Sep १८, २०२० १६:४९ Asia/Kolkata
  • सऊदी अरब में शिया मुसलमानों की क्या हालत है? बिन सलमान शियों को किस तरफ ले जाना चाहते हैं? इटली के एक संगठन की रिपोर्ट

इटली के थिंक टैंक आईएसपीआई के एक लेख में सऊदी अरब में शिया मुसलमानों की स्थिति का जायज़ा लिया है।

साइमन माबून लिखते हैः जब जनवरी 2016 में सऊदी अरब के वरिष्ठ धर्मगुरु शेख निम्र को अन्य 47 बंदियों के साथ मौत की सज़ा दी गयी तो सऊदी अरब के पूर्वी प्रांतों में प्रदर्शन फूट पड़े। अब ऐसा लग रहा है कि सऊदी अरब और इस देश के शिया समुदाय के बीच संबंध अधिक खराब हो रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार सऊदी अरब के पूर्वी प्रांतों के 10 से 15 प्रतिशत नागरिक, शिया मुसलमान हैं जिन्होंने सन 2017 के प्रदर्शनों में भारी संख्या में भाग लिया था।

    पूर्वी सऊदी अरब के अवामिया में पुराने मोहल्ले कुछ इस प्रकार से बने थे कि जहां प्रदर्शनकारी और सशस्त्र गुटों के सदस्य जिनके बारे में आरोप लगाया गया था कि वह ईरान से संबंध रखते हैं, बड़ी आसानी से छुप जाते थे। पूरे इलाक़े में टेढ़ी मेढ़ी और लंबी लबीं गलियां थीं। अन्ततः एक लंबी लड़ाई के बाद इस मोहल्ले को ध्वस्त कर दिया गया और वहां 300 मिलयन डॉलर की लागत से एक काम्पलेक्स बनाया गया।

    सऊदी अरब के पूर्वी प्रान्त के गर्वनर ने आशा प्रकट की है कि इस इलाक़े के व्यवसायिक केन्द्र बनाए जाने से यह इलाक़ा, " आतंकवादियों " का ठिकाना बनने के बजाए, सभ्यता की ओर दरवाज़ा बनेगा। वैसे यह प्रोजेक्ट अस्ल मे अधिक आज्ञापालन करने वाले शिया बनाने के लिए शुरु किया गया था जो वास्तव में सऊदी क्राउन प्रिंस बिन सलमान द्वारा सुधार कार्यक्रमों का हिस्सा था। यह व्यवसायिक केन्द्र, सुधार पैकेज के रूप में था और उसका मक़सद सऊदी अरब में विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। सऊदी अरब की सरकार वीजन – 2030 के नाम से देश मे बड़े पैमाने पर परिवर्तन कर रही है।  

पूर्वी सऊदी अरब में प्रदर्शन

 

    वीजन- 2030 में सऊदी अरब के शिया समुदाय को राष्ट्रवाद की ओर दोबारा लाने की बात की गयी है लेकिन यह सब कुछ उन शिया मुसलमानों के लिए है जो सऊदी अरब सरकार के सामने सिर झुकाते हैं लेकिन सरकार की दमनकारी नीतियां, विरोधी शिया और अन्य विरोधियों के खिलाफ उसी क्रूरता के साथ जारी हैं। इस आधार पर देश से सांप्रदायिकता का अंत सऊदी अरब की नयी नीतियों में विशेष अर्थ रखता है।

        सऊदी अरब के अवामिया क्षेत्र में व्यापक स्तर पर बदलाव सऊदी अरब और शिया समुदाय के मध्य संबंधों में बदलाव का परिणाम है जो निश्चित रूप से सऊदी सरकार और वहाबी धर्मगुरुओं के वर्तमान संबंधों से प्रभावित है। सऊदी शासक,  बहुत दिनों से वहाबी धर्मगुरुओं  के संगठनों से वफादारी और शिया मुसलामनों से समझौता करने के बीच फंसे थे। हालांकि शिया समुदाय और सऊदी शासकों के बीच जिस प्रकार के हिंसा हुई थी उसके मद्देनज़र दोनों पक्षों में संबंधों के सुधार की आशा नहीं थी लेकिन कुछ संगठनों के सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद सकारात्मक बदलाव हुए हैं। इस तरह से  सऊदी अरब में सरकार और शिया गुटों के मध्य अच्छे संबंध नयी आर्थिक संभावनाओं का परिणाम हो सकते हैं जिसका  आधार , तेल पर निर्भरता कम करने की सऊदी अरब की कोशिश है।

    सऊदी अरब में वैचारिक पुनर्निमाण कोई नयी चीज़ नहीं है और सन 1932 में मौजूदा ढांचे की रचना से अब तक उसके पुनर्निमाण की कई बार बात हो चुकी है, पहले धर्म की भूमिका को ध्यान में रखा जाता था लेकिन इस बार राष्ट्रवाद को आधार बनाया गया है।

    इस पूरी प्रक्रिया में ध्यानयोग्य बात, सऊदी अरब में धर्म की भूमिका की दोबारा व्याख्या करना है। इस नयी व्याख्या में सांप्रदायिकता से दूरी पर बल दिया गया है।

