Aug १२, २०२० १८:०० Asia/Kolkata
  • हसन नसरुल्लाह के पुतले को फांसी का मक़सद? कैसे लेबनान को भट्टी में झोंकने की हो चुकी है तैयारी? किसे सुरक्षित करना है मक़सद, जाने लेबनान संकट के कुछ भयानक पहलु

लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र रायुल यौम में प्रसिद्ध पत्रकार अब्दुल बारी अतवान ने लेबनान संकट का अलग ढंग से जायज़ा लिया है।  


चलें आखिर से शुरु करते हैं, बहुत अधिक विश्लेषण और विस्तार के चक्कर में नहीं पडेंगे, इस बारे में लेबनानी और अरब मीडिया में आजकल बहुत कुछ कहा जा रहा है। हमारा कहना है कि बैरुत धमाके के बाद लेबनान में पैदा होने वाला असंतोष जिसका चरम, हसान दयाब की सरकार के त्याग देने या उससे त्यागपत्र लेने के रूप में नज़र आया, इस देश में भ्रष्ट्र क्रीम वर्ग की सत्ता और उस ताइफ समझौते का अंत कर देगा जो सन 1989 में इस वर्ग को सत्ता में लाने का कारण बना था।

     लेबनानी जनता, अपने देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में वास्तविक सुधार चाहती है जो सरकार पर निर्भर न हो लेकिन अफसोस की बात यह है कि लेबनान में जनता के हाथ में फैसला नहीं है बल्कि विदेशी शक्तियां, विशेषकर अमरीका और इस्राईल और उनके मिले कुछ लेबनानी धड़े, 10 साल पहले सीरिया में किये गये ड्रामे का लेबनान में मंचन चाहते हैं लेकिन जिस तरह से इन ताक़तों को सीरिया में नाकामी मिली उसी तरह से इन्हे लेबनान में भी नाकामी का ही मुंह देखना पड़ेगा, सफल वह होता है जो दूसरों के अंजाम से पाठ ले।

 

 

     सीरिया के लिए तैयार किये गये ड्रामे का मक़सद, दमिश्क सरकार को गिराना था लेकिन लेबनान के लिए जो ड्रामा तैयार किया गया है उसका मक़सद, हिज़्बुल्लाह की सरकार गिराना और अमरीकी शब्दों में हिज़्बुल्लाह का निशस्त्रीकरण है ताकि इस्राईल को शांति मिले , उसके नागरिकों के दिल से डर निकले और इस्राईल को अधिक दिनों तब सुरक्षित रखा जा सके, यह सब इस लिए है क्योंकि लेबनान का प्रतिरोध मोर्चा, अब इस्राईल के अस्तित्व के लिए ही खतरा हो गया है इस लिए अब अमरीका उसकी अनदेखी नहीं कर सकता।

     सीरिया में भी संकट का आरंभ दरआ में प्रदर्शनों से हुआ था, लेबनान में भी यही हो रहा है और जिस तरह से प्रदर्शनों के दौरान, सैयद हसन नसरुल्लाह के पुतले को फांसी दी गयी उससे ही सारी साज़िश का पता चलता है। अस्ल में, सिर, सैयद हसन नसरुल्लाह का चाहिए और बाकी जिन लोगों के पुतलों को फांसी दी गयी थी वह सब भटकाने के लिए है ताकि यह न पता चल सके कि सब कुछ हिज़्बुल्लाह के लिए किया जा रहा है।

     हिंसा और गृहयुद्ध में बदलने वाले अधिकांश प्रदर्शन, शांतिपूर्ण ढंग से और राजनीतिक सुधार  और सामाजिक न्याय की कानूनी मांग के साथ ही आरंभ होते हैं और उन्हें हाइजैक कर लिया जाता है और इसी लिए अंजाम अलग होता है क्योंकि प्रदर्शनकारी जो चाहते हैं और जिसके लिए जान देते हैं, वह विदेशी शक्तियों की इच्छा से बिल्कुल अलग होता है। इस सिलसिले में इराक़, सीरिया और लीबिया में हमें बहुत अच्छा उदाहरण मिल जाएंगे।

 

 

     हम बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि गत दस वर्षों में पूरे इलाक़े के हालात बड़ी तेज़ी से बदले हैं जिन देशों ने सीरिया संकट में सैनिक व व आर्थिक व  राजनीतिक हस्तक्षेप किया था आज वह तेल की आमदनी में कमी और कोरोना वायरस की वजह से आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी संकट में घिरे हैं और स्थानीय युद्धों में बुरी तरह से व्यस्त हैं। सऊदी अरब और यूएई यमन में और तुर्की , लीबिया युद्ध में व्यस्त है लेकिन जब लेबनान में खूनी लड़ाई के पलीते में आग लगाने का आदेश वाशिंग्टन से इन्हें मिलता है तो तत्काल ही इसके लिए बजट विशेष कर दिया जाता है और इसी तरह सांप्रदायिकता की हवा भी चला दी जाती है।

