Dec ३०, २०२० १३:२८ Asia/Kolkata
  • इस्राईल के साथ जंग के वक़्त जनरल सुलैमानी लेबनान में थे मौजूद, सैयद नसरुल्लाह ने जनरल क़ासिम सुलैमानी के जीवन के बताए नये पहलू, वरिष्ठ नेता की भविष्यवाणी भी दिलाई याद, जानिए क्या थी...

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह का कहना है कि जनरल शहीद सुलैमानी जंग में हमेशा फ़्रंट लाइन पर रहते थे।

उन्होंने जनरल सुलैमानी की शहादत की बरसी के अवसर पर प्रेस टीवी से बात करते हुए कहा कि जनरल सुलैमानी ने 33 दिवसीय युद्ध के दौरान लेबनान की बहुत अधिक मदद की।

उनका कहना था कि लगभग 20 साल पहले जनरल सुलैमानी से मेरी पहली मुलाक़ात हुई थी और तब से उनसे हमारे गहरे संबंध हैं। उनका कहना था कि वह हमेशा ख़ुद की अपने दोस्तों से मिलने जाते और अपने संघर्ष की बात लोगों को बताते जबकि वह ख़ुद ही मैदाने जंग में मौजूद रहते थे।

सैयद हसन नसरुल्लाह का कहना था कि जनरल क़ासिम सुलैमानी के विचारा, हमेशा ख़तरों से खेलना था। उनका कहना था कि उनके सिर पर मौत का साया हमेशा मंडराता रहता था लेकिन इसके बावजूद वह हमेशा मैदाने जंग में फ़्रंट लाइन पर रहते थे।

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह का कहना था कि मैं इस विषय को लेकर हमेशा जनरल क़ासिम सुलैमानी का विरोधी रहा और  हमने हमेशा यह चाहा कि उन्हें फ़्रंट लाइन पर न जाने दें लेकिन हममें से कोई सफल नहीं हुआ और कोई भी उनको यह काम न करने पर मजबूर न कर सका।

उनका कहना था कि जनरल क़ासिम सुलैमानी में समस्याओं और कठिन दिनों को बर्दाश्त करने की बहुत ताक़त थी। मिसाल के तौर पर 33 दिवसीय युद्ध के दौरान, वह तेहरान से दमिश्क़ आए और हमसे संपर्क किया और कहा कि मैं दक्षिणी लेबनान आना चाहता हूं, मैंने कहा आप क्या कह रहे हैं? यह काम संभव नहीं है, सारे पुल और रास्ते बंद हैं, इस्राईली युद्धक विमानों ने हर लक्ष्य को निशाना बना रखा है, हम पूरी तरह से एक जंग की हालत में हैं, कोई भी बैरूत या ज़ाहिया जा सकता है, लेकिन जनरल सुलैमानी ने कहा कि अगर आपने गाड़ी नहीं भेजी तो मैं ख़ुद ही आ जाऊंगा, वह लेबनान आने के लिए परेशान थे और आख़िरकार लेबनान पहुंच गये।

सैयद हसन नसरुल्लाह ने कहा कि 33 दिवसीय युद्ध के दौरान उन्होंने हमारी बहुत मदद की, इराक़ी कमान्डरों ने मुझसे बताया कि दाइश से जंग के दौरान वह हमेशा फ़्रंट लाइन पर होते थे और सीरियाई और इराक़ी सैनिकों के साथ रहते थे, यह जनरल क़ासिम सुलैमानी की एक विशेषता रही है।

सैयद हसन नसरुल्लाह ने 33 दिवसीय युद्ध में जनरल क़ासिम सुलैमानी की भूमिका के बारे में कहा कि सबसे पहले तो यह कहना चाहिए कि युद्ध के आरंभिक दिनों में लेबनान में जनरल सुलैमानी की उपस्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण थी, वह लेबनान न आते, तेहरान में ही रहते और वहां से जंग की ख़बरों पर नज़र रखते, या दमिश्क़ जाते और वहां निकट से हमारे संपर्क में रहते, उस वक़्त दमिश्क़ पर इस्राईल का हमला नहीं हो रहा था लेकिन जनरल सुलैमानी लेबनान आने पर बल दे रहे थे।

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह का कहना था कि जैसे ही जनरल सुलैमानी लेबनान पहुंचे तो हमने सबसे पहली बैठक की, जंग शुरु होते ही वह शुरुआती दिनों में लेबनान पहुंच गये थे। बैठक ख़त्म होने के बाद वह कुछ दिन लेबनान में रहे और फिर तेहरान लौट गये ताकि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता को रिपोर्ट दें, जब वह लौट रहे थे तो हालात बहुत ख़तरनाक हो चुके थे, मैं फिर कह रहा हूं कि वह तेहरान या दमिश्क़ में ही रह सकते थे लेकिन वह लेबनान ही आना चाहते थे और जंग के अंत तक वह लेबनान में ही रहे।

उनका कहना था कि जनरल क़ासिम सुलैमानी तेहरान से फिर लेबनान लौटे और वह हमारे लिए वरिष्ठ नेता का संदेश लाए थे जिसे जनरल क़ासिम सुलैमानी ने अपने हाथों से लिखा था। इस पत्र में इस तरह कहा था कि यह युद्ध बहुत भीषण और सख़्त होगा, उस समय वरिष्ठ नेता ने 33 दिवसीय युद्ध को जंगे ख़ंदक़ की तरह क़रार दिया था, इस जंग के दौरान मदीने का घेराव कर लिया गया था और पैग़म्बरे इस्लाम और उनके साथियों के लिए बहुत सख़्त दिन थे।

सैयद हसन नसरुल्लाह का कहना था कि मैं बहुत ख़ुश था कि वरिष्ठ नेता ने हमें विजय का विश्वास दिलाया था जबकि सारी दुनिया यह कह रही थी कि किस तरह हिज़्बुल्लाह अमरीका, यूरोप, पश्चिम और अन्य  अरब देशों से मुक़ाबला कर सकता है जो इस्राईल का समर्थन कर रहे हैं, वरिष्ठ नेता ने कहा था कि हम जंग में जीतेंगे, हमें डटकर मुक़ाबला करना होगा, हमने ईश्वर पर भरोसा किया, यह वरिष्ठ नेता की ओर से एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी थी और इससे भी बढ़कर बात यह है कि उन्होंने कहा था कि इस युद्ध में जीतने के बाद हम क्षेत्र की एक शक्ति में बदल जाएंगे जिससे क्षेत्र की कोई भी शक्ति टकराने या जीतने की ताक़त नहीं रखती।  

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह कहते हैं कि मैं हमेशा अपनी जान को जनरल क़ासिम सुलैमानी पर न्योछावर करना चाहता था, एक दिन नमाज़ के बाद मेरे मन में मौत का फ़रिश्ता  का विचार आया और मैंने कल्पना की कि  उसने मुझसे कहा कि मैं ईरान जाकर जनरल क़ासिम सुलैमानी की जान  लेना चाहता हूं लेकिन  ईश्वर ने छूट भी दी है और वह आपकी जान के बदले, जनरल क़ासिम सुलैमानी की जान कुछ समय के लिए छोड़ दे, मैं सोच रहा था कि मैं मौत के फ़रिश्ते से क्या कहूं, मैंने निश्चिंत होकर कहा कि मेरी जान ले लो और जनरल क़ासिम सुलैमानी को भूल जाओ। (AK)

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