Sep २६, २०२० १९:२४ Asia/Kolkata
  • सऊदी युवाओं ने बनाया विपक्ष, तो क्या सऊदी अरब वहीं है जहां सौ साल पहले ईरान था? क्या एक होगा अंजाम? रूसी न्यूज़ एजेन्सी का जायज़ा

सऊदी अरब के कुछ नागरिकों ने अपने देश की व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन आरंभ करते हुए लंदन में एक विपक्षी संगठन के गठन का एलान किया है।

    लगभग सौ साल और कुछ वर्ष पहले ईरान में भी इसी प्रकार कुछ युवाओं ने एक आंदोलन को शुरु किया था जो बाद में ईरान में संविधान क्रांति  का कारण बन गया।

    जब ओटोमन शासकों ने इस्लामी देशों की बागडोर संभाली तो उनकी एक नीति यह थी कि प्रजा को हमेशा अनपढ़ रखा जाए ताकि वह हमेशा प्रजा ही रहे। ओटोमन या उस्मानी काल में प्रजा उन लोगों को कहा जाता था तो उस्मानी नहीं थे और उस्मानी शासन के अधीन इलाक़ों में रहते थे।  उसी काल में ओटोमन के युवाओं को पढ़ने के लिए विदेश भेजने या न भेजने पर खूब गर्मा गर्म बहस होती थी और बहुत से धर्म गुरुओं का कहना था कि मुस्लिम युवाओं को शिक्षा के लिए नास्तिकों के देश में नहीं भेजा जाना चाहिए। इस्लाम और गैर इस्लाम की बातें इस लिए की जा रही थीं क्योंकि  ओटोमन शासकों ने स्वंय को इस्लाम से जोड़ लिया था और उन्हें खतरा था कि अगर युवा, विदेश गये और ज्ञान के प्रकाश से उनके दिमाग खुल गये तो फिर इन शासकों के लिए अपनी प्रजा को प्रजा बनाए रखना कठिन होगा।

    युरोपीय विशेष कर अंग्रेज़ और फ्रांसीसी जब मिस्र और वर्तमान सीरिया और उसके आस पास के क्षेत्रों में गये तो  ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध के लिए सब से पहला जो काम किया वह इन क्षेत्रों में स्कूल, कालेज और युनिवर्सिटियां बनाना था। ओटोमान दरबार के बहुत से युवाओं ने इन स्कूलों और कालेजों  में शिक्षा प्राप्त की और फिर उन्हें ब्रिटेन और फ्रांस भेजा गया जहां उनके दिमाग में उदारता भरी गयी और जब इन लोगों की मदद से ओटोमन साम्राज्य खत्म हुआ तो फिर यही लोग सेकुलर वर्ग के गठन के लिए इस्तेमाल किये  गये।

 

ईरान में मामला थोड़ा अलग था और अमीर कबीर ने युरोपीय देशों में जाकर शिक्षा प्राप्त करने का दरवाज़ा खोला और फिर ईरानी विदेश में जाकर पढ़ कर आए तो अपने साथ राजनीतिक विचारधारा भी ले आए और अब वह देश की व्यवस्था बदलने के बारे में सोचने लगे।

    चूंकि उस समय ईरान मे काजारी शासकों का राज था और उसकी वजह से देश काफी पिछड़ा हुआ था इस लिए जनता ने भी इस विचार को हाथों हाथ लिया और अंत में आयतित व्यवस्था पर सहमति बनी जो काफी  सीमा तक ब्रिटिश व्यवस्था से मिलती जुलती थी। संविधान क्रांति के समर्थकों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि ईरान की सांस्कृतिक परस्थितियां, ब्रिटेन से अलग हैं और यही वजह थी कि अन्ततः रज़ा शाह के हाथों ईरान में फिर से राजशाही लौट आयी और  फिर दशकों तक  मेहनत की गयी तब जाकर कहीं ईरान में इस्लामी क्रांति सफल हुई।

