Nov २६, २०२० १७:०३ Asia/Kolkata
  • यमन की दलदल से निकल भागने के  लिए बेचैन है सऊदी अरब...मगर जो हासिल किया है सब पर फिर जाएगा पानीः स्ट्रैटफ़ोर

अमरीका के स्ट्रैटफ़ोर स्टैटेजिक एंड सेक्युरिटी सेंटर का कहना है कि सऊदी अरब अब यमन युद्ध से बाहर निकलने की अपनी इच्छा का संकेत दे रहा है।

सेंटर ने अपनी वेबसाइट पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें यह कहा है कि सऊदी अरब ने जंग से यमन में अब तक जो कुछ हासिल किया है वह भी उसके हाथ से तेज़ी से निकलता जा रहा है।

अमरीका में सत्ता बदल जाने के बाद जो हालात हैं उनमें सऊदी अरब को यमन से ख़ाली हाथ लौटना पड़ेगा क्योंकि बाइडन सरकार को सऊदी अरब से कोई हमदर्दी नहीं है। दूसरी ओर यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन ने अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है और सऊदी अरब से अपनी शर्तें मनवाने की तैयारी कर चुका है।

कहा जाता है कि गत 17 नवम्बर को सऊदी अरब ने यमन की सनआ सरकार का नियंत्रण संभालने वाले अंसारुल्लाह या हूती संगठन के सामने प्रस्ताव रखा कि वह यमन में अपने लड़ाकों की संख्या घटा देगा लेकिन इसके बाद अंसारुल्लाह आंदोलन सऊदी अरब-यमन सीमा पर बफ़र ज़ोन बनाने पर तैयार हो जाए।

स्टैटफ़ोर सेंटर का कहना है कि सऊदी अरब का यह प्रस्ताव दरअस्ल अंसारुल्लाह के सामने हार स्वीकार कर लेने के अर्थ में है क्योंकि सऊदी अरब तो अंसारुल्लाह आंदोलन को यमन के राजनैतिक मंच से नाक आउट कर देने के लिए जंग में कूदा था।

दूसरी ओर तेल की क़ीमतें गिर जाने के कारण सऊदी अरब की आमदनी घटी है जबकि यमन युद्ध के चलते सऊदी अरब को विदेशों से मिलने वाला समरिक समर्थन भी कमज़ोर पड़ता जा रहा है। इन कारणों के चलते सऊदी अरब अब यमन युद्ध से पांव पीछे खींचने पर विवश हुआ है।

पांच साल के इस युद्ध में सऊदी अरब को बहुत सारे सैनिक गवांने पड़े जबकि भारी मात्रा में सैन्य उपकरण ध्वस्त हो गए या यमनी सेना और अंसारुल्लाह के गठबंधन के हाथ लग गए।

यमन युद्ध के कारण अमरीकी कांग्रेस में सऊदी अरब को लेकर आक्रोश है और कई बार मांग उठ चुकी है कि सऊदी अरब पर लगाम लगाई जाए।

क्षेत्रीय स्तर पर भी सऊदी अरब यमन युद्ध में अकेला पड़ता जा रहा हैं। इमारात ने लगभग सारे सैनिक बाहर निकाल लिए हैं।

यमन के दक्षिणी इलाक़ों में सऊदी गठबंधन को कुछ कामयाबी ज़रूर मिली लेकिन लड़ाई के प्रमुख मोर्चों यानी तइज़्ज़, मारिब और हुदैदा में सऊदी अरब का गठबंधन कोई प्रगति नहीं कर सका। बल्कि इन मोर्चों पर अंसारुल्लाह आंदोलन की प्रगति की ख़बरें आ रही हैं।

स्ट्रैटफ़ोर सेंटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब ने हवाई हमलों और यमन की नाकाबंदी से सारी उम्मीदें लगा रखी थीं मगर इससे यमन के आम नागरिकों को तो भारी नुक़सान पहुंचा लेकिन युद्ध के मोर्चों पर सऊदी अरब अपनी पोज़ीशन मज़बूत नहीं कर सका।

इंटैलीजेन्स सूचनाओं तक पहुंच रखने के लिए मशहूर इस सेंटर का कहना है कि बाइडन सत्ता काल में अमरीका और सऊदी अरब के बीच अविश्वास बढ़ेगा और रियाज़ सरकार गंभीर समस्याओं में पड़ जाएगी। बाइडन सरकार सऊदी अरब के लिए अमरीकी सामरिक समर्थन रोकने की कांग्रेस की कोशिशों के मार्ग में कोई रुकावट नहीं डालेगी। बल्कि हो सकता है कि जो बाइडन ख़ुद ही फ़ैसला करके यमन युद्ध में सऊदी अरब की लाजिस्टिक सपोर्ट बंद कर दें।

सऊदी अरब ने विकल्प के रूप में चीन और इस्राईल का चयन किया है मगर इस स्थिति के कारण सऊदी अरब तेज़ी से कमज़ोर पड़ता जा रहा है और यह बात यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन को अच्छी तरह मालूम है।

स्रोतः स्ट्रैटफ़ोर

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