Feb २२, २०२० १९:५० Asia/Kolkata
  • नया सवेराः डेविड स्टेनली का कहना है कि अब मैं मुसलमान हो गया हूं तो दूसरों की नहीं अपनी बुराई खोजता हूं

इस लेख में हम मुसलमान होने वाले तीन आस्ट्रेलियन नागरिकों के बारे में बताएंगे।  आस्ट्रेलिया के रहने वाले David Stanley डेविड स्टेंली कहते हैं कि मुसलमान होने से पहले और मुसलमान होने के बाद मैं दो अलग प्रकार का व्यक्ति बन गया।

 अब मैं पहले की तरह लोगों के बारे में नहीं सोचता।  मैं अब अधिकतर अपने भीतर के बारे में विचार करता हूं।  दूसरों के भीतर बुराई निकालने के बजाए अब मैं अपने भीतर की बुराई ढूंढता हूं।  मेरा यह प्रयास रहता है कि मैं अपने अंदर सुधार करूं।  स्टेंली कहते हैं कि मैंने यह बात नोट की है कि यह बातें दूसरों को प्रभावित करती हैं।

लोगों के विचारों को बनाने में इस समय सामूहिक संचार माध्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका है। संसार के बड़े संचार माध्यमों का संबन्ध यूरोपीय देशों से है। यह संचार माध्यम अपनी निर्धारित नीतियों के आधार पर ही काम करते हुए लोगों के विचारों को प्रभावित करते हैं। पश्चिम के अधिकांश संचार माध्यमों की एक मुख्य नीति इस्लाम के वास्तविक चेहरे को हिंसक दर्शाना है।  यह संचार माध्यम इस्लाम को हिंसक और चरमपंथी धर्म के रूप में पेश करते हैं।  हालांकि कुछ संचार माध्यम एसे भी हैं जो इस्लाम की वास्तविक छवि को दिखाते हैं।  इस प्रकार के संचार माध्यमों में से एक, आस्ट्रेलिया के एक टीवी कार्यक्रम सनराइज़ ने आस्ट्रेलिया के तीन नए मुसलमानों David Stanley डेविड स्टेंली  Susan Karl सूज़ैन कार्ल और Stacy Mohammad स्टेसी मुहम्मद के इन्टरव्यू दिखाए।  श्रीमती सूज़ैन कार्ल यूनीवर्सिटी प्रोफेसर हैं जबकि डेविड स्टेंली इन्जीनियर हैं और स्टेसी मुहम्मद एक आम नागिरक हैं।  इन संक्षिप्त इंटरव्यूज़ में इस्लाम की कुछ बातों को पेश किया गया।

सुज़ैन कार्ल

 

तीन अलग-अलग विचारधाराओं के स्वामी आस्ट्रेलिया के इन तीन नागरिकों ने इस्लाम को एसे धर्म के रूप में स्वीकार किया है जो मनुष्य को लोक-परोलक दोनो स्थानों पर मुक्ति देने वाला है।  श्रीमती सूज़ैन कार्ल यूनीवर्सिटी प्रोफेसर हैं जो पहले ईसाई धर्म को मानती थीं।  यही कारण है कि टीवी एंकर ने पहले उनसे पूछा कि क्या उनके जीवन में धर्म महत्वपूर्ण रहा है।  इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हां, मुझको हमेशा ही ईश्वर पर भरोसा रहा है।  मैं एक ईसाई परिवार में जन्मी और पली-बढ़ी।  हमारे परिवार को लोग पाबंदी से गिरजाघर जाया करते थे।  इस हिसाब से मेरे जीवन में धर्म की सदैव ही भूमिका रही है।

डेविड स्टेनली

हालांकि डेविड स्टेंली की स्थिति कुछ अलग है।  उनका कहना है कि आस्ट्रेलिया के अन्य युवाओं की तरह मैं भी शराब पीता था।  सिगरेट पीता था और अपना अधिकांश समय मनोरंजन में गुज़ारा करता था।  इससे पता चलता है कि स्टेंली को धर्म से कोई विशेष लगाव नहीं था।  स्टेसी मुहम्मद वास्तव में संशयवादी थे।  वे एक गांव मे पले बढ़े थे।  उनको ईश्वर के अस्तित्व के बारे में शंका थी।  विचित्र बात यह है कि तीन अलग-अलग विचारधाराओं के आस्ट्रेलियन नागरिकों ने किन बातों को देखकर अपने लिए इस्लाम को एक परिपूर्ण धर्म के रूप में चुना?

