Mar ०२, २०२१ १३:४६ Asia/Kolkata

लगभग दस बरस पहले की बात है जब कुछ अरब देशों में तानाशाहों के खिलाफ जनता सड़कों पर निकल आयी। एक के बाद एक कई देशों में होने वाले विद्रोह का सिलसिला ट्यूनेशिया से शुरु हुआ था।

ट्यूनेशिा के तानाशाह बिन अली देश से भाग गये फिर बेहद मज़बूती से सत्ता पर पकड़ बनाए मिस्र के तानाशाह के पैर भी उखड़ गये उसके बाद लीबिया के जनरल ग़द्दाफी का नंबर आया और अंत में यमन के तानाशाह अली अब्दुल्लाह का भी यही अजांम हुआ मगर तब तक पश्चिमी देशों के लिए इस आंदोलन से अपने लिए खतरे की घंटी बज चुकी थी इसी लिए उन्होंने क्रांति के इस आंदोलन में दखल देना शुरु कर दिया जिससे क्रांति का रुख बदलने लगा। पश्चिमी देशों  में बहरैन, सऊदी अरब और जार्डन में तानाशाही सरकार का भरपूर समर्थन किया और आंदोलन का रुख अपने विरोधी देश सीरिया की ओर मोड़ने की कोशिश की जिसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे। सीरिया में हालात बिल्कुल अलग थे। इस से पहले जिन जिन देशों में क्रांति आयी वह सब अमरीका और पश्चिमी देशों के घटक थे लेकिन सीरिया में एसी सरकार थी जो अमरीकी नेतृत्व में पश्चिमी मोर्चे और इस्राईल की कट्टर विरोधी थी। इसी लिए यहां पर पश्चिमी नेताओं की हमदर्दी , बहरैन या सऊदी अरब की तरह शासकों से नहीं, बल्कि उनके विरोधियों से थी। अमरीका के इशारे पर सऊदी अरब सहित कुछ अरब सरकारें और अच्छे इनाम की लालच में तुर्की जैसे देश मैदान में कूद पड़े और सीरिया में आग लगा दी गयी। सन 2011 से विभिन्न आतंकवादी गुटों द्वारा शुरु होने वाली हिसां, दाइश नामक भयानक आतंकवादी संगठन के सामने आने के बाद इतिहास की बेहद खूनी लड़ाई में बदल गयी और इस देश के इतिहास पर एक अभूतपूर्व मानव त्रासदी का कलंक लग गया। इस बारे में तेहरान में रहने वाले पाकिस्तान के वरिष्ठ राजनीतिक डॉक्टर राशिद अब्बास नक़वी कहते हैं कि दुनिया भर के 80 देशों से भी ज़्यादा आतंकवादियों को सीरिया लाया गया था। 

अबू बशीर सीरिया के नागरिक हैं जो इस देश के राष्ट्रपति बश्शार असद के विरोधी थे। उनकी कहानी सुनने लायक़ है। साठ वर्षीय अबू बशीर दमिश्क में रहते थे और खेती बाड़ी करके गुज़र बसर करते थे। वह सीरिया में प्रदर्शनों के आरंभ के बारे में बताते हुए कहते हैं कि सीरिया के लोग और खुद मैं भी, भयानक संगठन दाइश के आने से पहले इस गलतफहमी में थे कि सारी समस्याओं की जड़ बश्शार असद और उनकी सरकार है। उस समय इस बात का भरपूर प्रचार किया जा रहा था कि बश्शार असद एक तानाशाह हैं और उन्हें सीरिया की सत्ता से हट जाना चाहिए। प्रदर्शनों का सिलसिला बढ़ता गया। मुझे अच्छी तरह से याद है कि हुम्स में बश्शार असद के खिलाफ प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गये । हुम्स के लोग बश्शार असद के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और सुरक्षा बल उन्हें रोक रहे थे तभी अचानक फायरिंग होने लगी और कई लोग मारे गये और घायल हो गये। इस दिन के बाद प्रदर्शन हिसंक हो गये लेकिन किसी को अनुमान नहीं था कि हालात का रुख क्या होने वाला है?। भारत के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक टीकाकार शकील हसन शम्सी कहते हैं कि, अमेरिका आरंभ से ही सीरिया में शांति नहीं चाहता था। जैसा कि अबूबशीर ने भी बताया, बश्शार असद के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले हथियारों के साथ निकल पड़े और कई इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया लेकिन धीरे धीरे इन प्रदर्शनों से विदेशी मेहमान जुड़ने लगे, उनका कहना था कि वह बश्शार असद के खिलाफ सीरिया जनता का साथ देना चाहते हैं। सब से भयानक मेहमान दाइश थे। अबूबशीर के अनुसार आतंकवादी संगठन इस्लामी नारा लगाता था और उसका कहना था कि वह सीरियाई जनता को बश्शार असद के पंजों से रिहाई दिलाएगा। अबूबशीर का कहना हैः हम पहले तो दाइश के आने से बहुत खुश हुए क्योंकि हमारी मांग बश्शार असद की सरकार का अंत और नयी सरकार का गठन था और दाइश यही दो वादे हम से कर रहा था। सीरिया के नगरों में खूनी घमासान शुरु हो गया और दाइश, सीरियाई विरोधियों की मदद से नगरों  पर क़ब्ज़ा करता चला गया और भी बहुत खुश थे।

