Aug १०, २०२० १७:३८ Asia/Kolkata
  • क्या सऊदी अरब एटम बम बना लेगा? खुफिया रिपोर्ट में खुला बड़ा रहस्य

न्यूयार्क टाइम्ज़ ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि अमरीका की खुफिया एजेन्सियां चीन और सऊदी अरब के बीच सहयोग की जांच कर रही हैं ताकि उन्हें इस बात का पता चल सके कि यह सहयोग कहीं सऊदी अरब को परमाणु हथियारों तक तो नहीं पहुंचा देगा?

     अमरीकी अधिकारियों के अनुसार, अमरीका की खुफिया एजेन्सियों ने एक गोपनीय रिपोर्ट तैयार की है जिसका विषय परमाणु ईंधन की पैदावार में सऊदी अरब और चीन के बीच सहयोग है जिसके बारे में अमरीकी खुफिया एजेन्सियों को संदेह है कि सऊदी अरब चीन के सहयोग से कच्चे यूरेनियम की इस तरह से पैदावार कर सकता है जिसे ज़रूरत पड़ने पर संवर्धित करके परमाणु हथियार बनाया जा सके।

     अमरीकी खुफिया एजेन्सी की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ के निकट सौर्य ऊर्जा के एक प्रतिष्ठान के निकट एक साइट का पता चला है जो अभी जल्द ही बन कर तैयार हुई है और उसके बारे में बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि वह सऊदी अरब का अघोषित परमाणु प्रतिष्ठान हो सकता है। इस प्रकार से अघोषित एक इमारत पश्चिमी सऊदी अरब के दूरस्थ क्षेत्र “ अलअला “ में है जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां यलो केक का कारखाना हो सकता है।

     इस विषय पर ईरान ने भी आपत्ति की थी और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि काज़िम गरीबआबादी ने परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी आईएईए से मांग की थी कि वह सऊदी अरब के गुप्त परमाणु कार्यक्रम पर पारदर्शिता दिखाए और एक रिपोर्ट सदस्य देशों को पेश करे।

ईरान के प्रतिनिधि  ने कहा था कि सऊदी अरब के पास कोई सक्रिय परमाणु प्रतिष्ठान नहीं है जो उसे यलो केक की ज़रूरत पड़े  और न ही वह यलो केक बनाने की ताकत रखता है और इन हालात में परमाणु क्षेत्र में सऊदी अरब की गतिविधियां और आईएईए के निरीक्षकों को प्रवेश की अनुमति न देना, सऊदी अरब में एक गोपनीय परमाणु हथियार कार्यक्रम के सिलसिले में चिंता बढ़ा रहे हैं।

अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि सऊदी अरब, अभी इस रास्ते में नया है और खुफिया एजेन्सियों को अभी कोई ठोस सुबूत नहीं मिला है लेकिन अगर सऊदी शासक, परमाणु हथियार बनाने का फैसला कर भी चुके हैं तब भी वहां तक पहुंचने में अभी काफी समय लगेगा। वास्तव में सऊदी अरब पर इस सिलसिले में शक की एक बड़ी वजह चीन के साथ उसका सहयोग है।

 

सऊदी अरब और चीन ने सन 1980 में मिसाइल के क्षेत्र में सहयोग शुरु किया था लेकिन सऊदी अरब कभी नहीं चाहता था कि चीन के साथ मिसाइलों की खरीदारी की बात किसी को पता चले। सन 1999 में सऊदी अरब के तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रिंस सुलतान ने पाकिस्तान में एक प्रयोगशाला का दौरा किया था जहां पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुलक़दीर खान ने यूरेनियम का संवर्धन और उत्तरी कोरिया के नोडोंग मिसाइल का नमूना तैयार किया था।

     सऊदी अरब की ओर से मिसाइलों के मामले प गोपनीयता की बड़ी वजह अमरीका था, सऊदी अरब चाहता था कि अमरीका को समय से पहले पता न चले और सौदा होने के बाद उसे अगर पता भी चला तो वह फिर कुछ नहीं हो सकता।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने एक परमाणु प्रतिष्ठान सहित 7 स्ट्रेटजिक प्रतिष्ठानों का उद्घाटन किया था। सऊदी अरब ने अपने पहले परमाणु प्रतिष्ठान का उदघाटन एसे  समय पर किया जब उसकी अमरीका के साथ इस संदर्भ में वार्ता चल ही रही थी और उसका कोई नतीजा भी नहीं निकला था। सऊदी अरब ने इस तरह से अमरीका को यह संदेश दिया कि वह हर हाल में परमाणु कार्यक्रम चलाने पर आग्रह कर रहा है हालांकि अमरीकियों ने यह तो मान लिया है लेकिन उनका कहना है कि सऊदी अरब को परमाणु प्रतिष्ठान के लिए ज़रूरी हर तकनीक और सामान, केवल अमरीकी कंपनियों से ही लेना होगा।