जब सनराइज़ टीवी कार्यक्रम के एंकर ने श्रीमती सूज़ैन कार्ल से यह सवाल किया कि उन्होंने इस्लाम को क्यों अपनाया तो इसके जवाब में उनका कहना था कि युवाकाल में मैंने इस बारे में जांच-पड़ताल आरंभ कर दी थी कि क्या धर्म के बारे में मेरी आस्था ठीक है या नहीं।  वे कहती हैं कि क्योंकि मेरा जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ था इसलिए मेरे भीतर धर्म के प्रति लगाव पाया जाता है।  मेरे मन में अपने जीवन से संबन्धित कई प्रश्न थे जिनके  उत्तर के लिए मैं परेशान रहा करती थी। मुझको संसार के बारे में और मौत के बाद के संबन्ध में बहुत कुछ जानना था।  मुझको यह जान कर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि इस्लाम के पास मेरे सारे सवालों के जवाब मौजूद हैं।  यही कारण है कि मैंने इस्लाम को स्वीकार करने का फैसला किया।

इसके बाद सनराइज़ कार्यक्रम के एंकर ने स्टेंली से यह पूछा कि आप क्यों मुसलमान हुए। उनका जवाब था कि आरंभ में मैं जातिवादी था।  मुझको न तो मुसलमान पसंद थे और न ही मैं मुसलमान होना चाहता था।  इस्लाम के बारे में मेरा मानना था कि यह एक रूढ़िवादी धर्म है जो संसार के एक विशेष क्षेत्र से संबन्धित है।  इसके मानने वाले पिछड़े हुए हैं।  एंकर स्टेंली का कहना था कि मेरे हिसाब से मुसलमानों का यह मानना है कि जो भी मुसलमान नहीं है उसको बलपूर्वक मुसलमान किया जाए।

स्टैसी मुहम्मद

 

संसार में एसे बहुत से लोग हैं जो एसे धर्म की तलाश में रहते हैं जो उनकी प्यासी आत्मा को तृप्त कर सके।  इस प्रकार वे अपने जीवन में भटकाव के बदले शांति के इच्छुक हैं।  संचार माध्यमों से प्रभावित होकर डेविड की विचारधारा इस्लाम विरोधी हो गई थी।  वह इस्लाम के बारे में नकारात्मक सोच रखते थे।  बाद में संयोग से एक मुसलमान से बातचीत के बाद डेविड के विचारों में बदलाव आया।  कुछ समय के बाद डेविड मुसलमान हो गए।  अपने मुसलमान होने के बारे में डेविड कहते हैं कि एक मुसलमान से बातचीत करने के बाद मुझको यह समझ में आने लगा कि इस्लाम के बारे में उनके विचार ग़लत थे।  अब मेरी समझ में आ गया कि इस्लाम और मुसलमानों के बारे में मेरी सोच बिल्कुल विपरीत थी।  अब मैंने इस्लाम के बारे में खोजबीन शुरू कर दी।

जब एंकर ने उनसे पूछा कि मुसलमान होने के बाद आपके जीवन में कितना बदलाव आया तो उन्होंने कहा कि मुसलमान होने से पहले और मुसलमान होने के बाद मेरे जीवन के दो रूप हो गए।  अब मैंने व्यक्तिगत रूप में अपना अधिक ध्यान अपनी ओर मोड़ दिया।  मैंने शराब छोड़ दी। सिगरेट तो बहुत पहले से छोड़ दी थी।  मैंने अपने भीतर से भी सुधार का काम शुरू कर दिया।  दूसरों के भीतर बुराई निकालने के बजाए अब मैं अपने भीतर की बुराई ढूंढता हूं।  मेरा यह प्रयास रहता है कि मैं अपने अंदर सुधार करूं।

दूसरों की नहीं अपनी कमियां खोजना चाहिए

 

