Oct २०, २०२० २२:२३ Asia/Kolkata
  • ट्रम्प और बाइडन, कौन किस देश के लिए बेहतर? ईरान के प्रति बाइडन का रवैया कैसा रहेगा?  अरबी-21  ने बताया, आप भी जानें

अरब जगत के प्रसिद्ध समाचार पत्र अरबी-21 ने अपने एक आलेख में विभिन्न देशों के प्रति ट्रम्प और बाइडन के रवैये का जायज़ा लिया है।

यह लेख यह बताने के लिए नहीं है कि अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव में कौन से उम्मीदवार को जीत मिलेगी? खास कर इस लिए भी इस बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा रहा है वैसे अधिकांश लोग बाइडन की संभावना अधिक प्रकट कर रहे हैं क्योंकि ट्रम्प के पास जीत के लिए सब से बड़ा कार्ड, आर्थिक विकास था जिसे कोरोना की वजह से उन्होंने गवां दिया है, इसके अलावा भी " खुफिया सत्ता के गलियारों " का यह फैसला है कि अब ट्रम्प से छुटकारा हासिल करना चाहिए।

     अब यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि अमरीका में " खुफिया सरकार" बाइडन को हर हाल में जिताना चाह रही है सिर्फ इस लिए नहीं कि ट्रम्प का व्यक्तित्व विचित्र है बल्कि इस लिए भी कि अमरीका की " खुफिया सरकार" यह चाहती है कि केनेडी के बाद बाइडन दूसरे कैथोलिक के रूप में अमरीका की सत्ता संभालें।

     लेकिन सवाल यह है कि ट्रम्प और बाइडन में से कौन बेहतर होगा?

     एक जटिल समीकरण है जिसकी मिसाल अतीत में नहीं मिलती। एक क्रांति का मोर्चा है और दूसरी तरफ ईरान का मोर्चा है। इसके साथ तुर्की का मोर्चा भी है। यह सारे मोर्चे एक दूसरे के खिलाफ किसी न किसी तरह से व्यस्त हैं और हमारा जो सवाल है उसका हर मोर्चे के हिसाब से अलग अलग जवाब है।

     इस बात में तो कोई शक नहीं कि क्रांति का विरोधी मोर्चा, जिसमें सऊदी अरब, यूएई और मिस्र आदि हैं,  ट्रम्प की जीत का इच्छुक है और उसका मानना है कि वह ईरान पर दबाव बढ़ाते रहेंगे और उन्हें तुर्की के खिलाफ जायोनियों द्वारा भड़काना कोई कठिन काम नहीं है लेकिन यह मोर्चा केवल ट्रम्प से ही सारी उम्मीदें नहीं लगाए रख सकता बल्कि वह ज़ायोनियों और उनसे संबंधित अमरीकी लाबियों से बातचीत कर रहा है ताकि अगर समझौता हो तो फिर बाइडन का समर्थन करने लगे क्योंकि इस मोर्चे को नतर है कि बाइडन की ज़ायोनियों के समर्थक हैं।  बाइडन और इस्राईल के संबंधों का कोई इन्कार नहीं कर सकता। यह संबंध कई दशकों से है। सन 1986 में जब बाइडन कांग्रेस के सदस्य थे तो उन्होंने कहा था कि अगर इस्राईल नहीं होगा तो अमरीका को मजबूर होकर दूसरा इस्राईल बनाना होगा ताकि वह अपने हितों की रक्षा कर सके। एक बार बाइडन ने यह भी कहा था कि "  अगर मैं यहूदी होता तो ज़ायोनी होता, इस्राईल, पूरी दुनिया के यहूदियों  की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है। "

 

     सब को मालूम है कि यहूदी अमरीका में हमेशा ही डेमोक्रेटिक पार्टी से निकट रहे हैं अब इसके साथ ही अगर बाइडन की सहयोगी का रुख भी बढ़ा लें तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। कमला हैरिस ने कहा है कि अमरीकी दूतावास, बैतुलमुकद्दस से तेल अबीब वापस नहीं जाएगा और ईरान के बारे में ट्रम्प की नीतियों में बदलाव के बारे में उनकी बातों की सच्चाई पर यकीन करना मुश्किल है।

     तो क्या इसका यह मतलब है कि फिलिस्तीन के मामले में ट्रम्प और बाइडन का रुख एक ही होगा ?

