Sep २७, २०२० २०:०५ Asia/Kolkata
  • 42 और 25 साल पहले इस्राईल के साथ समझौते के बाद मिस्र और जार्डन के क्या हालात बने, ईरान से इस्राईल और पश्चिम की दुश्मनी की अस्ल वजह क्या है? रूसी न्यूज़ एजेन्सी की पढ़ने लायक़ रिपोर्ट

रूसी न्यूज़ एजेन्सी स्पूतनिक की परशियन सेवा में ईरान और अरब देशों तथा इस्राईल के बारे में एक रोचक लेख प्रकाशित हुआ है।

सन 1987 में अर्थात लगभग 42 साल पहले अमरीकियों ने बड़े बड़े लालच देकर मिस्र को इस्राईल के साथ वार्ता और फिर कैम्प डेविड समझौते पर हस्ताक्षर के लिए तैयार किया। उस समय, अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर को आशा थी कि इस तरह का समझौता करवा कर वह अमरीका के अगले राष्ट्रपति चुनाव में जीत जाएंगे लेकिन उनकी आशा के विपरीत, वह राष्ट्रपति चुनाव हार गये।

बहुत से लोग जिमी कार्टर की हार का कारण, तेहरान में क्रांतिकारी छात्रों द्वारा अमरीकी दूतावास पर हमला और अमरीकी कूटनयिकों को बंधक बनाए जाने की घटना से संबंधित बताते हैं।

सन 1987 में जब मिस्र और इस्राईल के बीच कैम्प डेविड समझौता हुआ तो अमरीकियों ने खूब प्रोपगेंडा किया कि मिस्र और इस्राईल के बीच होने वाला यह समझौता बहुत जल्दी अन्य अरब देशों तक पहुंच जाएगा और  सारे अरब देश इस्राईल के साथ समझौता कर लेंगे और उसे औपचारिक रूप से मान्यता दे देंगे।

 अब  42 साल के बाद भी आप काहिरा में एक इस्राईली को बिना डर के टहलते नहीं देख सकते।  

लगभग  25 साल पहले इसी तरह की घटना जार्डन के साथ घटी और जार्डन ने भी इस्राईल के साथ शांति  समझौते पर हस्ताक्षर किये लेकिन आज भी आप जार्डन की राजधानी अम्मान में एक इस्राईली को नहीं पा सकते। आज भी जब किसी इस्राईली को काहिरा या अम्मान जाना होता है तो वह स्वंय को किसी युरोपी देश या अमरीका का नागरिक बताने पर मजबूर होते हैं।

आज कल फार्स की खाड़ी के कुछ अन्य देशों के साथ इस्राईल के संबंधों का खूब चर्चा है लेकिन जिन देशों ने इस्राईल के साथ शांति समझौता किया है उन्होंने न तो कभी इस्राईल से युद्ध किया है और न ही फिलिस्तीन के साथ उनकी सीमाएं मिलती हैं जो उन्हें इस्राईल के साथ शांति समझौते की ज़रूरत हो। अस्ल बात यह है कि बात, सरकारों की नहीं, राष्ट्रों की है, जब तक इस्लामी राष्ट्र और इस्लामी देशों  की जनता, इस्राईल को स्वीकार नहीं करेगा, सरकारों द्वारा स्वीकार किये जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यही वजह है कि इस्राईली आज भी अमरीका द्वारा यूएई को आधूनिक  हथियार बेचे जाने का विरोध कर रहे हैं हालांकि यूएई का दावा है कि उसे इन हथियारों की ज़रूरत, ईरान को रोकने के लिए है।

इसकी वजह यह है कि इन अरब देशों के शासकों के विपरीत, इस्राईल को अच्छी तरह से मालूम है कि इन देशों की जनता की सोच, इन देशों के शासकों से बहुत अलग है और किसी दिन भी यह लोग नींद से जाग सकते हैं जिसके बाद ईरान की ही तरह कोई क्रांति हो सकती है जिसके बाद यह सारे आधुनिक अमरीकी हथियार, उन लोगों के पास होंगे जो इस्राईल के अस्तित्व के ही विरोधी होंगे, इस्राईलियों की ईरान से समस्या भी यही है। पश्चिम ने पिछले 40 वर्षों से ईरान की इस्लामी क्रांति के लिए तरह तरह की समस्याएं पैदा कीं लेकिन क्रांति चालीस वर्षों से डटी है और अब पश्चिम और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष का आदर्श बन चुकी है।

 

पश्चिमी अफ्रीका से लेकर पूर्वी एशिया तक बहुत से मुसलमान, इस्लामी गणतंत्र ईरान को अपना आदर्श मानते हैं और अगर ईरान उनसे संपर्क न भी करे तब भी एसे लोगों की उपस्थिति ही इस्राईल के लिए खतरा है।

पश्चिमी प्रचारों के विपरीत ईरान का समर्थन केवल शिया ही नहीं करते बल्कि फिलिस्तीन से लेकर उत्तरी अफ्रीका तक बहुत से सुन्नी और लेबनान व इराक़ व सीरिया के ईसाइयों से लेकर ईज़दी तक, इस्लामी गणतंत्र ईरान को अपना आदर्श मानते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ईरान ने उनकी मांगों के प्रति  सम्मानीय रुख अपनाया है जबकि  स्वंय उनके शासकों  ने लज्जाजनक रुख अपनाते हुए इस्राईल के हाथों खुद को बेच दिया है।

आज सब को यह बात मालूम है कि अगर ईरानी, इस्राईल के  साथ समझौता करने पर तैयार हो जाते तो आज उनकी बहुत सी समस्याएं सिरे से होती ही न, बल्कि यह भी संभव था कि इस्राईल, अरबों के अंत के लिए ईरान के साथ गठबंधन ही बना लेता। इस्राईली इस पर तैयार भी थे।

जब तक ईरान आदर्श रहेगा इस्राईल को इस बात का खतरा रहेगा कि किसी दिन सब एकजुट होकर उसके खिलाफ मोर्चा बना सकते हैं यही वजह है कि ईरान के खिलाफ दुश्मनी और उसकी व्यवस्था के अनुपयोगी बनाने का क्रम जारी है।

मक़सद, ईरान की व्यवस्था को ही तबाह करना नहीं बल्कि दुनिया भर के मुसलमानों के सामने यह भी साबित करना है कि इस प्रकार की व्यवस्था काम की नहीं है और वह कभी फिर इस तरह की कोई सरकार बनाने के बारे में न सोचें, ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध की बड़ी वजह भी यही है। बस उनसे एक गलती हो गयी और वह यह  कि उन्हें ईरानी जनता की संघर्ष शक्ति  का सही अनुमान नहीं था। Q.A. साभार, स्पूतनिक न्यूज़ एजेन्सी  

 

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