    सऊदी अरब का गठन ही, आले सऊद क़बीले और वहाबी धर्मगुरुओं की गठजोड़ के परिणाम में हुआ था। यह सरकारी धर्मगुरु, शिया को कई अपमानजनक नामों से याद करते है। सऊदी अरब में शिया मुसलमानों को अपने धार्मिक संस्कारों की खुली छूट नहीं है और न ही उनकी  मस्जिदों से लाउड स्पीकर पर अज़ान दी जा सकती है। वहाबी धर्मगुरु हमेशा ही शियों पर भांति भांति के आरोप लगा कर  उनके खिलाफ फतवे दिया करते हैं, यहां तक कि सऊछी अरब की धर्मगुरुओं की परिषद के एक सदस्य ने कहा था कि शिया मुसलमान, हमारे भाई नहीं, बल्कि वह शैतान के भाई हैं।

अवामिया मोहल्ले का एक घर 

 

    सऊदी नरेश अब्दुल्लाह के सत्ता काल में शिया राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया और शिया बाहुल्य क्षेत्रों में विकास का कार्य किया गया। सऊदी अरब के इस दिंवगत नरेश ने शिया मुसलमानों के कार्यक्रमों के आयोजन पर लगा प्रतिबंध भी आंशिक रूप से हटा लिया था ताकि धीरे धीरे सरकार और इस देश के शिया समुदाय में विश्वास की बहाली हो लेकिन इन हालात में  भी उनके उत्तराधिकारी के मन में शिया मुसलमानों से बेहद डर था। सन 2015 में सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ सऊदी अरब के नरेश बने और सन 2017  में उनके बेटे बिन सलमान क्राउन प्रिंस बन गये जिसके बाद से शिया मुसलमानों के साथ अच्छे संबंधों और राष्ट्रवाद पर अधिक बल दिया जाने लगा। सऊदी अरब  में नये नये प्रकट होने वाले इस राष्ट्रवाद को, यमन युद्ध, ईरान से प्रतिस्पर्धा और क़तर की घेराबंदी जैसे कुछ कामों से अच्छी तरह समझा जा सकता है। इसके साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सऊदी अरब के नये राजनीतिक नेतृत्व ने इस देश में सुन्नी धर्मगुरुओं की भूमिका कम कर दी है। इन हालात में सऊदी अरब के सामाजिक बदलाव, इस देश की सरकार में बदलाव पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं।

    अब, सऊदी नरेश और क्राउन प्रिंस के आदेश से, सऊदी अरब, दुनिया की भौगोलिक सच्चाइयों और इस्लाम से पहले के राष्ट्रवाद पर अधिक बल दे रहा है जिसके आधार पर , सालेह का मदाइन और अलऊला, संरक्षित पर्यटक स्थल बन गया। इस्लाम से पहले की गौरवाली विरासत,  सऊदी अरब की पहली राजधानी  " दरिया" है जहां मुहम्मद बिन सऊद ने मुहम्मद बिन अब्दुलवह्हाब से भेंट की थी। सऊदी अरब की नयी योजना में पर्यटन को काफी बढ़ावा दिये  जाने की बात की गयी है। सऊदी अरब का न्योम आधुनिक नगर वीजन 2030 का आधार था लेकिन सऊदी अरब के पूर्वी प्रान्तों को भी उससे काफी लाभ हुआ है।

    उदाहरण स्वरूप, " अलखबर" नगर, मध्य पूर्व का वह पहला नगर है जहां 5-G  नेटवर्क बनाया गया। इसके अलावा इस प्रान्त में व्यापक स्तर पर विदेशी निवेश हुआ है।  

 

    बहरहाल सऊदी अरब के शिया मुसलमानों को नये राष्ट्रवाद की मुख्य धारा में लाया जा रहा है लेकिन यह केवल उन्ही शियों के लिए है जो सऊदी अरब की नयी सरकार की नीतियों का समर्थन करते और उसके आदेशों  के सामने सिर झुकाते हैं। पिछले एक दो वर्षों में गद्दार कहे जाने वालों की व्यापक स्तर पर गिरफ्तारी हुई है। इसी तरह अतीत से कम लेकिन अब भी सऊदी अरब के शिया समुदाय के लोगों को  बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया जा रहा है। हालांकि सुधार प्रक्रिया कुल मिलाकर सऊदी अरब के शिया समुदाय के लिए अच्छी रही लेकिन पूर्वी इलाक़ों के शिया नागरिकों को आज भी सऊदी अरब में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

    कुल मिलाकर यह कहा जाना चाहिए कि सऊदी अरब में आश्चर्यजनक बदलाव आ रहा है। सऊदी शासक, अब राष्ट्रवाद का प्रचार कर रहे हैं। अब कोविड-19 और आर्थिक संकट इस प्रक्रिया को किस सीमा तक प्रभावित करेगा यह तो कुछ समय बाद ही पता चलेगा लेकिन यह तो निश्चित है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बिन सलमान की नयी सुधारवादी नीतियों से इस देश के शिया समुदाय की दशा पहले से बेहतर हुई है। Q.A. लेखक के विचारों से पार्स टूडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं।

 

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