डेविड, जो दूसरों की बुराई न करने और अपने भीतर सुधार करने की बात कहते हैं, यह मूल रूप से इस्लाम का आदेश है।  पवित्र क़ुरआन के सूर 105 में ईश्वर कहता है कि हे ईमान लाने वालों, हमेशा अपने बारे में होशियार रहो।  आयतों के अतिरिक्त इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम के भी कई कथन पाए जाते हैं जिनमें दूसरों की बुराई न करने और स्वयं में सुधार करने की बात कही गई है।  इस संबन्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि सौभाग्यशाली है वह व्यक्ति जो अपनी बुराइयों के कारण दूसरों की बुराई करने से बचे।

बहुत से एसे परिवार हैं जो अपने सदस्यों के बारे में इस्लाम को लेकर बहुत ही संवेदनशील होते हैं।  हालांकि बहुत लोग एसे भी हैं जिनको मसुलमान करने में उनके ही परिजनों का हाथ रहा है।  इस बारे में इस्लाम के उदयकाल की एक घटना यहां पर पेश कर रहे हैं जो वास्तव में बहुत ही रोचक है।

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्लाम के काल में एक ईसाई युवक मुसलमान हो गया जिसका नाम "ज़करिया बिन इब्राहीम" था।  मुसलमान होने के बाद उसने हज किया और हज करने के बाद इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की सेवा में पहुंचा।  उन्होंने इमाम को बताया कि मेरे माता-पिता और पूरा परिवार ईसाई है।  मेरी मां अंधी हैं।  ज़करिया का कहना था कि मुसलमान होने के बाद क्या मैं अपनी मां के साथ रह सकता हूं? इसपर इमाम ने उनसे कहा कि तुम अपनी मां का पूरा ख़्याल रखो।  उनके सारे काम तुम करो।  उनका कोई भी काम दूसरों के हवाले न करो।  जब वे इस संसार से जाएं तो उनका अन्तिम संस्कार भी तुम ही अंजाम दो।

"ज़करिया बिन इब्राहीम" कहते हैं कि जब मैं अपने नगर कूफ़े गया तो मैंने अपनी मां के साथ उसी प्रकार का व्यवहार किया जैसा इमाम ने मुझको बताया था।  वे कहते हैं कि अपनी मां के सारे काम मैं स्वयं करता और उनके साथ अधिक प्रेम से बात करता।  एक दिन मेरी मां ने मुझसे कहा कि बेटा जबसे तुमने नया धर्म अपनाया है तुम्हारे भीतर बहुत बदलाव आ गया है।  जब तुम हमारे धर्म पर थे तो इतने कृपालू और हमदर्द नहीं थे।  एसा क्या हुआ कि नया धर्म अपनाने के बाद तुम्हारे भीतर बहुत अधिक अच्छी बातें आ गईं।  इसपर उन्होंने अपनी मां को इमाम जाफ़र सादिक़ के कथन के बारे में बताया जिसमें उन्होंने कहा था कि तुम अपनी माता के सारे काम ख़ुद किया करो।  ज़करिया की मां ने कहा कि वास्तव में तुम्हारा धर्म बहुत अच्छा धर्म है और मैं भी अब इसी धर्म का पालन करूंगी।  बाद में वह भी ज़करिया की तरह मुसलमान हो गईं और उन्होंने इस्लामी नियमों पर अमल करना शुरू कर दया।

सनराइज़ टीवी कार्यक्रम के एंकर का स्टेंसी से अन्तिम प्रश्न यह था कि जब आप यह सुनें कि अल्लाह का नाम लेकर एक आतंकवादी हमला किया गया है तो इसपर आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है? उन्होंने कहा कि इसको सुनकर मुझको बहुत दुख होता है।  उनका कहना है कि संसार के किसी भी स्थान पर किसी की हत्या करना अपराध है जिसको सुनकर मन दुखी होता है।  वे कहते हैं कि अधिक दुख उस समय होता है जब कोई आतंकवादी हमला, इस्लाम के नाम पर किया जाए।  इस प्रकार मेरे धर्म की बदनामी होती है।  मुझको इस्लाम की वास्तविकता का पता है और यह धर्म किसी भी स्थिति में आतंकवादी कार्यवाहियों की अनुमति नहीं देता है।  वे कहते हैं कि एक मुसलमान होने के नाते जब लोग मुझको इस दृष्टि से देखते हैं कि मेरा भी आतंकवाद से संबन्ध है तो बहुत दुख होता है क्योंकि हम आतंकवाद के विरोधी हैं।

टैग्स

कमेंट्स