      लेबनान में अभी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को हटाया गया है, कल राष्ट्रपति मिशल औन को हटाया जाएगा और फिर उसके बाद, संसद सभापति की बारी आएगी और इस तरह से लेबनान में राजनीतिक शून्य काल आरंभ हो जाएगा जिसके दौरान हंगामे होंगे, संकट बढ़ेगा और देश का दरवाज़ा, विदेशियों के लिए खुल जाएगा जिसके बाद लेबनान प्राक्सी वार का अखाड़ा बन जाएगा जिसका माहौल कई महीनों से तैयार किया जा रह है इस तरह से लेबनान में एक बेहद खूनी जंग की आहट महसूस हो रही है।

     लेबनान में बहुत तेज़ी से अंतरराष्ट्रीय संगठनों की निगरानी और वर्चस्व की ओर बढ़ रहा है जिसके लिए सरकार न होने का बहाना पेश किया जाएगा और इसकी भी संभावना है कि सब से पहले  वाइट हेलमेट संगठन के लोग पहंचे जो वहीं लेबनान से बेहद करीब सीरिया इदलिब में मौजूद हैं।

अमरीकी राजूदत पर लेबनानी प्रधानमंत्री को धमकाने का आरोग लगा था 

 

 

      लेबनान में एक हफ्ते के भीतर टाइम बम फटने वाला है जिसका धमाका बेहद विनाशकारी होगा, इस टाइम बम का नाम, रफीफ हरीरी की हत्या के बारे में अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले का एलान है जिसके बाद बेहद हिंसक प्रदर्शन हो सकते हैं और सांप्रदायिकता भी भड़क सकती है और उसके एलान को जो स्थगित किया गया था वह बैरुत धमाके में मरने वालों के प्रति संवेदना के लिए नहीं था बल्कि सही समय और भयानक आग भड़काने के लिए माहौल तैयार करने के लिए था।

     हिज़्बुल्लाह अस्ल निशाना है, जैसे सीरियाई सरकार को बनाया गया था, लेकिन यह भी सच्चाई है कि वह निशस्त्रीकरण और अपने खिलाफ हर योजना को नाकाम बना देगा, क्योंकि हिज़्बुल्लाह के हथियार, अपने दुश्मनों के विपरीत, सरकारी सेना के अधिक मज़बूत, उसका देश में जनाधार बेहद मज़बूत है और अपने गठन के 40 वर्षों के दौरान कभी उसके भीतर फूट नहीं पड़ी इसके साथ ही इस इलाक़े में उसके ताकतवर घटक हैं और सब से महत्वपूर्ण यह है कि हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के भीतर जातीय व सांप्रदायिक समीकरणों और सीमाओं से हट कर ईसाई, शिया, सुन्नी और दरुज़ी, हर वर्ग में अपना प्रभाव बनाया है और अगर तायफ समझौता निरस्त होता है तो उसका सब से अधिक लाभ उसे ही मिलेगा क्योंकि उसे तायफ समझौते में दिया गया कोई भी पद नहीं मिलता और उसने हमेशा यही साबित किया है कि अकेले सत्ता में नहीं रहना चाहता यही वजह है कि हिज़्बुल्लाह लेबनान की सरकार बचाने के लिए कई बार अपनी बड़ी बड़ी मांगों से पीछे हट चुका है।

     लेबनान में योग्य लोगों की कमी नहीं है, हर समुदाय में समझदार लोग हैं इस लिए उन्हें तत्काल रूप से आगे आना चाहिए ताकि देश को उस भयानक खाई में गिरने से बचाया जा सके जिस की तरफ अमरीका, इस्राईल, फांस और उसके कुछ अरब घटक ढकेल रहे हैं।

 

 

      अमरीका, इस्राईल और फ्रांस की साज़िश में शामिल लोग और उनके एजेन्ट कान खोल कर हमारी यह नसीहत सुन लें, ज़रा सोच समझ कर आगे बढ़ें, दलदल में कूदने से पहले, सीरिया, इराक़ और लीबिया में इस किस्म की योजनाओं से पाठ लें और यह समझ लें अमरीका और इस्राईल लेबनान में भट्टी में फेंकने की तैयारी कर रहे हैं लेकिन सब यह जान लें आज जिस हिज़्बल्लाह को निशाना बनाया जा रहा है वह सन 2005 के हिज़्बुल्लाह से बहुत अलग है।

     शायद यह याद दिलाना भी लाभदायक हो कि 15 बरसों तक जारी रहने वाले लेबनान के गृहयुद्ध की कड़वी यादें अभी लोगों के दिमाग में मौजूद हैं और यह हिज़्बुल्लाह के जो जियाले हैं न, वह लेबनानी समाज की माला के दाने हैं जिन्हें कोई भी देश, हथियारों के साथ या बिना हथियारों के, किसी जहाज़ पर लाद कर साइप्रेस या ट्यूनेशिया नहीं भेज सकता, बहुत कुछ बदल चुका है, सब देख ही लेंगे। Q.A. साभार, रायुल यौम  

    

 

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