      मेरे ख्याल में ट्रम्प बेहतर हैं क्योंकि उनकी वजह से इस्लामी जगत के साज़िशी लोग खुल कर सामने आ गये। ट्रम्प ने इस्राईल के साथ इस्लामी देशों के संबंध सामान्य बनाने की प्रक्रिया को खोल दिया जो उनसे पहले तक छुपी हुई थी लेकिन इससे अधिक व्यापक थी। इसी तरह फिलिस्तीनी प्रशासन ने कितनी कड़ी शर्तें स्वीकार की हैं इसके बारे में भी किसी को पता नहीं था मगर ट्रम्प के सत्ताकाल में पता चल गया यही वजब है कि फिलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास यह चाहते हैं कि बाइडन सत्ता में आएं क्योंकि इस तरह से उनकी गद्दारी और इस्राईलियों से मिली भगत छुपी रहेगी।

     यही वजह है कि क्रांति विरोधी मोर्चा ट्रम्प की जीत चाहता है लेकिन ईरानी मोर्चा बाइडन की जीत का इच्छुक है। उसे यह उम्मीद है कि उनके साथ समझौता करके आर्थिक स्थिति बेहतर बनायी जा सकती है। अब रह जाता है तुर्की जिससे बाइडन को दुश्मनी है और ट्रम्प का रुख भी बदलता रहता है।

     इस तरह से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दोनों की प्रत्याशी बुरे हैं क्योंकि दोनों की एक एसे साम्राज्यवादी देश की सरकार चलाएंगे जो हमारे राष्ट्रों के स्वतंत्रता प्रेम का विरोधी है।  

 

      लेकिन जहां तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन और रूस से अमरीका के रवैये की बात है तो उसके मद्देनज़र कौन बेहतर होगा?

     हमारे ख्याल में ट्रम्प बेहतर होंगे क्योंकि वह चीन के साथ तनाव को वर्तमान स्तर से भी ऊपर ले जाएंगे और " खुफिया सरकार " के आदेश पर चीन ही की तरह रूस के साथ भी तनाव बढ़ाने पर मजबूर हो जाएंगे  जिसके बाद जो हालात बनेंगे उनमें दुनिया में नये नये मोर्चे और समीकरण बनेंगे जो निश्चित रूप से अमरीका पर अंकुश लगाने में सहायक सिद्ध होंगे।

     यह एक ठोस सच्चाई है कि जब भी दुनिया अंतरराष्ट्रीय विवाद बढ़ेंगे वह हमारे और सभी पीड़ित राष्ट्रों को हित में होंगे। इस लिए ट्रम्प बेहतर हैं लेकिन यह भी पक्का है कि बाइडन भी चीन और रूस के बारे में मूल रणनीति में कोई बदलाव नहीं लाएंगे हालांकि घटकों को साथ लाने में वह ट्रम्प से कई गुना अधिक दक्ष कूटनीतिक हैं और कभी भी व्यापारियों  की तरह रवैया नहीं अपनाएंगे।

     कुल मिला कर जो कुछ इस्लामी जगत से संबंधित है वह यह है कि यह क्षेत्रीय आग सब को कमज़ोर कर देगी। खास तौर पर तीन बड़ी ताकतों यानि, ईरान, तुर्की और रूस को। इसके साथ ही सऊदी अरब और यूएई भी कमज़ोर होंगे जो इलाक़े में अधिक बड़ी भूमिका निभाने के इच्छुक हैं। लेकिन जहां तक चीन और रूस की बात है तो अमरीका का उनसे टकराव बढ़ेगा जो शीत युद्ध के काल से भी अधिक हो सकता है और यह टकराव आसानी से खत्म होने वाला नहीं है। Q.A.

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