Oct १४, २०२० ०८:५४ Asia/Kolkata
  • क्या अमरीका और इस्राईल ने लेबनान को गृह युद्ध में झोंकने की साज़िश तैयार कर ली है?

छोटा सा ख़ूबसूरत अरब देश लेबनान इस समय भयानक हालात से गुज़र रहा है। लगभग 70 लाख की आबादी वाले इस देश की ख़ास बात यह है कि अपनी छोटी आबादी और सीमित क्षेत्रफल के बावजूद अरब जगत ही नहीं बल्कि विश्व के मीडिया में सुर्खियों में रहता है। जिसकी एक वजह इस्राईल से इस देश की जंगें और इस देश का शक्तिशाली हिज़्बुल्लाह संगठन है।

हिज़्बुल्लाह ने लेबनान ही नहीं बल्कि सीरिया, फ़िलिस्तीन और इराक़ के भीतर भी इस्राईल और अमरीका के कार्यक्रमों को बार बार नाकाम बनाया है। ग्रेटर इस्राईल और न्यू मिडिल ईस्ट जैसी योजनाएं विश्व शक्तियों के भरपूर समर्थन के बावजूद अगर अब तक नाकाम रही हैं तो इसकी एक बड़ी वजह हिज़्बुल्लाह है। हिज़्बुल्लाह का ताज़ातरीन कारनामा सीरिया में नज़र आया जहां इस संगठन ने बश्शार असद सरकार का तख़्ता पलटने की पश्चिमी ताक़तों, तुर्की और अरब सरकारों की व्यापक साज़िश को नाकाम बना दिया।

हिज़्बुल्लाह का नाम एक बार फिर अरब मीडिया में नई चर्चा का विषय बना है। क्रिस्चियन राजनैतिक दल लेबनीज़ फ़ोर्सेज़ के अध्यक्ष समीर जअजअ के बारे में उन्हीं से जुड़े हुए समाचार पत्र अलअख़बार ने रिपोर्ट छापी है कि गत शुक्रवार को सांसद नेमह तामह के आवास पर भोज के दौरान एक अन्य क्रिस्चियन राजनैतिक दल प्रोग्रेसिव सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष वलीद जुंबुलात से बतचीत में समीर जअजअ ने कहा कि वह हिज़्बुल्लाह से आख़िर तक लड़ेंगे उनके पास 15 हज़ार लड़ाके हैं हम हिज़्बुल्लाह का इस समय मुक़ाबला कर सकते हैं क्योंकि हिज़्बुल्लाह अब लेबनान और इलाक़े के वर्तमान हालात की वजह से बहुत कमज़ोर हो चुका है। मगर वलीद जुंबुलात ने उन्हें समझाया कि उनकी सोच बहुत घातक है। जअजअ ने यह प्रस्ताव भी रखा कि दोनों क्रिस्चियन पार्टियों के सांसद त्यागपत्र दे दें ताकि देश में राजनैतिक संकट और भी गहरा हो जाए मगर जुंबुलात ने कहा कि वह इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं।

हमारी समझ में यह बात नहीं आती कि डाक्टर जअजअ ने किस पैमाने के आधार पर अपनी और हिज़्बुल्लाह की ताक़त का आंकलन किया हैं? हमें तो विश्वास है कि अगर उन्होंने हिज़्बुल्लाह से टकराने का रास्ता अपनाया तो उनकी पार्टी ही नहीं उनके विदेशी घटक भी धूल चाट कर रह जाएंगे। हिज़्बुल्लाह उस ताक़त का नाम है जिसने अमरीका और तुर्की जैसे देशों द्वारा सैनिक ट्रेनिंग और सऊदी अरब जैसे देश द्वारा वहाबी सोच के आधार पर ब्रेनवाश के दौर से गुज़रने वाले तकफ़ीरी आतंकियों को सीरिया और लेबनान में अनेक मोर्चों पर शिकस्त दी जबकि समीर जअजअ ने जो आख़िरी लड़ाई लड़ी थी वह 35 साल पहले थी।

हिज़्बुल्लाह ने 2000 और 2006 में इस्राईल को शिकस्त दी और उसके बाद हिज़्बुल्लाह की ताक़त में कोई गुना की वृद्धि हो चुकी है। सैयद हसन नसरुल्लाह के नेतृत्व में हिज़्बुल्लाह जिस जंग में भी उतरा है फ़तह हासिल करके ही लौटा है। यह भी हक़ीक़त है कि हिज़्बुल्लाह अकेला संगठन नहीं है बल्कि उसका संबंध उस क्षेत्रीय प्रतिरोधक मोर्चे से है जो कई देशों तक फैला हुआ है और जिसके समर्थकों की संख्या करोड़ों में है।

समीर जअजअ के इस बयान से लगता है कि लेबनान को एक बार फिर गृह युद्ध की आग में झोंकने की तैयारी चल रही है और इसकी योजना अमरीका और इस्राईल ने बनाई है। वलीद जुंबुलात ने समझदारी दिखाई कि समीर जअजअ का प्रस्ताव नहीं माना और साफ़ साफ़ कह दिया कि किसी भी समुदाय का कोई भी व्यक्ति अगर हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ युद्ध में कूदने के बारे में सोच रहा है तो यह उसका पागलपन ही कहा जाएगा।

हम डाक्टर जअजअ को यह भी समझना चाहेंगे कि अमरीका, इमारात और सऊदी अरब का समर्थन किसी भी टकराव में जीत नहीं बल्कि शिकस्त की गैरेंटी है। इन तीनों देशों ने यमन युद्ध शुरू किया और उससे पहले सीरिया और इराक़ में युद्ध छेड़ा मगर कहीं भी सफल नहीं हो पाए। अमरीकी युद्धक विमान एफ-16 और एफ़-15 यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन को पराजित नहीं कर सके जिसकी शक्ति हिज़्बुल्लाह की शक्ति के पांच प्रतिशत भाग के भी बराबर नहीं है।

हिज़्बुल्लाह कमज़ोर नहीं है अगर यह संगठन और उसके नेता कुछ रियायतें दे रहे हैं तो कमज़ोरी नहीं समझदारी और देश को टकराव से बचाने की नीयत की वजह से है। आख़िर में हम मशहूर अरबी कहावत याद दिलाना चाहेंगे कि संयमी इंसान के आक्रोश से डरो!

स्रोतः रायुल यौम+एजेंसियां

 

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