Mar ०७, २०२१ १४:३१ Asia/Kolkata
  • मध्य पूर्व में चीन की शैली में प्रभाव ... ईरान व चीन के साथ ने उड़ायी अमरीका की नींद, अमरीका पत्रिका ने प्रकट  की चिंता ...

अमरीकी पत्रिका फॅारेन पॅालीसी ने ईरान अमरीका और चीन के संबंध में एक जायज़ा पेश किया है जो काफी रोचक है।

अमरीका 12 बरसों से मध्य पूर्व से निकलने की कोशिश कर रहा है लेकिन इन बरसों में ईरान, इस्राईल, रूस, सऊदी अरब और तुर्की के बीच प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई है। इस दौरान यह मानना पड़ेगा कि मध्य पूर्व में जारी खींचतान  का सब से अधिक फायदा चीन को हुआ है। बीजिंग तेल का सब से बड़ा खरीदार है। चीन चुपचाप एक बड़ी शक्ति बन रहा है और इलाक़े के सभी बड़े देशों से उसके मज़बूत  संबंध हैं। 

वाशिंग्टन को लगता है कि इसका मतलब यह है कि  मध्य पूर्व फिर से अखाड़ा बनेगा । मध्य पूर्व में चीन के बढ़ते प्रभाव से अभी तो वाशिंग्टन के हितों  को कोई खतरा नहीं है लेकिन इसके बावजूद ईरान से उसके गहरे संंबंध और अमरीका विरोधी शिया गुटों से उसका दोस्ताना, अमरीका के लिए चिंता जनक है  और अमरीका के लिए यह बाद में खतरा बन सकता है। बाइडन सरकार को चाहिए कि चीन व ईरान पर दबाव बढ़ाएं ताकि उनके स्ट्रेटजिक सहयोग  को कम किया जा सके। इसी तरह अमरीका की बाइडन सरकार को  यह समझना चाहिए कि इस्राईल और फार्स की खाड़ी के अधिकांश तटवर्ती देशों सहित मध्य पूर्व में उसके घटक, अमरीका व चीन के बीच जारी खींचतान का हिस्सा बनना पसंद नहीं करते। 

 

चीन के प्रसिद्ध रणनीतिकार वांग ने अपने एक लेख भविष्यवाणी की थी कि एशिया में जब चीन और अमरीका के बीच प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही होगी मध्यएशिया और मध्य पूर्व चीन के साथ संबंध में रूचि दिखाएंगे। उनका तर्क है कि मध्य पूर्व से अमरीका की मजबूरी में वापसी दोनों पक्षों के लिए जीत होगी क्योंकि स्वंय अमरीका भी अफगानिस्तान और पाकिस्तान में चीन की मदद से स्थिरता लाने की ओर से निराश हो गया है। 

अगर चीन का मक़सद, बिना झड़प के मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाना है तो सिल्क रोड इस संदर्भ में काफी सफल रहा है। जिन देशों ने इस परियोजना की पुष्टि की है उन्होंने एक तरह से चीन के साथ सहयोग का वचन दिया है। इन देशों में मिस्र, ईरान, इराक़, क़तर, सऊदी अरब , तुर्की, संयुक्त अरब इमारात जैसे देश शामिल हैं। यह वाशिंग्टन के लिए खतरे की घंटी है। यह देश लगभग किसी भी विषय में एक दूसरे से सहमत नहीं हैं लेकिन सब के सब चीन के साथ निकट संबंध के इच्छुक हैं। 

अमरीका के लिए सब से अधिक समस्याजनक मुद्दा चीन ईरान के बीच सहयोग है। ईरान में दोनों की धड़े चीन के समर्थक हैं और सिल्क रोड का खुले दिन से स्वागत करते हैं। दबाव बढ़ाने की ट्रम्प की नीति की वजह से ईरान में कट्टरपंथियों को कई गुना शक्ति मिल गयी है। चीन व ईरान के संंबंध दशकों से मैत्रीपूर्ण रहे हैं लेकिन ट्रम्प के काल में इस दोस्ती में वृद्धि हुई है। प्रतिबंधों के बावजूद चीन ईरान से भारी मात्रा में तेल खरीदता है। 

पूरे इलाक़े के शिया गुट चीन से जुड़ रहे हैं क्योंकि वह अमरीका के मुकाबले में चीन को शक्ति का संतुलन बनाने वाला पक्ष समझते हैं। इराक़ से लेकर सीरिया व लेबनान तक शिया संगठनों ने बारम्बार चीन की प्रशंसा की है। हैरत की बात यह है कि चीन से ईरान और शिया संगठनों के संबंधों पर सुन्नी बाहुल्य देशों को भी कोई परेशानी नहीं है। सऊदी अरब ने तो अपने स्कूलों में चीनी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाना शुरु कर दिया है। 

मध्य पूर्व में चीन से दूर रहे की अमरीका की सिफारिश पर कोई देश कान नहीं धर रहा है यहां तक कि इस्राईल भी चीन से व्यापारिक संबंध सीमित करने के अमरीकी दबाव के सामने डटा है। 

अमरीका हिज़्बुल्लाह के प्राप्त चीन का समर्थन रोकने का भरसक प्रयास कर रहा है लेकिन वाशिंग्टन को चीन के लिए यह संदेश भेजना चाहिए कि हिज़्बुल्लाह का समर्थन जारी रखने की दशा में चीन को उस की भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। वाशिंग्टन, इलाक़े में सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के झगड़ों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयास में है क्योंकि मध्य पूर्व में हालात चीन के हित में हैं। हालांकि अभी सीधे रूप से अमरीका के हित खतरे में नहीं हैं लेकिन जिस तरह से चीन बड़ी खामोशी से मध्य पूर्व में अपने लिए घटक तलाश कर रहा है और जिस तरह से एक एक करके देश उससे जुड़ रहे हैं वह आश्चर्यजनक है और उस पर नज़र रखने की ज़रूरत है। Q.A.

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