Oct २६, २०२० २०:२७ Asia/Kolkata
  • ट्रम्प के बाद का मिडिल ईस्ट, सऊदी अरब और इस्राईल के लिए भयानक सपना, अलकुद्सुलअरबी का  ध्यान योग्य जायज़ा

लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र अलकुद्सुल अरबी ने अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव और ट्रम्प की संभावित हार के बाद के हालात का जायज़ा लिया है।

अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव का नतीजे का सांस रोक कर इंतेज़ार किया जा रहा है। अगले 3 नंबवर को ट्रम्प और बाइडन की क़िस्मत का फैसला होगा इसके साथ ही दुनिया के बहुत  से देशों की क़िस्मत का भी फैसला होगा।

इलाक़े के बुद्धिजीवी, अमरीका में राष्ट्रपति पद के दोनों प्रत्याशियों  के रुख के बारे में अलग अलग राय रखते हैं। तेल अबीव, रियाज़, अबूधाबी और अन्करा की इच्छा है कि ट्रम्प ही सत्ता में बाकी रहें जबकि तेहरान, दोहा, रामल्लाह और बैरुत में बाइडन की जीत और ट्रम्प काल के अंत की इच्छा है।

एसा लगता है कि बाइडन, अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव जीत रहे हैं अब यह अलग बात है कि बाकी बचे हुए कुछ दिनों में कोई चमत्कार हो जाए जिसकी वजह से ट्रम्प वाइट हाउस में बने रहें यह अंसभव तो नहीं मगर वास्तविकताओं  को देखते हुए कठिन ज़रूर है।

मिडिल ईस्ट के बारे में ट्रम्प की नीति तो स्पष्ट है लेकिन बाइडन का रुख स्पष्ट नहीं है। बाइडन ट्रम्प की विदेश नीतियों की यह कह कर आलोचना करते हैं कि वह अंधाधुंध और गैर तार्किक हैं। इस लिए बाइडन निश्चित रूप से अलग रास्ता अपनाने की कोशिश करेंगे जिसमें  पारदर्शिता और निरंतरता  होगी।

मध्य पूर्व के बारे में ट्रम्प की नीति पूरी तरह से स्पष्ट  है लेकिन बाइडन की नीति क्या होगी? बाइडन ईरान के साथ परमाणु समझौते में वापस आएंगे, सेंचुरी डील को रोक देंगे और गैर कानूनी कालोनी निर्माण को रोक देंगे,   बिन सलमान के पागलपन को नियंत्रण करने की कोशिश करेंगे और परशियन गल्फ में शांति स्थापना का प्रयास करेंगे। उनकी नीतियां, ट्रम्प की नीतियों के विपरीत और बाराक ओबामा की नीतियों से काफी करीब होंगी लेकिन निश्चित रूप से वह ओबामा की नीतियों को ही आगे बढ़ाने वाले नहीं होंगे। बाइडन अमरीका की उन पुरानी नीतियों को फिर से लाने का प्रयास करेंगे जिनसे ट्रम्प ने बगावत की है।

 

बाइडन की नीतियों की समीक्षा में यह कहा जा सकता है कि ओबामा की ही तरह वह व्यापक आयाम वाली नीति अपनाएंगे। जबकि अमरीका के लिए  मुख्य मुद्दे, आधुनिक तकनीक की मदद से ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, चीन और रूस की बढ़ती शक्ति की चिंता, ईरान के परमाणु शक्ति बनने से डर, यह स्वीकारोक्ति की फिलिस्तीन पर सहमति अंसभव है, तुर्की का बढ़ता हुआ  सैन्यवाद  और अमरीका के भीतर झड़पों और विवादों में वृद्धि जैसे विषय हैं।  

जो बाइडन हमारे इलाक़े से अमरीका के पीछे हटने की प्रक्रिया को जारी रखेंगे लेकिन इस राह में बड़ी सतर्कता से क़दम बढ़ाएंगे ताकि उतावलापन, अमरीकी प्रभाव में कमी और अमरीका के क्षेत्रीय घटकों की कमज़ोरी का कारण न बन जाए।

