Aug १३, २०२० २१:४८ Asia/Kolkata
  • यूएई का इस्राईल को मान्यता देना क्या फ़िलिस्तीनियों और मुसलमानों के साथ विश्वासघात है? या फ़िलिस्तीनियों की ख़ातिर उसे यह कड़वा घूंट पीना पड़ा?

अमरीका की मध्यस्थता में संयुक्त अरब इमारात और इस्राईल के बीच तथाकथित शांति और रिश्ते सामान्य करने की घोषणा, कोई चौंकाने वाली ख़बर नहीं है, इसलिए कि पिछले कुछ वर्षों से फ़ार्स खाड़ी के लगभग सभी अरब देश इस्राईल के साथ कूटनीतिक रिश्तों की स्थापना के लिए आतुर नज़र आ रहे थे।

हां, यह ख़बर फ़िलिस्तीनियों की महत्वाकांक्षाओं और अधिकारों पर एक बड़ा प्रहार ज़रूर है, इसलिए कि ऐसे समय में जब इस्राईल, पहली बार इस्लामी और फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधी मोर्चे के मुक़ाबले में रक्षात्मक पोज़िशन में है, एक अरब और मुस्लिम देश ने इस्राईल को औपचारिकता प्रदान करने की घोषणा करके, ज़ायोनी शासन को ऑक्सीजन प्रदान कर दिया है।

हालांकि फ़िलिस्तीनियों के साथ विश्वासघात और अपने इस ऐतिहासिक ग़लत क़दम को यूएई के अधिकारी फ़िलिस्तीनियों के हित में क़रार देकर, अरब और इस्लामी जगत की नज़रों में धूल झोंकने की कोशिश करेंगे, लेकिन अरब और मुसलमान इतने भी नादान नहीं हैं, जितना अरब देशों पर राज करने वाले यह तानाशाह समझते हैं।

इस्राईल और यूएई के बीच होने वाले समझौते में व्हाइट हाउस में बैठे अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने नटवर लाल की भूमिका अदा करते हुए दावा किया है कि इस समझौते के तहत, ज़ायोनी शासन ने वेस्ट बैंक के एक भाग का इस्राईल में विलय नहीं करने का फ़ैसला किया है।

इस्राईली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने पहली जुलाई को वेस्ट बैंक के 30 प्रतिशत भाग और जॉर्डन वैली को औपचारिक रूप से इस्राईल के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में शामिल करने का एलान किया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव और अमरीका में नवम्बर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की कमज़ोर पोज़ीशन के कारण, इस्राईली प्रधान मंत्री को अपना यह फ़ैसला टालना पड़ा।

हाल ही में ख़ुद नेतनयाहू ने एक बयान में कहा था कि उन्हें अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के कारण क़दम पीछे खींचना पड़े, क्योंकि ट्रम्प जो उनकी इस योजना के सबसे बड़े समर्थक थे, मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनज़र, अब इस क़दम का समर्थन नहीं कर रहे हैं।

दूसरी ओर संयुक्त अरब इमारात के शासक इस्राईल को मान्यता प्रदान करके उससे खुलेआम हर क्षेत्र में सहयोग में विस्तार के लिए आतुर थे। निश्चित रूप से ट्रम्प प्रशासन ने यह मौक़ा ग़नीमत समझा और वेस्ट बैंक का विलय नहीं करने का श्रेय यूएई को दे दिया, ताकि यूएई के शासक फ़िलिस्तीनियों से यह झूठ बोलने का साहस कर सकें कि तुम्हारी ख़ातिर हमें इस्राईल को मान्यता प्रदान करने का यह कड़वा घूंट पीना पड़ा।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ट्वीट करके दुनिया को इस तथाकथित डील की ख़बर दी। वहीं अबू-धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायद ने भी ट्वीट कियाः राष्ट्रपति ट्रम्प और प्रधान मंत्री नेतनयाहू के साथ टेलीफ़ोन पर बातचीत के दौरान, यह समझौता तय पाया कि इस्राईल, अब बाक़ी फ़िलिस्तीनी इलाक़ों का विलय नहीं करेगा।

मोहम्मद बिन ज़ायद बड़ी ही ढिटाई से यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी राजनीतिक और कूटनीतिक दूरदर्शिता ने बाक़ी फ़िलिस्तीनी इलाक़ों को बचा लिया, लेकिन इसके लिए उन्हें यह क़र्बानी देना पड़ी कि इसके बदले में इस्राईल को एक देश के रूप में मान्यता देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यूएई के इस क़दम के बाद, हो सकता है सऊदी अरब समेत फ़ार्स खाड़ी के दूसरे अरब देश भी मोहम्मद बिन ज़ायद का अनुसरण करें और इस्राईल के साथ अपने ख़ुफ़िया संबंधों और सहयोग को सार्वजनिक कर दें।

अगर यह देश ऐसा करते हैं तो इससे अरब और इस्लामी जगत के बीच एक स्पष्ट लकीर खिंच जाएगी, जो इस्राईल के ख़िलाफ़ पिछले 7 दशकों से जारी इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन के लिए सकारात्मक क़दम होगी। इसलिए कि अब फ़िलिस्तीनियों के वास्तविक शुभ चिंतकों और उनके अधिकारों के लिए लड़ने वालों तथा अभी तक इसका पाखंड करने वालों के बीच एक स्पष्ट लकीर खिंच जाएगी और इस्लामी जगत में किसी को यह भ्रम नहीं रहेगा कि कौन किसके साथ है।

इस्राईल के साथ तथाकथित शांति समझौता करने वाला यूएई अब तीसरा अरब देश बन गया है। इससे पहले मिस्र 1979 में और जॉर्डन 1994 में इस्राईल के साथ इसी तरह का शांति समझौता कर चुके हैं। msm

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