Feb २४, २०२० २०:५७ Asia/Kolkata
  • दाइश का नया बसेराः दाइश की विचार धारा की नींव और आधार

हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि अतिवादी तकफीरी विचारधारा का प्रेरणा स्रोत वहाबियत है। इस विचारधारा में हिंसा व कट्टरपंथ के अलावा कुछ नहीं है।

ब्रिटेन की खुफिया एजेन्सी एम आई-6 के पूर्व अधिकारी, एलस्टर क्रोक इस बारे में कहते हैं ः दाइश मूल रूप से एक वहाबी संगठन है और निश्चित रूप से सऊदी अरब में प्रचिलत वहाबी विचारधारा से प्रेरित एक आंदोलन है लेकिन वहाबियत की आरंभिक विचारधारा से कई गुना अधिक कट्टर है।

आज इस सच्चाई से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हालिया दशकों में आतंकवादी संगठनों  की रचना में सऊदी अरब में पनपने वाली वहाबी विचारधारा की मुख्य भूमिका रही है और यह सब को मालूम है कि वहाबियत की विचारधारा का आरंभ ब्रिटिश एजेंट मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने किया था। एक सनकी धर्मगुरु मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने एक ब्रिटिश जासूस के भड़कावे में आकर और एक साज़िश के तहत अपना काम शुरु किया और  एकेश्वरवाद को पुनर्जीवन प्रदान करने के दावे के साथ इब्ने  तैमिया नामक बेहद कट्टरपंथी धर्मगुरु के विचारों का प्रचार व प्रसार किया। यही वजह है कि दाइश के आतंकवादी अपने सभी अपराधों और कृत्यों के लिए वहाबी मुफ्तियों  के फतवों को आधार बनाते हैं।

मिस्र के पत्रकार इब्राहीम ईसा, वहाबियत को इस्लामी जगत के लिए एक रोग बताते हैं। उनका मानना है कि वहाबियों ने पूरी दुनिया में आग लगा दी है। वह अल्लाहो अकबर का नारा लगाते हैं और बेगुनाहों को गोलियों से भून देते हैं और हर प्रकार के ज्ञान से कोरे और मूर्खता में डूबे होते हैं। दाइश के आतंकवादी केवल स्वयं को मुसलमान समझते हैं और दावा करते हैं कि केवल वही स्वर्ग में जाएंगे और अन्य सभी लोग अधर्मी हैं। यह विचारधारा केवल वहाबियों की है। 

सऊदी मुफ़्ती अब्दुल अज़ीज़ आले शैख़ जो चरमपंथी विचारों वाले फ़तवे देते हैं

 

यही वजह है कि अफ़ग़ानिस्तान में दाइश की तकफीरी विचारधारा, सांप्रदायिकता की भूमिका प्रशस्त कर रही है। सन 2014 में दाइश ने अपनी तथाकथित इस्लामी खिलाफत का नक्शा जारी किया तो उसमें पूर्वी राज्य " खुरासान" का नाम दर्ज किये जाने के बाद से अफगानिस्तान पर दाइश का ध्यान केन्द्रित होने के  बारे में खुल कर लोगों को पता चला। आतंकवादी गुट दाइश ने " फत्ह" नाम से उर्दू और पश्तू भाषा में एक पत्रिका प्रकाशित की और उसे सन 2014 में सितंबर के महीने में अफगानिस्तान के क़बाइली क्षेत्रों में बांट दिया। इसी प्रकार दाइश ने 13 जनवरी सन 2015 को एक वीडियो प्रसारित किया जिसमें काबुल युनिवर्सिटी की दीवारों पर कुछ नारे लिखे हुए थे।  इस प्रकार से दाइश ने अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति की घोषणा कर दी। 

इस्लामी बुद्धिजीवी और प्रचारक सैयद मुस्तफा मूसवी का कहना है कि दाइश ने व्यापक प्रचार और लुभावने नारों द्वारा पूरी दुनिया से रंगरूट भरती करने की कोशिश की इस प्रकार से उसने दुनिया के अधिकांश देशों के लिए, युवाओं में दाइश की ओर झुकाव की चुनौती पैदा कर दी। अफगानिस्तान में तो यह विषय एक चिंता के रूप में सामने आया है। 

अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में दाइश को बहुत शक्तिशाली संगठन ज़ाहिर करता है

 

अब यह अहम सवाल पैदा होता है कि दाइश ने क्यों पश्चिमी एशिया में अपने हारे हुए सदस्यों को एकत्रित करने और कार्यवाहियों के लिए केन्द्र के रूप में अफ़गानिस्तान को चुना है? इस सवाल के जवाब में टीकाकार और विशेषज्ञों का यह कहना है कि इसके पीछे इस क्षेत्र में अमरीका, इस्राईल और सऊदी अरब के गैर क़ानूनी उद्देश्यों की भूमिका है। जब से अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला किया है इस देश में हिंसा और आतंकवाद तथा कट्टरपंथ पूरी तरह से फैल गया है जिसकी वजह से अफ़गानिस्तान संकट बेहद जटिल बन गया है। एसा लगता है कि अफ़गानिस्तान के हालात का फायदा उठाते हुए अमरीका दाइश को इस देश में भेज रहा है ताकि वह अफ़गानिस्तान को अपने उद्देश्यों की पूर्ति का केन्द्र बना ले। 

अफ़ग़ानिस्तान में दाइश की आमदनी का एक माध्यम मादक पदार्थ हैं

 

यदि अफगानिस्तान के हालात पर ध्यान दिया जाए तो यह देश सुरक्षा, विचारधारा, आर्थिक पहलुओं और भौगोलिक स्थित की दृष्टि से दाइश के लिए महत्वपूर्ण है। अफ़गानिस्तान में कई आतंकवादी गुट सक्रिय हैं और उनके सदस्यों में दाइश से जुड़ने की भावना मज़बूत है। विशेषकर तालिबान के प्रमुख मुल्ला उमर की मौत के बाद तालिबान के बहुत से सदस्यों में दाइश से जुड़ने का विचार मज़बूत हुआ। कहा जाता है कि दाइश द्वारा अफ़गानिस्तान को अपना बसेरा बनाने की एक वजह यह भी है कि उसे वहां आसानी से तैयार आतंकवादी मिल सकते हैं। यह हालात अमरीका के लिए भी बेहद अनुकूल समझे जाते हैं क्योंकि उसे किसी भी देश में अपने हितों की पूर्ति के लिए इसी प्रकार के हालात की ज़रूरत होती है और वह या तो उस देश में एेसे हालात से फायदा उठाता है या फिर फायदा उठाने के लिए इस प्रकार के हालात बना देता है। काबुल में राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ वहीद मुज़दे कहते हैं कि अमरीका अफगानिस्तान में दाइश की उपस्थिति को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहा है ताकि तालिबान पर दबाव डाले और उन्हें अपनी बातें मानने पर मजबूर करे।

पाकिस्तान में कुछ मदरसे चरमपंथियों का केन्द्र बन गए हैं

अफगानिस्तान कई आयामों से अमरीका के लिए महत्वपूर्ण है इसी तरह स्वयं दाइश के लिए भी यह देश कई आयामों से उचित और महत्वपूर्ण है। Q.A.

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