Sep २१, २०२० १६:५७ Asia/Kolkata
  • अमरीका, हमेशा से अधिक अकेला! क्या होगा अगर अमरीका व ईरान टकरा गये? अरब देशों का होगा क्या हाल?  रूसी न्यूज़ एजेन्सी का जायज़ा

रूसी न्यूज़ एजेन्सी स्पूतनिक की परशियन सेवा ने एक लेख में ईरान व अमरीका के बीच तनाव का जायज़ा लिया है।

माइक पोम्पियो ने एलान किया है कि ईरान के खिलाफ संयुक्त  राष्ट्र संघ के प्रतिबंध बहाल हो गये हैं। यह प्रतिबंध उन देशों और कपंनियों पर भी लगेंगे जो अमरीकी राष्ट्रपति के आदेश के नहीं मानेंगे।

 

यह अमरीकी सोचते क्या हैं?

     क्या अमरीकी यह सोचते हैं कि सुरक्षा परिषद में वह जो नाम्बिया ने उनका साथ दिया था उसी तरह सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्य भी हैं? या फिर वह सुरक्षा परिषद के सदस्यों को अरब देशों के उन शासकों की तरह समझते हैं तो हर समय अमरीकी राष्ट्रपति के आदेश के पालन के लिए तैयार रहते हैं? अगर अमरीकी राष्ट्रपति के किसी आदेश में इतना असर होता कि उससे ईरानी झुक जाते तो पिछले चालीस वर्षों में न जाने कितनी बार ईरान खत्म हो चुका होता।

     ईरानियों ने वर्षों से औपचारिक रूप से अन्य देशों से हथियार खरीदना बंद कर रखा है और अमरीका यहां तक कि सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों के बावजूद जब भी ईरान को ज़रूरत महसूस हुई है उसने अपनी ज़रूरत का हथियार खरीदा है लेकिन आज तो वह खुद हथियार बनाता है और अपनी सुरक्षा लिए बहुत से ज़रूरी हथियार खुद ही बनाता है।

     वह  एक सच्चाई जिस पर न मिस्टर ट्रम्प ध्यान दे रहे हैं और नही उनकी टीम,  यह है कि ईरान पर हथियारों के प्रतिबंध रहे या न रहें, उससे ईरान पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ईरानियों के पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है, उन्हें प्रतिबंधों के साथ जीने की आदत पड़ गयी है और ईरानी विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ के अनुसार ईरानी, अमरीकी प्रतिबंधों  को चकमा देने में दक्ष हो चुके हैं।

     अमरीकियों को यह समझना चाहिए कि वह जितना प्रतिबंधों का हथकंडा प्रयोग करेंगे अन्य देशों की नज़रों में उतने ही अविश्वस्नीय बनते जाएंगे क्योंकि अन्य देषों में यह सोच मज़बूत होगी कि अमरीका कल को उनके साथ ही यही व्यवहार कर सकता है।

अगर अमरीकी यह सोचते हैं कि चूंकि ट्रम्प ने आदेश दे दिया है इस लिए अब ईरानी किसी देश से हथियार खरीदने की हिम्मत नहीं करेंगे तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं।

फार्स की खाड़ी में ईरानी सैनिक

 

     ईरानी, अमरीका के साथ व्यापार करने वाली कपंनियों से किसी प्रकार का लेनदेन ही नहीं रखते और यह आज से नहीं बल्कि कई वर्षों से है... तो ट्रम्प के आदेश का उन पर कोई असर नहीं होगा, विशेष कर इस लिए भी हालिया कुछ दशकों  के दौरान ईरानियों ने अपनी ज़रूरत के हथियार विभिन्न चैनलों से जुटाए हैं या फिर स्वंय ही बना लिये हैं और यही वजह है कि आज अमरीका और उसके घटक, ईरान पर हमला करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं और इसी से यह भी पता चलता है कि ईरान के पास जो हथियार हैं वह कैसे हैं? यह सही है कि अभी ईरानियों के पास रक्षा के लिए हथियार अधिक हैं और हमले के लिए प्रयोग होने वाले हथियार कम हैं तो उसकी वजह भी यही है कि ईरानियों ने यही चाहा है और उनकी कोशिश रही है कि पहले अपनी सुरक्षा को मज़बूत बनाएं।

     जहां तक  यह कहा जा रहा है कि अमरीका, अब ईरानी समुद्री जहाज़ों  को  रोक कर तलाशी लेगा और शक्ति प्रयोग करेगा तो यह भी बहुत बड़ी गलतफहमी है।

     ईरानियों ने अभी हालिया एक दो बरसों के दौरान ही यह साबित कर दिया है कि उन्हें दुनिया की किसी भी ताक़त से टकराने में तनिक भी संकोच नहीं और ज़रूरत पड़ने पर वह पूरी तरह से तैयार रहते हैं और सही जगह  पर सही समय पर एसा काम करते हैं कि दूसरा पक्ष बिल्कुल विवश नज़र आने लगता है।

     अमरीका के राजनेता और रणनीतिकार बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि ईरान के पास कितनी शक्ति है और इलाक़े में मौजूद अमरीकी सैनिकों की स्थिति क्या है?

