Nov १६, २०२० १०:२२ Asia/Kolkata
  • वह अरब देश कौन हैं जिन्होंने इस्राईल को मान्यता देने के लिए पाकिस्तान पर डाला भारी दबाव? पाकिस्तान ने जो रास्ता चुना है क्या होगा उसका अंजाम?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने हालिया इंटरव्यू में देश के आर्थिक हितों को दृष्टिगत रखते हुए उन अरब देशों का नाम  नहीं लिया जिन्होंने इस देश पर इस्राईल को मान्यता देने के लिए भारी दबाव डाला था मगर साथ ही उन्होंने बड़े ठोस अंदाज़ में कह दिया कि कुछ चीज़ें हैं जिन पर हरगिज़ समझौता नहीं हो सकता जबकि कुछ मामलों में नर्मी भी दिखाई जा सकती है।

इमरान ख़ान ने इस्राईल से समझौते के बारे में बेहद महत्वपूर्ण बातें की हैं। उन्होंने बहुत साफ़ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान उस समय तक इस्राईल को मान्यता नहीं देगा जब तक फ़िलिस्तीनियों की इच्छा के अनुसार फ़िलिस्तीन संकट का समधान नहीं हो जाता।

इमरान ख़ान ने भारी दबाव डालने वाले देशों यानी सऊदी अरब और इमारात का नाम तो नहीं लिया लेकिन इतना तो ज़रूर कहा कि इन देशों के साथ पाकिस्तान के व्यापक आर्थिक संबंध हैं। इससे यह भी साफ़ है कि पाकिस्तान जैसे ही मज़बूत आर्थिक स्थिति में पहुंचेगा उसूलों को लेकर उसका स्टैंड और ही दृढ़ व स्पष्ट हो जाएगा। शायद इस प्रकार के हालात में इमरान ख़ान उन देशों का नाम भी बता दें जो पाकिस्तान पर दबाव डाल रहे थे।

इमरान ख़ान के इंटरव्यू में यह बात भी साफ़ तौर पर बयान की गई कि कुछ बातें एसी होती हैं जिनके बारे में देश अपना स्टैंड नर्म कर सकता है लेकिन कुछ उसूल एसे हैं जिन पर किसी तरह भी समझौता नहीं हो सकता। पाकिस्तान के संस्थापक क़ाएदे आज़म मुहम्मद अली जेनाह की भी यही शैली थी।

इमरान ख़ान का पूरा इंटरव्यू देखा जाए और पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं और क्षेत्रीय स्तर पर उसके आर्थिक संबंधों पर नज़र डाली जाए तो आसानी से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान पर दबाव डालने वाले देश सऊदी अरब और इमारात थे। मगर इमरान ख़ान ने बहुत स्पष्ट संदेश दिया कि हुदैबिया नाम से मशहूर संधि के समय पैग़म्बरे इस्लाम ने कुछ बातों में नर्मी दिखाई लेकिन जब पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने मिशन की शुरुआत की और लोगों को एकेश्वरवाद की दावत दी तो वह हर दबाव और हर प्रलोभन को ठुकराते हुए अपने मिशन से पीछे नहीं हटे।

पाकिस्तान जिस रास्ते पर चल रहा है वह निश्चित रूप से कठिन है, खास तौर पर आज के हालात में जब इस देश पर भारी आर्थिक दबाव है लेकिन यह भी तय है कि प्रतिष्ठा और गौरव के साथ जीवन गुज़ारने का यही रास्ता है। उदाहरण देखना है तो अरब देशों पर एक नज़र डाली जा सकती है जिन्होंने आसानी का रास्ता चुना और अपनी जनता की भावनाओं को कुचलते हुए इस्राईल से संबंध स्थापित कर लिए ताकि ट्रम्प को ख़ुश कर सकें और ट्रम्प अमरीका में चुनाव हार गए। ट्रम्प तो चुनाव ही हारे मगर यह देश और भी बहुत कुछ हार गए हैं जिसका नतीजा और असर सामने आने में हो सकता है कि कुछ समय लगे लेकिन तीर तो चल चुका है।

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