Nov २५, २०२० २२:५५ Asia/Kolkata
  • ईरान को आजकल क्यों सूझबूझ भरा संयम रखना चाहिए? कैसे ट्रम्प, ईरान के बारे में बाइडन की राह में कांटे बिछा सकते हैं? पढ़ें इतालवी कूटनयिक  का जायज़ा

मिडिल ईस्ट आई पत्रिका में संयुक्त  राष्ट्र संघ में इटली के पूर्व राजदूत  का एक आलेख छपा है  जो बाइडन, ट्रम्प और ईरान के विषय पर बहुत से पहलुओं को उजागर करता है। पेश है इस लेख के कुछ भाग।  

इतिहासकार बहुत जल्दी अमरीका के हारे हुए राष्ट्रपति ट्रम्प की नीतियों  के प्रभावों का जायज़ा लेना शुरु कर देगें। हालात से यह लग रहा है कि ट्रम्प सत्ता में अपनी उपस्थिति के अंतिम सप्ताहों में कुछ ऐसा ज़हर उगलना चाहते हैं जिससे बाइडन के लिए समस्याएं उत्पन्न हो जाएं।

संयुक्त राष्ट्र संघ में इटली के पूर्व प्रतनिधि मार्को कार्नलोस ने मिडिल ईस्ट आई पत्रिका में लिखा है कि ट्रम्प के इस प्रकार के क़दमों से हट कर भी यह सच्चाई है कि तेहरान के साथ दोबारा वार्ता आरंभ होना और सन 2015 के परमाणु समझौते में वापसी बहुत कठिन है। इस राह में तीन बड़ी रुकावटें हैं, वाशिंग्टन में मौजूद विरोधी, मध्यपूर्व में अमरीका के घटक देश और बाइडन और उनके सलाहकारों का यह विचार कि कुछ शर्तों पर बात चीत करना चाहिए।

वाशिंग्टन में राजनीतिक  व सुरक्षा संस्थाओं में ईरान के साथ सहयोग का विरोध पाया जाता है और अगर सीनेट पर रिपब्लिकन का ही नियंत्रण बना रहा तो यह विरोध व्यापक भी हो सकता है।

मुख्य समस्या सन 2015 में हुए परमाणु समझौते के बारे में एक गलतफहमी में निहित है। बहुत से लोग  इस समझौते को ईरान की परमाणु महत्वकांक्षाओं पर लगाम लगाने का साधन ही नहीं बल्कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और मध्य पूर्व में उसकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने का भी साधन समझ बैठे थे मगर अफसोस की बात यह है कि परमाणु समझौते में स्पष्ट  रूप से इस प्रकार के मुद्दों को शामिल किये जाने के बारे में कोई बात नहीं कही गयी है। इसके लिए एक नयी वार्ता प्रक्रिया की ज़रूरत है  जिसमें क्षेत्र के सभी देश शामिल हों और उस विषय पर बात की जाए जिसे तेहरान और उसके घटकों की ओर से खतरा कहा जाता है।

 

इस्राईल और उसके नये अरब घटक यह चाहते हैं कि वाशिंग्टन ईरान को काबू में करने के लिए पहले की ही तरह मध्य पूर्व में व्यस्त रहे। वह वार्ता चाहते हैं लेकिन इस शर्त पर कि वार्ता के परिणाम में ईरान घुटने टेक दे। उनके लिहाज़ से ईरान के साथ किसी भी प्रकार का न्यायपूर्ण समझौता, बुरा होगा क्योंकि इस तरह से ईरान को अपनी उनके शब्दों में अस्थिरता पैदा करने वाली नीतियां जारी रखने का अवसर मिलेगा और इससे ईरान में व्यवस्था बदलने की प्रक्रिया में भी विलंब होगा।  

हालांकि सऊदी अरब, बाइडन की सरकार की ओर से बहुत अधिक असंतोष प्रकट कर रहा है लेकिन इसके बावजूद बहुत से सऊदी अधिकारियों ने बाइडन से अपील की है कि वह ईरान के साथ हुए समझौते में वापस न जाएं।