     इस समय इलाक़े में मौजूद अमरीका की 240 छावनियों पर ईरानियों की कड़ी नज़र है इसके अलावा, अमरीकी युद्धपोत और समुद्री जहाज़ भी इलाक़े में आते जाते रहते हैं और तमाम बड़े दावों के बावजूद अमरीका अपनी सभी छावनियों और की सुरक्षा नहीं कर सकता और अमरीकी सैनिकों का कहना है कि ईरानियों को अच्छी तरह से मालूम है कि कब अमरीका की कौन सी छावनी को निशाना बनाना है।

     हर रोज़ फार्स की खाड़ी और ओमान सागर तथा हिन्द महासागर मे दसियों अमरीकी व्यापारिक जहाज़ आते जाते हैं तो अगर अमरीकी किसी ईरानी जहाज़ का रास्ता रोकना चाहेंगे तो ईरानी भी दसियों अमरीकी जहाज़ों को पकड़ लेंगे और अगर जैसा कि ईरान की विदेश नीतिय की रणनैतिक परिषद के प्रमुख कमाल खर्राज़ी ने कहा है, ईरान सयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र के अनुच्छेद 51 के आधार पर क़दम उठाएगा तो फिर वह अमरीका के सभी लक्ष्यों यहां तक कि पर्यटकों के जहाज़ों को भी निशाना बना सकता था। इस अनुच्छेद के अनुसार अगर सुरक्षा परिषद किसी देश के अधिकारों की रक्षा न कर पाए तो फिर उस देश को स्वंय अपने हितों की रक्षा और जिससे खतरा हो उसके खिलाफ कार्यवाही का अधिकार होता है तो अगर एसा हो गया तो फिर शीशे के महल में रहने वाले अमरीका के क्षेत्रीय मित्रों का क्या होगा? क्या वह अमरीका के साथ इस दशा में भी सहयोग कर पाएंगे?

ईरान इराक़ में अमरीकी छावनी पर मिसाइल बरसा चुका है

 

     आज ईरान के लिए दवा और खान पान की चीज़ों पर भी अमरीका प्रतिबंध लगा चुका है तो फिर अब क्या है ईरानियों के पास खोने के लिए? लेकिन अमरीका और उसके घटकों के पास बहुत है खोने के लिए।

     फार्स की खाड़ी के अरब देश जो आज ईरान को से सामने त्योरी चढ़ा रहे हैं, अपने बचे हुए कच्चे तेल से खाने पीने का इंतेज़ाम कर पाएंगे?

      यह याद रखना चाहिए कि अगर वह ईरान से टकराए तो सब से छोटी घटना जो घटेगी वह यह होगी कि उनके पास पीने का पानी नहीं होगा और इन देशों का आयात व निर्यात पूरी तरह से बंद हो जाएगा।

      इस्राईल की तो बात ही नहीं , उसकी इतनी हैसियत नहीं कि वह इस्लामी प्रतिरोध मोर्चे का मुकाबला कर सके ईरान की बात ही अलग।

     अंत में यह कहना चाहिए कि अमरीकी सरकार ने यह फैसला करके खुद ही एसे कुंए में गिर गयी है जिसमें नौसिखिए से नौसिखा राजनेता भी मुश्किल से ही गिरता है, आज  अमरीका सुरक्षा परिषद को भी गंवा चुका है, अपने घटकों से भी दूर हो चुका है और विश्व समुदाय से भी अलग हो चुका है।

     आज पूरी दुनिया को अमरीकी फैसलों से पैदा होने वाले खतरों का अंदाज़ा है इसी लिए पूरी दुनिया अमरीका और ईरान के मतभेदों को शांतिपूर्ण राहों से सुलझाने की कोशिश कर रही है और सब का यही कहना है कि एकमात्र मार्ग, परमाणु समझौते में अमरीका की वापसी है। आज अमरीकी सरकार केवल व्यक्तिगत हित और इस देश मे राष्ट्रपति चुनाव की वजह से दुनिया और इलाक़े को युद्ध की ओर घसीट रही है। Q.A. साभार, स्पूतनिक न्यूज़ एजेन्सी

 

 

टैग्स

कमेंट्स