Dec २०, २०२० १७:०७ Asia/Kolkata
  • जब सन्नाटा पसर जाएगा दुबई में .... तेल बेचने वाले देशों का अंधकारमय भविष्य ... एकॉनोमिस्ट की रिपोर्ट

ग्रेग कार्लस्ट्रोम ने एकॉनोमिस्ट में लिखा है कि कई दशकों से तेल पैदा करने वाले अरब देश, समस्या में हैं, जब तेल की क़ीमत कम होती है तो कहते हैं कि तेल पर अपनी निर्भरता कम करेंगे जब सच्चाई यह है कि जब तेल की क़ीमत कम होती है तो वह भारी खर्चे वाले सुधार कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ा सकते। फिर उत्पादन कम हो जाता है, मांग बढ़ जाती है और क़ीमत फिर से ठीक हो जाती है। कई दशकों से यही सिलसिला चल रहा है।

ग्रेग कार्लस्ट्रोम ने एकॉनोमिस्ट में लिखा है कि कई दशकों से तेल पैदा करने वाले अरब देश, समस्या में हैं, जब तेल की क़ीमत कम होती है तो कहते हैं कि तेल पर अपनी निर्भरता कम करेंगे जब सच्चाई यह है कि जब तेल की क़ीमत कम होती है तो वह भारी खर्चे वाले सुधार कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ा सकते। फिर उत्पादन कम हो जाता है, मांग बढ़ जाती है और क़ीमत फिर से ठीक हो जाती है। कई दशकों से यही सिलसिला चल रहा है।

    बहुत से लोग यह सोचने लगे हैं कि क्या यह चक्र खत्म होने वाला है? क्या अर्थ व्यवस्था में सुधार का समय आ गया है? कोविड-19 की वजह से तेल की मांग में जो कभी आयी उसकी वजह से सन 2020 में ब्रंट तेल की क़ीमत 21 डॉलर तक पुहंच गयी, सन 2021 में तेल की क़ीमत बढ़ेगी लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम है कि वह 51 डॉलर तक पहुंच जाए। तेल की क़ीमत में बहुत अधिक वृद्धि की उम्मीद करना बेकार है और जो भी हो यह पक्का है कि तेल बेच कर देश चलाने वाले मध्य पूर्व के देश, अपने बजट में संतुलन बनाने में सक्षम नहीं हैं।

    सऊदी अरब, क्षेत्र में तेल पैदा करने वाला सब से बड़ा देश है लेकिन वह तेल से हट कर आमदनी के स्रोतों की खोज जारी रखे हुए है। इस देश ने जूलाई में वैट को तीन गुना बढ़ा दिया, सऊदी अरब में बहुत से लोगों को यह आशा था कि 5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की वृद्धि अस्थाई होगी लेकिन अब उन्हें भी निराश होना पड़ेगा क्योंकि सऊदी अरब यह काम करने वाला नहीं है।

 

    कोविड-19 से सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्थ चरमरा गयी। सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को भत्ता भी बंद कर दिया, वैट बढ़ा दिया लेकिन इन सब के बावजूद उसके बजट का घाटा बढ़ता जा रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार बड़ी तेज़ी से कम हो रहा है। सरकारी विभाग, ठेकेदारों को अदायगी नहीं कर पा रहे हैं लेकिन इन हालात में भी सऊदी क्राउन प्रिंस, सुधार कार्यक्रम जारी रखे हैं और न्यूम जैसी अपनी महत्वकांक्षी योजनाओं को आगे बढ़ा रहे हैं। न्यूम एक अत्याधुनिक नगर है जिसे सऊदी अरब के पश्चिमोत्तरी रेगिस्तान में 500 अरब डॉलर के खर्चे से बनाया जा रहा है। यह नगर न्यूयार्क सिटी से 33 गुना अधिक बड़ा होगा।

    अपनी खूबसूरत और जगमगाती रातों के लिए मशहूर दुबई में भविष्य में रात में निकलने में डर लगेगा और बड़े बड़े टॉवर और खूबसूरत बंगले अंधेरे में डूबे रहेंगे। यूएई से लगभग दस लाख पलायन कर्ता वापस चले जाएंगे। नयी नयी बनने वाली इमारतों की वजह से प्रापर्टी के मूल्यों में भारी गिरावट आएगी जिसमें अभी से दस फीसद की गिरावट दर्ज की जा चुकी है इस लिए प्रापर्टी के सेक्टर में दुबई में विनाशकारी संकट आने वाला है।

    दुबई ने सन 2014 में 2 अरब डॉलर के बान्ड्स जारी किये। यूएई को कोरोना की वजह से बहुत अधिक नुक़सान हुआ है इस लिए उसने भी सऊदी अरब की तरह नीति अपनायी है। यूएई के लगभग सभी तेल स्रोतों के स्वामी अधूधाबी ने सितम्बर के महीने में 5 अरब डॉलर के बान्ड्स पेपर जारी किये जो एक साल में तीसरी बार था।  पहले भी अबूधाबी 10 अरब डॉलर के और बान्ड जारी कर चुका है। फार्स खाड़ी के अरब देशों में बान्ड पेपर जारी करने की लत क़तर से शुरु हुई। कुवैत भी बान्ड्स पेपर जारी करने का मन बना रहा है ताकि इस तरह अपने बजट के घाटे को पूरा कर सके। अन्य तेल उत्पादक देशों की तुलना में अधिक बेहतर आर्थिक दशा रखने वाले ओमान और बहरैन भी बान्ड्स पेपर की शरण में जाने पर मजबूर हुए।

 

    वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जो नतीजा निकाला जा सकता है वह यह है कि फार्स की खाड़ी के देशों का भविष्य अच्छा नहीं है और पूरी दुनिया में तेल की मांग कम ही रहने वाली है। सन 2020 में कम से कम तेल उत्पादन का फैसला करने वाले ओपेक प्लस को ज़्यादा तेल बेचने पर मजबूर होना पड़ेगा जिसका असर बाज़ार पर पड़ेगा। अब अगर जो बाइडन ईरान के साथ परमाणु समझौते में वापस जाते हैं और ईरान के बारे में नयी नीति अपनाते हैं तो ईरान का तेल भी बाज़ार में आएगा जिससे बाज़ार पर और भी दबाव बनेगा। हालांकि वर्तमान समय में आर्थिक समस्याओं से बचने के लिए बान्ड्स पेपर्स अच्छा समाधान नज़र आ रहा है और इससे समाज पर भी कम दबाव पड़ रहा है लेकिन इसकी वजह से तेल से हट कर अर्थ व्यवस्था बनाने का अभियान फिर से टल जाता है। ऐसे समय में जब यह पक्का है कि तेल की क़ीमत अब उस तरह से कभी ऊंचाई पर नहीं पहुंचेगी जैसा पहले पहुंचती थी तो यह भी निश्चित है कि उसी समय इलाक़े के तेल बेचने वाले देशों के शासक और राष्ट्रपतियो तथा प्रधानमंत्रियों की समझ में यह आएगा कि उन्हें अपनी अर्थ व्यवस्था में सुधार और तेल पर निर्भरता कम करना होगी हालांकि शायद तब कुछ देर हो चुकी होगी।Q.A

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