Aug १३, २०२० ११:२३ Asia/Kolkata
  • दो सैनिक अफ़सरों की हत्या के बाद इराक़ भी तुर्की के दुशमनों की सूचि में शामिल, हर किसी को डंक क्यों मार रही है अंकारा सरकार?

इराक़ी कुर्दिस्तान के इलाक़े अरबील के उत्तर में सैनिक ठिकाने पर तुर्की के ड्रोन विमान ने हमला कर दिया जिसमें दो इराक़ी सैनिक अफ़सर मारे गए। इस घटना ने साबित किया कि तुर्की की इन शत्रुतापूर्ण हरकतों के कारण इस देश का कोई भी पड़ोसी अरब देश अब दोस्त नहीं रह गया है।

तुर्क सेनाएं सीरियाई इलाक़ों में घुसी हुई हैं, लीबिया में भी लड़ रही हैं और अब उन्होंने इराक़ की संप्रभुता पर हमला किया है। मिस्र से तुर्की का टकराव कभी भी शुरू हो सकता है। फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के साथ अंकारा की ज़ोरदार ठनी हुई है।

तुर्की की इन नीतियों के कारण अब यह कहा जाने लगा है कि लड़ने और हत्याएं करने के लिए तुर्की को केवल अरब ही दिखाई दे रहे हैं, उसने अरब इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर रखा है। तुर्क नेतृत्व को इस स्थिति के ख़तरनाक परिणामों का शायद अभी अंदाज़ा नहीं है।

इराक़ी सरकार ने अपनी संप्रभुता के इस खुले उल्लंघन की कड़ी आलोचना करते हुए तुर्क रक्षा मंत्री ख़लूसी अकार की बग़दाद यात्रा रद्द कर दी है और इराक़ी विदेश मंत्रालय ने तुर्क राजदूत को तलब कर लिया है। इराक़ी फ़ोर्सेज़ की ओर से सरकार पर दबाव पड़ रहा है कि वह इससे अधिक कड़े क़दम उठाए।

तुर्की ने कुर्द संगठन पीकेके की ओर से किए जाने वाले हमलों को रोकने के उद्देश्य से उत्तरी इराक़ के भीतर दस सैनिक ठिकानों पर अपने सैनिक बिठा रखे हैं। इस संगठन को तुर्की ने आतंकी घोषित किया है। अब इराक़ के भीतर जनता की ओर से मांग बढ़ रही है कि तुर्क सैनिक ठिकानों को तत्काल बंद कर दिया जाए।

तुर्क सरकार का तर्क है कि उत्तरी इराक़ से कुर्द संगठन तुर्की के भीतर हमले करता है और इसी इलाक़े में उसने अपने ठिकाने बना रखे हैं लेकिन इस इलाक़े में तुर्क सेनाएं जो कार्यवाही और हमले करती हैं उनके बारे में इराक़ी सरकार से समन्वय होना ज़रूरी है। एकपक्षीय रूप से इस इलाक़े में कोई भी कार्यवाही नहीं होनी चाहिए।

कोई भी पर्यवेक्षक तुर्की की इस शत्रुतापूर्ण नीति का तर्क नहीं समझ पा रहा है। इन नीतियों के कारण तुर्की के ख़िलाफ़ अरब देश लामबंद होने लगे हैं। जबकि ज़रूरत इस बात की थी कि यह सारे देश मिलकर अमरीका और इस्राईल पर अंकुश लगाते।

तुर्की ने पूर्वोत्तरी सीरिया में कुछ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर रखा है और सीरियाई विद्रोही संगठनों की मदद कर रहा है। तुर्की ने 17 हज़ार लड़ाके लीबिया भेजे हैं और भारी मात्रा में सैनिक उपकरण वहां उतार दिए हैं। तुर्की ने लीबिया के इलाक़े मिस्राता में तट पर सैनिक ठिकाने बनाए हैं, राजधानी त्रिपोली के पश्चिमोत्तर में वतया के इलाक़े में हवाई छावनी बना ली है, सिर्त में भी आगे बढ़ रहा है और जफ़रा में भी सैनिक कार्यवाही कर रहा है। इस सब के बीच यूनान बल्कि शायद यूरोपीय संघ से भी सैनिक टकराव के लिए पर तोल रहा हैं क्योंकि तुर्की ने यूनान के साथ विवाद वाले समुद्री इलाक़े में तेल और गैस के भंडार की खोज शुरू कर दी है। आर्मीनिया और आज़रबाईजान की लड़ाई में भी तुर्की कूद पड़ा है और वह अपने सैनिक आज़रबाइजान भेज रहा है। इस निर्णय से ईरान और रूस नाराज़ हुए हैं।

तुर्की यह सारी सैनिक धमाचौकड़ी उस समय कर रहा है जब इस देश की अर्थ व्यवस्था हांफ रही है।

यह सही है कि तुर्की के पास ताक़तवर सेना है जिसका नैटो के भीतर दूसरा नंबर है लेकिन एक साथ कई मोर्चों पर आग लगा देना और सारे पड़ोसी देशों को अपना दुशमन बना लेना और सीरिया, ईरान, इराक़ और रूस जैसे देशों से दुशमनी मोल लेना कहीं से भी अक़्लमंदी नहीं है।

स्रोतः रायुल यौम

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