Sep २३, २०२० १९:२५ Asia/Kolkata
  • क्या इस्राईल, ईरान से लड़ने के लिए सऊदी अरब को अपने सैनिक देगा? अलखलीजुलजदीद ने दिया इस सवाल का जवाब!

अरबी समाचार पत्र अलखलीजुल जदीद में फिलिस्तीनी लेखक मरवान बशारह ने एक लेख में फार्स की खाड़ी और इलाक़े में सऊदी अरब के प्रभाव का जायज़ा लिया है।

अलखलीज ने लिखा है कि खाशुकजी की हत्या को दो बरस पूरे होने वाले हैं और सऊदी अरब, फार्स की खाड़ी और मध्य पूर्व में अपना प्रभाव खोता जा रहा है।

पूरे इलाक़े, ओआईसी, ओपेक और इस्लामी जगत में बेहद प्रभाव के 50 वर्षों के बाद अब बिन सलमान की  नीतियों की वजह से पतन की खाईं में उतर रहा है।

पिछले पांच वर्ष खास तौर पर सऊदी अरब के लिए बेहद बुरे रहे और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने जो कुछ अपने देश के विकास की योजना के रूप में पेश किया था वह सब बुरी तरह से नाकाम रहा।

बिन सलमान अपने गुरु अर्थात अबूधाबी के क्राउन प्रिंस से सलाह लेते हैं और सऊदी अरब के पतन का सब से बड़ा सुबूत, उसके छोटे घटक यूएई का विकास है जो अब एक क्षेत्रीय शक्ति की तरह, लीबिया, ट्यूनेशिया, में दखल दे रहा है और अब्दुलफत्ताह अस्सीसी और बश्शार असद जैसे शासकों का समर्थन कर रहा है।

सऊदी अरब की शक्ति कम होने के साथ ही अबूधाबी बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसी मध्य सऊदी क्राउन प्रिंस बिन सलमान, इस्राईल को फार्स की खाड़ी से जोड़ने के लिए यूएई के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ायद की कोशिशों का समर्थन कर रहे हैं।

बिन सलमान ने यमन युद्ध, बिन ज़ायद के संकेत पर शुरु किया और उन्हें  बेहद तेज़ी के साथ विजय की उम्मीद थी लेकिन यह युद्ध कई बरस से चल रहा है और अब भी यह किसी को नहीं पता कि वह कब खत्म होगा? इसके अलावा हौसियों ने यमन के युद्ध में सऊदियों को खूब निशाना बनाया है।

जून सन 2017 में मुहम्मद बिन सलमान और मुहम्मद बिन ज़ायद ने क़तर सरकार के साथ एक  संकट खड़ा किया और इसके लिए बहाना यह पेश किया कि क़तर, आतंकवादी संगठनों की मदद करता है। नंबवर 2017 में बिन सलमान ने लेबनान के प्रधानमंत्री सअद हरीरी को त्यागपत्र देने पर मजबूर कर दिया लेकिन जब यह राज़ खुला तो पूरी दुनिया में सऊदी अरब की मूर्खता पर खूब हंसी हुई। जिसके बाद अक्तूबर सन 2018 में खाशुकजी की हत्या हुई  और इस तरह से सऊदी अरब का संकट  अंतरराष्ट्रीय बन गया।

 

    किंग सलमान ने सऊदी अरब का नरेश बनने के कुछ ही वर्षों बाद अपने छोटे बेटे को अपना उत्तराधिकारी बना दिया और इसके बाद से ही सऊदी अरब पूरी दुनिया में बड़ी तेज़ी से बदनाम होने लगा लेकिन इन हालात में भी सऊदी क्राउन प्रिंस, बिन सलमान ने यमन युद्ध समाप्त करने, क़तर से दोस्ती करने और अरब एकता को मज़बूत करने के बजाए, इस्राईल से संबंध बनाने की ओर क़दम बढ़ा दिया ताकि इस तरह से इस्राईल से अरबों के संबंधों  का रास्ता पूरी तरह से साफ किया जा सके।

यह एक ठोस सच्चाई है कि इस्राईल से सऊदी अरब की निकटता का सऊदियों को तो कोई लाभ मिलने वाला नहीं और इस्राईल किसी भी दशा में फार्स की खाड़ी को ईरान से बचाने के लिए अपने सैनिकों की बलि नहीं चढ़ाएगा और ज़रूरत पर इस्राईल अरब देशों की बस इतनी मदद कर सकता है कि वह उन्हें आधुनिक तकनीक और हथियार दे दे वह भी विश्व की अन्य शक्तियों  से बहुत कम।

फिलिस्तीन पर इस्राईल के अवैध क़ब्ज़े को कई दशक गुज़र चुके हैं लेकिन अरब जनता के दिल में ज़ायोनियों से नफरत कम नहीं हो रही है और अरब राष्ट्र आज भी उन्हें इलाक़े के लिए सब से बड़ा खतरा मानते हैं।

यह हो सकता है कि इस्राईल, वाशिंग्टन विशेषकर अमरीकी कांग्रेस में सऊदी अरब के भ्रष्ट शासन का किसी सीमा तक समर्थन करे लेकिन इसका मतलब, सऊदी अरब पर इस्राईल और अमरीका का वर्चस्व होगा।

सच्चाई यह है कि इस्राईल से संबंध बनाने की बिन सलमान की कोशिश, मूर्खता है और सऊदी अरब के लिए इसका भयानक परिणाम होगा और ज़ाहिर सी बात है अगर ट्रम्प और अमरीका, बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब की डूबती नैया को पार नहीं लगा पाएंगे तो फिर निश्चित रूप से इस्राईल के बस का भी यह काम नहीं होगा। Q.A.

 

 

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