अबूबशीर सीरिया राष्ट्रपति के विरोधी थे और दाइश की जीत से इतना खुश हुए कि अपने परिवार को लेकर एलेप्पो या हलब नगर चले गये जहां दाइश का राज था मगर वहां पहुंच कर बहुत कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा। वह कहते हैंः दाइश के सदस्य, नगरों पर क़ब्ज़ा करने के बड़े कड़े कानून लागू कर देते थे, नगर के चौराहे पर सज़ा देते और गर्दन उड़ाते। बश्शार असद के विरोधी बहुत खुश थे और नाच गा रहे थे। दाइश सीरियाई लड़कियों को विभिन्न बहानों से पकड़ लेता और फिर उन्हें बाज़ारों में बेच देता। सऊदी अरब, यूएई यहां तक कि युरोप तक के धनवान लोग आते और कम उम्र और खूबसूरत लड़कियों को  खरीद ले जाते। मैंने यह दृश्य खुद हलब के बाज़ार में देखा और चूंकि मेरी भी एक बेटी थी इस लिए मैं बहुत दुखी हो  गया , पिंजरे में बंद उस लड़की का रोना और बिकते वक्त उसकी व्याकुलता बहुत दिनों तक मुझे परेशान करती रही। अबूबशीर की बारी भी आ ही गयी । वह बताते हैं कि वहाबी प्रचारकों ने मेरे बेटे बशीर का ब्रेन वाॅश कर दिया था उसकी उम्र अभी मात्र 20 साल थी लेकिन उसे दाइश में शामिल कर लिया गया। उसने मुझे दाइश की एक कार्यवाही में हिस्सा लेने की अुनमति मांगी मगर मैंने विरोध किया मगर बशीर तो मेरी बात ही नहीं सुनता था। दाइश की ओर से हज़ार डालर हर महीने बशीर को मिलते थे। मैं हमेशा वहाबी विचारधारा का विरोधी था मैंने बशीर से पूछा दाइश के लिए क्यों युद्ध कर रहे हो ? उन्हें जानते हो? उनकी विचारधारा का कुछ पता है? तो मेरे बेटे ने कहा कि शिया काफिर होते हैं और उनकी हत्या करना हमारा कर्तव्य है। मेरा बेटा एक साल तक दाइश के साथ रहा और एक दिन सीरियाई सैनिकों के साथ झड़प में मारा गया। उसकी लाश भी हमें नहीं मिली। इस तरह से सीरिया के युद्ध में  मैंने अपना एकलौता बेटा गवां दिया और उसने खोखली वहाबी विचारधारा के लिए अपनी जान दे दी। यह कहानी सिर्फ अबूबशीर की नहीं है बल्कि सीरिया में क़दम पर इस तरह के बाप मिल जाएंगे जिनके बेटे और बेटियों को दाइश ने छीन लिया। मगर अभी अबूबशीर की कहानी ही खत्म नहीं हुई है।

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