मूल रूप से इस बारे में बाइडन ओबामा की नीति अपनाएंगे लेकिन पूरी तरह से उसकी कटिबद्धता नहीं कर पाएगें। बाइडन इस सच्चाई की अनदेखी नहीं कर सकते कि अमरीका के अधिकांश बुद्धिजीवी, मध्य पूर्व में अमरीका के सैन्य हस्तक्षेप के विरोधी हैं। प्रतिबंध और सैन्य कार्यवाही की अमरीकी नीति अब तक सफल नहीं रही है। अमरीका विभिन्न देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध तो लगा देता है लेकिन इन प्रतिबंधों को राजनीतिक उपलब्धि में नहीं बदल पाता और उसे कोई लाभ नहीं मिलता मतलब व्यवस्था बदलने का उसका मक़सद पूरा नहीं होता।
     बाइडन अमरीका की पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहते। उन्होंने वादा किया है कि फिलिस्त पर ट्रम्प द्वारा लगाए गये प्रतिबंधों को खत्म करेंगे और बैतुलमुकद्दस में अमरीकी वाणिज्य दूतावास और वाशिंग्टन में फिलिस्तीनी दूतावास के बारे में ट्रम्प की गलतियों  को  सही करेंगे। इसी तरह यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि वह सेंचुरी डील को खत्म कर देंगे और इस्राईल को गैर कानूनी बस्तियां बनाने से रोकने की कोशिश करेंगे हालांकि  इस्राईल पर दबाव डालने का कोई प्रभावशाली साधन उनके पास नहीं है।

 

इस्राईल को अच्छी तरह से पता है कि जो भी हो जाए, बाइडन उस पर कभी दबाव नहीं डालेंगे और ओबामा की ही तरह, इस्राईल के बार बार के हमलों का समर्थन करेंगे। वास्तव में जो चीज़ इस्राईल के लिए चिंता का कारण बनी है वह यह डर है कि कहीं वह बाइडन पर दबाव डालने और उन्हें ईरान के साथ परमाणु समझौते में वापसी से रोकने में नाकाम न हो जाए। इस्राईल को डर है कि बाइडन, परमाणु समझौते से दूर रहने की उसकी इच्छा के विपरीत, युरोपीय देशों की मदद से परमाणु समझौते के मज़बूत करने की कोशिश करें जिसपर ओबामा के काल में हस्ताक्षर हुए थे और ओबामा ने उसे ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने का एकमात्र मार्ग कहा था।

ईरान के बारे में अमरीक रुख में बदलाव का सोच कर ही सऊदी शासकों की आंखों से नींद उड़ जाती है क्योंकि वह भी परमाणु समझौते का विरोधी है और उसकी इच्छा है कि दुनिया ईरान की घेराबंदी किये रहे ताकि उसकी शक्ति और गतिविधियां सीमित रहें।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस, मुहम्मद बिन सलमान और उनकी मंडली, बाइडन की जीत को  अपने लिए भयानक सपना समझते हैं उसकी वजह भी यह है कि बाइडन यमन युद्ध , खाशुकजी की हत्या, मानवाधिकार और ईरान के साथ संबंधों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के नज़रिये में विश्वास रखते हैं।

आज तो बाइडन का यही रुख है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि अगर इस्राईलियों ने सऊदी अरब के साथ, संबंध बनाने के बदल यमन के मामलें में अमरीकी दबाव से दूर रखने का सौदा किया तो क्या होगा? वैसे यह भी हो सकता है कि अगर अमरीका से संबंध बिगड़ने का खतरा बढ़ जाएगा तो बिन सलमान के खिलाफ एक विद्रोह भी हो सकता है।

क्या यह संभव है कि सऊदी अरब, अमरीकी दबाव से बचने के लिए इस्राईल की शरण में चला जाए? दुनिया की सब से बड़ी राजनीतिक घटना अगले कुछ हफ्तों तक अमरीका का राष्ट्रपति चुनाव होगा और जिस प्रकार से उसका प्रभाव है उसके दृष्टिगत यह मध्य पूर्व की भी सब से बड़ी राजनीतिक घटना हो सकती है। अगर सब कुछ अनुमानों के अनुसार हुआ तो बिन सलमान और नेतेन्याहू बुरी तरह से भंवर में फंस जाएंगे और तेहरान व रामल्लाह में लोग राहत का सांस लेंगे।

हालांकि अमरीका, दुनिया  की सबसे बड़ी ताक़त है लेकिन यह भी सच्चाई है कि वह राष्ट्रों और बुद्धिजीवियों  पर अपनी नीति थोप नहीं सकता। अब अगर ट्रम्प ईरान और फिलिस्तीन के नेताओं पर दबाव डालने में नाकाम रहे हैं तो हम क्यों यह सोचें कि बाइडन, दबाव के माध्यम से सऊदी अरब  और इस्राईल को अपनी बात मानने पर विवश करें देंगे?

इलाक़े के बारे में अमरीका की मूल इच्छाओं में कोई बदलाव नहीं आएगा बस जो चीज़ बदलेगी वह रणनीति होगी लेकिन वह भी अपनी जगह पर महत्वपूर्ण है लेकिन न्याय का दावा करने वाले डेमोक्रेट प्रत्याशी के  लिए सब से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह एसा रास्ता अपनाएं जो ट्रम्प के बाद सामने आने वाली चुनौतियों से मेल खाता हो। Q.A.

 

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