वर्तमान समय में अमरीका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति और उनके सलाहकारों ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते में वापसी के लिए जटिल शर्तें पेश की हैं। ट्रम्प सरकार ने सन 2018 में सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव क्रमांक 2231 का उल्लंघन करते हुए समझौते से निकलने का एलान किया और फिर ईरान के खिलाफ प्रतिबंध भी लगा दिये गये।

ईरान ने ट्रम्प के इस फैसले पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया प्रकट किये बिना एक साल तक संयम किया ताकि परमाणु समझौते के अन्य पक्ष ट्रम्प के प्रतिबंधों को प्रभावहीन बनाने की दिशा में क़दम उठाएं लेकिन जब ईरान परमाणु समझौते के अन्य पक्षों की ओर से किसी भी प्रकार के क़दम की ओर से निराश हो गया तो फिर उसने भी परमाणु समझौते की प्रतिबद्धताओं  के पालन में कमी की प्रक्रिया आरंभ कर दी।

कुछ दिन पहले ही बाइडन ने कहा था कि अगर ईरान समझौते में वापस आता है तो अमरीका भी अगले वार्ता के आरंभ के बिन्दु के रूप में समझौते में वापस चला जाएगा। दूसरी तरफ ईरान के विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ ने बाइडन के इस बयान पर प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहा था कि अगर वाशिंग्टन सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 के दायरे में अपने वचनों का पालन करे तो हम भी अपने वचनों का पालन करेंगे और अगर अमरीका परमाणु  समझौते में वापसी चाहता है तो हम उसकी वापसी की शर्तों के बारे में बात  करने पर तैयार हैं।

तेहरान ने प्रतिबंधों में कमी के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किये थे लेकिन यह वचन पूरा नहीं किया गया। ओबामा के सत्ताकाल में जिन अधिकारियों ने यह सब किया था उनमें  से कुछ निश्चित रूप से बाइडन के काल में भी सत्ता में आएंगे।

 

यह तो बाइडन के सत्ता में आने के बाद की बात है फिलहाल जितने दिन अभी ट्रम्प वाइट हाउस में हैं उसके दौरान ईरान और अमरीका में तनाव बढ़ने की आशंका है। इस दौरान यह भी हो सकता है कि अमरीका और इस्राईल ईरान के खिलाफ अन्य देशों में या फिर ईरान की सीमाओं के भीतर भी हमले करें।

इस्राईली सूत्रों ने बताया है कि कुछ दिन पहले इस्राईली प्रधानमंत्री नेतेन्याहू, अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो और सऊदी क्राउन प्रिंस बिन सलमान ने सऊदी अरब में खुफिया भेंट की है जो निश्चित रूप से इस बात का चिन्ह  है कि इनका ईरान के साथ तनाव बढ़ने वाला है।

इसके साथ ही सीरिया और लेबनान में जो कुछ हो रहा है उसका मक़सद हिज़्बुल्लाह को निशाना बनाना हो सकता है। ईरान से संबधिंत बताए जाने वाले इराक़ी संगठनों के हमले या फिर परशियन गल्फ में कथित रूप से ईरान की कार्यवाहियां भी तेहरान के खिलाफ व्यापक प्रतिक्रिया का बहाना बन सकती हैं। इसी तरह सऊदी अरब में तेल प्रतिष्ठानों पर हूतियों के नये आक्रमण या इलाक़े में अमरीका, इस्राईल या अरबों के हितों पर हमला भी युद्ध की आग भड़का सकता है।

यह भी हो सकता है कि परमाणु समझौते के कमज़ोर होने के बाद ईरान के परमाणु गतिविधियों में विस्तार का बहाना बना कर ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला भी कर दिया जाए।

हर वह घटना जो तनाव बढ़ा सकती है वह ईरान के सिलसिले में नयी नीति अपनाने की राह में नये राष्ट्रपति की राह में रुकावट खड़ी कर सकती है और इस प्रकार की घटना का कट्टरपंथियों के गलियारों में स्वागत  किया जाएगा इस लिए अब इन हालात में ईरान का कर्तव्य है कि वह रणनीतिक संयम का प्रदर्शन करे। Q.A.

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