Nov २६, २०२० १९:०९ Asia/Kolkata
  • ट्रम्प की हार का नेतनयाहू पर असर, मंत्रीमंडल में गहरे मतभेद

ज़ायोनी शासन के मंत्रीमंडल में मतभेद गहराते ही जा रहे हैं और प्रधानमंत्री नेतनयाहू के लिए हालात कठिन होते जा रहे हैं।

नवम्बर 2018 से मार्च 2020 तक इस्राईल में गहरा राजनैतिक संकट छाया रहा। एक साल में तीन संसदीय चुनाव कराए जाने के बावजूद किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला और कोई भी दल अपने बल पर सरकार नहीं बना सका। अंततः कोरोना के फैलाव के बाद लिकुड पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू और ब्ल्यू एंड वाइट पार्टी के प्रमुख बेनी गेंट्ज़, डेढ़-डेढ़ साल के लिए प्रधानमंत्री बनने और एक व्यपाक मंत्रीमंडल के गठन पर सहमत हो गए। मई 2020 में इस्राईल के वर्तमान मंत्रीमंडल के गठन के समय से ही उसे अनेक चुनौतियों का सामना रहा है लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती ख़ुद मंत्रीमंडल के अंदर पाया जाने वाला अविश्वास है। सच्चाई यह है कि जिस दिन मंत्रीमंडल का गठन हुआ, उस दिन भी नेतनयाहू और गेंट्ज़ के बीच विश्वास नहीं था और गेंट्ज़ व उनके घटकों के मन में यह चिंता थी कि नेतनयाहू, सत्ता से जिस तरह चिपके हुए हैं, उसे देखते हुए संभव है कि वे डेढ़ साल बाद प्रधानमंत्री का पद न छोड़ें।

 

नेतनयाहू द्वारा मंत्रीमंडल के अंदर उठाए गए क़दमों से यह अविश्वास और भी बढ़ गया। नेतनयाहू और गेंट्ज़ के बीच मतभेद का सबसे बड़ा मुद्दा बजट था जो अब भी जारी है। इसी  तरह नेतनयाहू ने इमारात व बहरैन से संबंध स्थापना के समझौते जैसे अहम विषय को भी मंत्रीमंंडल में गेंट्ज़ और उनके घटकों के सामने नहीं रखा था। बताया जाता है कि उन्होंने अपनी सऊदी अरब की यात्रा की बात भी मंत्रीमंडल से छिपाई है। नेतनयाहू और गेंट्ज़ के बीच विवाद व मतभेद का ताज़ा मामला यह है कि युद्धमंत्री गेंट्ज़ ने सूडान की यात्रा में इस्राईली प्रतिनिधि मंडल में कुछ सैन्य अफ़सरों को शामिल करने के नेतनयाहू के आग्रह को ठुकरा दिया है। उनका कहना है कि जब तक इस संबंध में कोई समझौता न हो और एक दूसरे को औपचारिक रूप से स्वीकार न किया जाए तब तक इस्राईली सैनिकों का सूडान भेजा जाना, सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है लेकिन नेतनयाहू इस बात से राजनैतिक लाभ हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

 

इस बीच नेतनयाहू ने सबमरीन स्केंडल के नाम से मशहूर आर्थिक भ्रष्टाचार के मामले में, जिसमें ज़ायोनी प्रधानमंत्री को अभियुक्त बनाया गया है, सैनिक चैनलों से लाभ उठाने के लिए बेनी गेंट्ज़ की कड़ी आलोचना की है। ज़ायोनी मंत्रीमंडल में पाया जाने वाला मतभेद सिर्फ़ प्रधानमंत्री व युद्ध मंत्री तक सीमित नहीं है बल्कि हाल ही में प्रधानमंत्री और ज्वाइंट चीफ़ आफ़ आर्मी स्टाफ़ के बीच भी गहरे मतभेद की ख़बरें सामने आई हैं। बताया जाता है कि नेतनयाहू को आर्मी चीफ़ कोख़ावी पर भरोसा नहीं है और अहम सुरक्षा मामलों में वे उनको महत्व नहीं देते और संवेदनशील सुरक्षा मामलों में दोनों पक्षों के बीच किसी तरह का सहयोग दिखाई नहीं देता।

 

इस्राईली समाचारपत्र हारेत्ज़ ने इस बारे में लिखा है कि नेतनयाहू, आर्मी चीफ़ को भविष्य में अपने लिए एक राजनैतिक ख़तरा समझते हैं और उन्हें भविष्य के संभावित प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं। इसी लिए वे कोशिश करते हैं कि कोई ऐसी चीज़ न कहें जिसे कोख़ावी भविष्य में चुनाव प्रचार के दौरान उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकें। यह अविश्वास इस हद तक है कि अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में कोरोना के फैलाव के बावजूद नेतनयाहू, इस घातक वायरस की रोकथाम के लिए सेना की संभावनाओं और उपकरणों को इस्तेमाल करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसी स्थिति में जब नेतनयाहू, आर्मी चीफ़ पर बिलकुल भी भरोसा नहीं करते और उन्हें सीमित करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं, ज़ायोनी गुप्तचर सेवा मूसाद के प्रमुख यूसी कोहेन पर उन्हें पूरा भरोसा है और उन्होंने एक तरह से कोहने को कोख़ावी के सामने ला खड़ा किया है। अंतिम बिंदु यह है कि अब बात साफ़ दिखाई देने लगी है कि अमरीका में डोनल्ड ट्रम्प के सत्ताकाल की समाप्ति और जो बाइडन के सत्ता में आने से इस्राईली सत्ता के ढांचे में नेतनयाहू की स्थिति भी डगमगाने लगी है। (HN)

 

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