Oct २४, २०२० २०:२९ Asia/Kolkata
  • अमरीका की आंखों के सामने ईरान ने 30 लाख बैरल तेल सीरिया पहुंचाया, अमरीका ने रोकने की हिम्मत क्यों नहीं की? रायुलयौम का धमाकेदार आलेख

लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र रायुल यौम से इस हफ्ते को सीरिया का हफ्ता कहा है क्यों? आप भी जानें।

बिना किसी संकोच के हम यह कह सकते हैं कि यह जो हफ्ता गुज़र रहा है यह सीरिया का हफ्ता है क्योंकि अब अमरीका औपचारिक रूप से यह स्वीकार कर रहा है कि उसने अपने प्रतिनिधि दमिश्क़ भेजे ताकि वहां बंद 6 अमरीकियों की रिहाई के लिए बातचीत का रास्ता खुल सके, उसके बाद ही क़तर और यूएई से सीरिया के लिए उड़ाने भी शुरु हो गयीं और अब 30 लाख बैरल से अधिक ईंधन के साथ कई पानी के जहाज़, सीरिया पर लगे अमरीकी व युरोपीय प्रतिबंधों की धज्जियां उड़ाते हुए उत्तरी सीरिया के बानियास बदंरगाह पर लंगर डाल दिया।

सीरिया की राजधानी से आने वाले दो बुनियादी चीज़ों का ब्योरा देते हैं जिनसे पता चलता है कि घेराबंदी के बीच सीरियाई जनता किस तरह संघर्ष कर रही है।  एक तो अमरीका और पश्चिमी की साज़िशों और अरबों के सहयोग की वजह से कोरोना के भयानक दौर में दवाओं  और चिकित्सा सुविधा का अभाव है और दूसरे पेट्रोल पंपों पर कई कई किलोमीटर लंबी लाइनें हैं।

यह बड़े अफसोस की बात है कि सीरियाई जनता को इस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़े जबकि अरब, पूरी दुनिया में सब से अधिक मालदार और तेल की दौलत से मालामाल समझे जाते हैं लेकिन लेबनान को छोड़ कर सीरिया के अरब पड़ोसी भी उसकी ओर से मुंह घुमाए हुए हैं। यह वही सीरियाई जनता है जिसके जियालों ने अरबों के सम्मान के लिए हज़ारों सिपाहियों के प्राणों की आहूति दी है।

अरब तो आजकल इस्राईली लुटेरों के साथ पेंगे बढ़ाने में व्यस्त हैं और इस के साथ ही सीरिया की घेराबंदी में भी जम कर सहयोग कर रहे हैं जैसा कि पिछले दस वर्षों के दौरान वह सीरिया को तबाह करने की योजनाएं बनाने में व्यस्त रहे । इन हालात में सीरिया की संघर्ष करने वाली जनता के साथ ईरान के अलावा कोई खड़ा नहीं है। ईरान उनकी सरकार की रक्षा करता है, उनकी घेराबंदी को तोड़ता है जबकि खुद 40 वर्षों से भी अधिक समय से घेराबंदी का शिकार है उसके बाद इस्राईल से संबंध बनाने वाले कुछ लोग पूछते हैं कि सीरिया, ईरान के साथ क्यों है? और अरब डालर के बदले ईरान से दूरी क्यों नहीं बना रहा है?

 

जब अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प अपने दो सहयोगियों को गुप्त रूप से दमिश्क़ भेजते हैं और उससे पहले हाथ से लिखा हुआ एक खत सीरियाई राष्ट्रपति बशार असद के नाम भेजते हैं जिसमें डील की बात करते हैं, घेराबंदी हल्की करने का वादा करते हैं और उसके बदले जासूसी और विभिन्न अपराधों में सीरियाई जेलों में बंद 6 अमरीकियों की रिहाई की मांग करते हैं ताकि अमरीकी मतदाताओं के बीच अपनी पीठ थपथपा सकें तो इसका मतलब यह है कि समस्या में ट्रम्प हैं, घुटना वह टेक रहे हैं और अपने दुश्मन की कानूनी हैसियत  और उसकी विजय स्वीकार कर रहे हैं, यानि उसकी विजय जिसके खिलाफ उन्होंने दुनिया के 70 देशों को जुटाया था और जिसे सत्ता से हटाने के लिए उन्होंने अमरीकियों के 90 अरब डालर खर्च तो किये हैं और अपने अरब एजेन्टों को भी पानी की पैसा बहाने पर मजबूर किया।

अरब राष्ट्रों के खिलाफ अमरीकी साज़िशें जिनका ब्योरा अमरीका की भूतपूर्व विदेशमंत्री हिलैरी क्लिंटन के ईमेलों से सामने आया है, सीरिया की बहादुर सेना के संघर्ष से नाकाम हुई है जिसमें उसके मुख्य रूप से ईरान, रूस और हिज़्बुल्लाह जैसे उसके दोस्तों के बलिदानों ने मुख्य भूमिका निभाई है।

अमरीका के दोनों प्रतिनिधि, जैसा कि अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियों के मुंह से निकल गया, एक भी अमरीकी बंदी को रिहा कराए बिना हाथ झुलाते अमरीका वापस लौट गये क्योंकि उनसे वार्ता करने वाले सीरियाई जनरल, अली ममलूक ने ठोस रूप से उन्हें जवाब दिया था कि जब तक सीरिया के उत्तर दक्षिण के क्षेत्रों और तेल के कुंओं से अमरीकी सैनिकों की वापसी नहीं होती तब तक न कोई वार्ता होगी और न ही किसी को रिहा किया जाएगा।

अमरीकियों की गुंडागर्दी और इस्राईल के साथ संबंध बनाने वाले अरबों की शर्मनाक हरकतों की वजह से इस्लामी जगत कठिन दौर से गुज़र रही है लेकिन यह दौर भी गुज़र जाएगा , भले ही थोड़ा समय लगे हमारे सामने सीरियाई राष्ट्र का मज़बूत संघर्ष एक आदर्श है, उनके संघर्ष में बहुत से पाठ हैं, आखिर में तमाशा ज़्यादा अच्छा नज़र आता है।Q.A.

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