Nov २५, २०२० ०९:३९ Asia/Kolkata
  • तुर्की के जहाज़ में घुस गए जर्मन सुरक्षा कर्मी स्टाफ़ को कर लिया गिरफ़तार...क्या आर्थिक प्रतिबंधों से पहले यह कड़ी वार्निंग है? अर्दोग़ान का क्या होगा जवाब?

तुर्की के समुद्री जहाज़ को जो लीबिया के मिस्राता शहर की ओर जा रहा था जर्मन युद्धक जहाज़ ने बीच में ही रोक लिया। जर्मन सुरक्षा कर्मी हेलीकाप्टर से तुर्क जहाज़ के बोर्ड पर उतरे और जहाज़ की तलाशी लेने के बाद कैप्टन और कर्मीदल को गिरफ़तार कर लिया। यह बहुत बड़ी घटना है जो सैनिक टकराव की सीमा तक आगे जा सकती है।

तुर्क प्रशासन ने अपने सरकारी बयान में इस घटना को जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का खुला उल्लंघन बताया है और तुर्क रक्षा मंत्री ख़लूसी अकार ने अपने जहाज़ों की रक्षा के लिए ज़रूरी इंतेज़ाम किए जाने का एलान किया है। तुर्क सरकार शायद अब अपने व्यापारिक जहाज़ों को युद्धक जहाज़ों से स्कोर्ट करने या व्यापारिक जहाज़ों पर सैनिक तैनात करने का इशारा दे रही है।

जर्मन सुरक्षाकर्मियों ने तुर्की के जहाज़ पर पूरी रात गुज़ारी और तलाशी लेते रहे लेकिन उन्हें हथियारों की कोई खेप नहीं मिली। जहाज़ पर इंसानी इस्तेमाल की चीज़ें लदी हुई थीं। इससे यह पता चलता है कि लीबिया में युद्धरत पक्षों को हथियारों की सप्लाई रोकने के लिए रोम में बनाई गई विशेष सैनिक कमान को तुर्क जहाज़ के बारे में जो ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी वह ग़लत बल्कि भ्रामक थी।

लीबिया की सीमा के निकट तुर्क जहाज़ पर जर्मन सुरक्षा कर्मियों का छापा मारना यह बताता है कि यूरोप ने अब तुर्की के मामले में अपना स्टैंड काफ़ी कठोर कर लिया है। यूरोप को लीबिया की लड़ाई में तुर्की का हस्तक्षेप सहन नहीं है।

इसके अलावा भी यूरोपीय संघ तुर्की को चेतावनी दे चुका है कि अगर उसने उन जल क्षेत्रों में तेल और गैस की खुदाई का काम किया जिनके बारे में यूनान और साइप्रस से उसका विवाद है तो तुर्की पर यूरोप की ओर से प्रतिबंध  लगा दिए जाएंगे। तुर्की तेल और गैस के भंडारों की खुदाई का काम रोकने के लिए तैयार नहीं है।

इस प्रकरण में जर्मन फ़ोर्स का सामने आना और तुर्की के जहाज़ की तलाशी लेना यह ज़ाहिर करता है कि जर्मन सरकार ने वर्तमान तनाव में यूनान, साइप्रस और फ़्रांस का साथ देने का फ़ैसला किया है। यह शायद यूरोपीय संघ की ओर से तुर्की पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने से पहले चेतावनी की कार्यवाही है।

यूरोपीय संघ को लीबिया में तुर्की का हस्तक्षेप क़तई पसंद नहीं आया था इसके बाद जब आज़रबाइजान और आर्मीनिया का विवाद शुरू हुआ तो तुर्की ने आज़रबाइजान की मदद के लिए अपनी सेना भेज दी। इस घटना के बाद तुर्की पर यूरोपीय संघ का ग़ुस्सा अपने चरम पर पहुंच गया ख़ास तौर पर इसलिए कि कराबाख़ संकट में आज़रबाइजान विजयी रहा।

यूरोप तुर्की का महत्वपूर्ण आर्थिक घटक है। यूरोप के साथ तुर्की का सालाना व्यापार 100 अरब डालर तक पहुंचता है। अब अगर मौजूदा हालात में जब तुर्की का आर्थिक संकट विकराल रूप धारण कर रहा है यूरोप ने तुर्की पर प्रतिबंध लगा दिए तो तुर्की की अर्थ व्यवस्था को भारी नुक़सान पहुंच जाएगा। रिपोर्टें हैं कि तुर्की के लोग आर्थिक संकट की आहट पाकर सोना ख़रीदने लगे हैं ताकि तुर्क करेंसी का मूल्य गिरे तो उन्हें नुक़सान न हो।

इस समय तुर्की पर यूरोप की ओर से भारी दबाव पड़ रहा है और अमरीका में बाइडन की सरकार आ जाने के बाद शायद यह दबाव और भी बढ़ जाएगा।

तुर्क सरकार इस दबाव का कैसे सामना करेगी क्या स्पेशल फ़ोर्स और युद्धक नौकाओं को इस्तेमाल करेगी और यूरोपीय व्यापारिक जहाज़ों की तलाशी लेना शुरू कर देगी? अगर यूरोप ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए तब उसके पास क्या रास्ता होगा? इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं।

यूरोप और तुर्की के बीच जारी तनाव आने वाले दिनों में तेज़ी से बढ़ेगा ख़ास तौर पर इसलिए कि आसार यही बताते हैं कि तुर्क सरकार पीछे हटने का कोई इरादा नहीं रखती।

स्रोतः रायुल यौम

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