     सऊदी अरब की परमाणु के क्षेत्र में दिलचस्पी की एक वजह अपनी सुरक्षा के सिलसिले में अमरीका पर पूरा विश्वास न होना भी हो सकती है। ट्रम्प का यह कहना कि सऊदी अरब, अमरीका के बिना एक हफ्ते भी टिक नहीं सकता, भले ही सऊदी अरब की हालात को दर्शाता हो लेकिन इससे सऊदी शासकों में यह विचार भी पैदा करता है कि उन्हें अपनी सुरक्षा क इंतेज़ाम खुद करना चाहिए। ईरान से परमाणु संतुलन बनाए रखना, सऊदी अरब के शासकों में परमाणु क्षेत्र में दिलचस्पी का मुख्य कारण है। मिस्र में हुस्नी मुबारक को बचाने में अमरीका की नाकामी, सीरिया में बार बार की उसकी विफलता और इलाक़े में अमरीका की बढ़ती भूमिका, वह चीज़ें हैं जिनकी वजह से सऊदी अरब, अपनी सुरक्षा को लेकर अमरीका पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करना चाहता। रूस से संपर्क उससे हथियारों की खरीदारी और चीन से मिसाइल की खरीदारी की मुख्य वजह, सऊदी अरब की यह चिंता ही है।

 

     अमरीका का मामला यह है कि वह सऊदी अरब के भविष्य को लेकर चिंता में है इसी लिए वह परमाणु तकनीक देने में असंमजस का शिकार है, हालांकि बिन सलमान अभी एक मालदार दोस्त की तरह अमरीकी सरकार में देखे जाते हैं लेकिन उनके बाद सऊदी अरब का क्या होगा? या वह सऊदी अरब को कहां ले जाकर पटख सकते हैं? यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए अमरीकियों की नज़र में इस प्रकार के सऊदी अरब को बेहद संवेदनशील तकनीक देना खतरनाक क़दम हो सकता है। सऊदी अरब जैसे देशों पर आईएईए दवारा नज़र रखना भी संभव नहीं हैं और अमरीका उनके वादों पर भी भरोसा नहीं कर सकता क्योंकि भारत और इस्रामल की मिसाल सामने हैं जिन्हें परमाणु हथियारों से संबधिंत अमरीका को दिये गये अपने वादों का पालन नहीं किया।

अमरीका यह चाहता है कि सऊदी अरब के साथ एसा समझौता करे जिसकी वजह से सऊदी अरब परमाणु हथियारों की ओर न बढ़ सके मगर अमरीकी सरकार के सामने सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौते में कई बाधाएं हैं जिनमें सब से बड़ी बाधा अमरीकी कांग्रेस है। इन हालात में और अमरीका के साथ परमाणु सहयोग की समस्याओं के बाद सऊदी अरब ने चीन का रुख किया है क्योंकि उसके साथ मिसाइल के क्षेत्र में सहयोग का अनुभव अच्छा रहा है। चीन की भी यह इच्छा है कि वह सऊदी अरब को परमाणु क्षेत्र में में स्वंय पर निर्भर बना ले और फार्स की खाड़ी में परमाणु तकनीक पर अमरीका के एकाधिकार को खत्म कर दे। परमाणु सहयोग द्वारा चीन सऊदी अरब को यह दिखाना चाहता है कि वह उसका भरोसेमंद घटक बन सकता है इस तरह से चीन और भी कई क्षेत्रों में सऊदी अरब से सहयोग कर सकता है।

     चीन फार्स की की खाड़ी के देशों में पैदा होने वाले आधा तेल खुद ही खरीद लेता है और इस इलाक़े में सऊदी अरब तेल का सब से बड़ा उत्पादक देश है। इस तरह से हम देखते हैं कि हालात बड़ी तेज़ी से बदल रहे हैं अब अमरीका की पूरब की ओर नज़र की नीति इन हालात पर क्या प्रभाव डाल सकती है यह तो समय बताएगा। Q.A.

 

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