    आज कल सऊदी अरब से जो रिपोर्टें मिल रही हैं उनमें सौ साल पहले ईरान में संविधान क्रांति के आरंभ  के  काल की झलक नज़र आती है।

    आज सऊदी अरब में जो हालात हैं उनका इंतेज़ार पिछले 90 वर्षों से लोग कर रहे हैं। 90 साल पहले अब्दुलअज़ीज़, ब्रिटेन की मदद से अरब जगत के एक बड़े भाग पर राजशाही व्यवस्था लागू करने में सफल हुए थे। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि इस क्षेत्र में तेल निकल आएगा और फिर इस इलाक़े के पास इतना धन होगा कि जिससे सब कुछ बदल जाएगा।

    समझा यह  जा रहा था कि इस इलाक़े के अरब, हमेशा की, बंजारों  की तरह ज़िंदगी गुज़ारेंगे और जैसे वह  हज़ारों  साल से रहते आ रहे हैं उसी तरह आगे भी रहेंगे इस लिए न कोई सत्ता चाहेगा न ही किसी को इन सब चीज़ों से मतलब होगा और इस तरह से सऊद वंश, आलुश्शैख की मदद से अरब के इस बड़े भाग पर हमेशा और शांति के साथ राज करता रहेगा।

    सत्ता सऊदी वंश के हाथ में थी और धार्मिक नेतृत्व आलुश्शेख के हाथ  में था और आमदनी का साधन, हज और खजूर के अलावा कुछ  नहीं था लेकिन जब तेल की दौलत मिली तो इस देश के बंजारे, शहरों में रहने लगे और युवा शिक्षा प्राप्त करने लगे और फिर अब उनमें यह विचार भी पैदा होने लगा कि क्यों एक ही परिवार हमेशा उनके देश पर राज करे? और क्यों उनके देश की दौलत पर एक परिवार का अधिकार हो और वह जैसे चाहे उसे खर्च करे?

 

     सऊदी अरब के पूर्व शासक किंग फहद के काल में सऊदी शासकों  को अपने देश के युवाओं के बदलते विचारों का भनक लगी तो उन्हों ने विदेश जाकर शिक्षा प्राप्त करने और वहीं मज़े करने का रास्ता अपने देश के युवाओं के लिए खोल दिया, उन्हें बड़ी बड़ी रक़म दी जाती थी ताकि  वह विदेशों में जाकर रहें और देश में राजनीतिक व्यवस्था बदलने का ख्याल मन से निकाल दें।

    इस प्रकार के विदेश में रहने वाले सऊदी नागरिकों में शायद सब से अधिक प्रसिद्ध खाशुकजी थे लेकिन रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब में जमाल खाशुकजी जैसे न जाने कितनों को इस तरह से गायब किया गया  कि आज तक उनका कोई पता नहीं चल पाया।

    कुछ सऊदी युवाओं को इस्लाम  से बहुत लगाव था तो सऊदी  अरब ने उन्हें दूसरे देशों में इस्लाम फैलाने के लिए भेज दिया जहां उन्होंने मदरसे खोले और सऊदी अरब के पैसे से इस्लाम फैलाया लेकिन इनमे  से अधिकांश अन्त में  आतंकवादी संगठनों से जुड़ गया और पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि खराब की।

    इन सब के अलावा सऊदी अरब के लिए एक और बड़ा खतरा है। सऊदी अरब  के एक तिहाई नागरिक शिया हैं और जिन इलाक़ों  में वह रहते हैं, सऊदी अरब का तेल वहीं से निकलता है लेकिन सऊदी सरकार उनका बुरी तरह से दमन करती है और न केवल यह कि उन्हें अलग से कोई सुविधा नहीं देती बल्कि आम सऊदी नागरिकों के अधिकारों से भी उन्हें  वंचित रखती है।

    महल से बाहर देश के तो यह हालात हैं मगर महल के भीतर और शाही परिवार में भी सत्ता के लिए खींचतान जारी है जिससे इस देश में एक नयी राजनीतिक व्यवस्था की संभावना बढ़ रही है। आज शाही घराने के सदस्यों की  संख्या 7 हज़ार से अधिक है और सब को राज पाट में अपना हिस्सा चाहिए। 

