हिज़्बुल्लाह हर प्रकार के भ्रष्टाचार से पवित्र है। हमें लगता है कि हिज़्बुल्लाह के लिए भी समय आ गया है कि फौरन आत्म मंथन करे।

इस्राईल जिसे अजेय सेना रखने का घमंड था हिज़्बुल्लाह को शिकस्त नहीं दे सका बल्कि दो बार उसे हिज़्बुल्लाह के हाथों पराजित होना पड़ा एक बार सन 2000 में और दूसरी बार 2006 में तो इस बार भी हमें नजीं लगता कि हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ साज़िश को कोई सफलता मिलेगी।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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