    हालांकि सऊदी शासकों ने हमेशा इन सदस्यों को पद और धन दे कर खुश रखने की कोशिश की है लेकिन चूंकि सऊदी अरब के तेल और सारी आमदनी पर केवल सऊदी नरेश का ही अधिकार होता है इस  लिए बहुत से लोग  इस पद तक पहुंचने के लिए पूरी शक्ति खर्च कर रहे हैं।  सऊदी अरब की सरकार अब्दुलअज़ीज़ की वसीयत के हिसाब से चलती थी और सभी शासकों ने अपने पिता की वसीयत का पालन किया लेकिन वर्तमान नरेश किंग सलमान ने अपने पिता की वसीयत के विपरीत और अपने तीन भाई के जीवित रहने के बावजूद अपने बेटे को उत्तराधिकारी बना दिया इस तरह से बहुत से अन्य सदस्यों में भी शासन का लोभ पैदा हो गया। 

    मुहम्मद बिन सलमान क्राउन प्रिंस बन गये और उन्हें लगता था कि अमरीका की मदद से वह बड़ी आसानी से सऊदी अरब के राजा बन जाएंगे और इसी लिए सत्ता पर पकड़ मज़बूत बनाने के लिए उन्होंने यमन युद्ध आरंभ किया और अपने सभी विरोधियों को इस युद्ध की भट्टी में झोंक दिया, बचे खुचे शाही परिवार के सदस्यों को एक होटल में बुला कर जब को वहीं बंद कर दिया और उनकी पूरी संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर लिया जो एक अनुमान के हिसाब से 100 अरब डालर से अधिक थी।

 

    किंग सलमान ने भी सऊदी अरब में होने वाले बदलाव पर खामोशी के लिए ट्रम्प के साथ हथियारों के 450 अरब डालर के समझौते पर हस्ताक्षर किये।  कहा यह भी जाता है कि इस रक़म का बड़ा भाग फेक कंपनियों के  नाम पर ट्रम्प, उनकी बेटी और दामाद के एकांउट में डाला गया है।

    बहरहाल इन हालात में अब ट्रम्प की हार की बातें की जा रही हैं जिसके बाद सऊदी अरब में राजनीतिक कार्यकर्ता फिर से सक्रिय हो गये हैं और उन्हें उम्मीद हो चली है कि ट्रम्प के जाते ही बिन सलमान भी चले जाएंगे।

अब कहा जा रहा है कि सऊदी अरब के जिन युवाओं  ने शासन विरोधी संगठन बनाया है वह सऊदी अरब में  सशर्त राजशाही के इच्छुक हैं और ब्रिटेन और फ्रांस और जर्मनी भी इसका समर्थन करते हैं और कहा जा रहा है कि अगर अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की हार हो जाती है तो फिर अमरीका में इन लोगों के समर्थकों में शामिल हो सकता है।

हालांकि इस प्रकार की राजशाही वही है जो सौ साल पहले ईरान में लायी गयी थी और इस प्रकार की सरकार, सऊदी अरब की सामाजिक परिस्थितियों से भी मेल नहीं खाती लेकिन फिर भी इसे सऊदी अरब में  हालात बदलने के लिए उम्मीद की एक किरण समझा जा सकता है।

यहां तक भी कहा जा रहा है सऊदी अरब के सिहांसन पर बैठने की तैयारी कर रहे  बिन सलमान हो सकता है अपने विरोधियों की वजह से इन लोगों के साथ किसी सहमति पर पहुंच जाएं मतलब सशर्त राजशाही को स्वीकार कर लें। युरोपियों  का तो यहां तक मानना है कि बिन सलमान, सशर्त राजशाही चाहने वालों के साथ समझौता करने पर मजबूर हैं। Q.A. साभार, स्पूतनिक न्यूज़ एजेन्सी

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