Feb २७, २०२० १७:३३ Asia/Kolkata
  • क़ुरआनी क़िस्सेः सूरे बक़रा की आयत संख्या 207 एक महान बलिदान की बात करती है जिसमें एक इंसान ने दूसरे इंसान के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा दी!  

हम ऐसी घटना का ज़िक्र करने जा रहे हैं जो इस्लामी कैलेण्डर का आरंभिक बिंदु भी है और एक एतिहासिक बलिदान की महान गाथा भी। बलिदान एक भावना है। यह ऐसी सकारात्मक भावना है जो हर स्थिति में प्रशंसनीय है। 

अपने दैनिक जीवन में हमें बहुत से अवसरों पर लोग बलिदान करते हुए मिल जाएंगे।  बहुत से बलिदान ऐसे भी हैं जो समय बीतने के साथ-साथ भुला दिये जाते हैं किंतु जो बलिदान पूरी निष्ठा और निःस्वार्थ भाव से किया जाता है उसका विशेष महत्व है।  इस प्रकार का बलिदान, इतिहास में बाक़ी रहता है और इसे भविष्य में याद किया जाता है।  ईश्वर भी इस प्रकार के बलिदान को पसंद करता है।  आज हम एक ऐसे बलिदान का उल्लेख करने जा रहे हैं जो इतिहास में अमर हो गया।  इस बलिदान का महत्व इतना अधिक है कि उसके बारे में पवित्र क़ुरआन की एक आयत नाज़िल हुई है।  यह आयत सूरे बक़रा में है जिसकी संख्या 207 है।  सूरे बक़रा की आयत संख्या 207 का अनुवाद इस प्रकार हैः और ईमान वालों में से कोई ऐसा भी है जो ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपनी जान भी दे देता है और ईश्वर अपने बंदों के प्रति अत्यंत मेहरबान है।  वास्तविक मोमिन कर्म करने वाला होता है और वह हर बात में ईश्वर का ध्यान रखता है और उसे प्रसन्न करना चाहता है। घमंडी, अहंकारी और सांसारिक लोगों के मुक़ाबले में कुछ ऐसे पवित्र और बलिदानी लोग भी हैं, जो पूर्ण रूप से ईश्वर के प्रति समर्पित हैं।  इस प्रकार के लोग ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपनी जान भी बलिदान कर देते हैं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम का रौज़ा

 

इस्लामी इतिहास की पुस्तकों और क़ुरआन की व्याख्याओं में मिलता है कि जब मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने रात में पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के घर पर आक्रमण करके उनकी हत्या करने का षड्यंत्र रचा तो ईश्वरीय दूत द्वारा पैगम़्बर को इसकी सूचना हो गयी और उन्होंने मक्के से बाहर जाने का निर्णय किया परंतु पैगम्बरे इस्लाम के ख़ाली बिस्तर को देखकर शत्रु उनकी हिजरत अर्थात पलायन से सूचित न हो जाए इसीलिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके बिस्तर पर सो गये और उन्होंने अपनी जान की परवाह न की।

(हिजरत की घटना को पेश करने वाली फ़िल्म का एक भाग)

आइए देखते हैं कि यह दास्तान क्या है।  इस्लामी इतिहास में इस घटना को शबे हिजरत के नाम से याद किया गया है।  "दारुन्नदवा" में क़ुरैश के 40 लोग एकत्रित हुए।  यह लोग क़ुरैश क़बीले के बड़े-बड़े सरदार थे।  दारुन्नदवा, प्राचीनकाल में क़ुरैश के गणमान्य लोगों के एकत्रित होने का स्थल था जहां पर वे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया करते थे।  क़ुरैश के बड़े-बड़े सरदार, इस बात को लेकर इसलिए बहुत नाराज़ थे कि बहुत बड़ी संख्या में लोग पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद की बैअत या उनका अनुसरण कर रहे हैं। दारुन्नदवा में मौजूद क़ुरैश के सरदारों में सबसे पहले अबूजेहल ने अपनी बात शुरू की।  अबूजेहल ने वहां पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि आप लोगों को पता है कि अरब जगत में हमसे अधिक प्रिय और लोकप्रिय कोई दूसरा नहीं था।  हम सुख-सुविधाओं के साथ जीवन गुज़ार रहे थे।  काबे के इर्दगिर्द रहने वाले अरब, प्रतिवर्ष दो बार मक्के में आकर आयोजन किया करते थे।  किसी में भी हमारे विरुद्ध काम करने या हमपर हमला करने का साहस ही नहीं था।  जब से मुहम्मद हमारे बीच आए हैं और हमने उनको "अमीन" अर्थात ईमानदार का लक़ब दिया है तबसे वे यह समझने लगे हैं कि मैं ईश्वर का दूत हूं।  अब वे हमारी मूर्तियों का अनादर कर रहे हैं।  वे हमारे युवाओं को गुमराह करते जा रहे हैं और हमको कोई महत्व ही नहीं दे रहे हैं।  अबूजेहल ने कहा कि हमें किसी ऐसे व्यक्ति को चुनना होगा जो मुहम्मद की हत्या कर दे।  अगर बनी हाशिम ने उनके ख़ून का हर्जाना मांगा तो हम मिलकर उसका हर्जाना अदा कर देंगे।

अबूजेहल की बात को काटते हुए दारुन्नदवा में मौजूद एक बूढ़े व्यक्ति ने कहा कि यह फैसला बिल्कुल ही ग़लत है क्योंकि बनी हाशिम, मुहम्मद के हत्यारे को जीवित रहने ही नहीं देंगे जिसके नतीजे में मक्के में ख़ून-ख़राबे का ख़तरा है।  इसी बीच एक अन्य अरब सरदार ने कहा कि मेरा यह मानना है कि मुहम्मद को गिरफ़्तार करके कारावास में डाल दिया जाए और उनको उस समय तक बंद रखा जाए जबतक उनकी मौत न हो जाए।  इसपर एक अन्य अरब सरदार ने कहा कि बनी हाशिम, इसके लिए तैयार ही नहीं होंगे और वे उन्हें कारावास से निकलवा लेंगे।  इस प्रकार कारावास से बाहर निकलकर मुहम्मद फिर से जादू करके तुमको गुमराह करेंगे।  एक दूसरे अरब सरदार ने यह प्रस्ताव दिया कि मुहम्मद को हम अपने शहर से निष्कासित कर देंगे और उनको बाहर निकालने के बाद शांति से अपनी मूर्तियों की पूजा करेंगे।  उसके प्रस्ताव को रद्द करते हुए बूढ़े अरब सरदार ने कहा कि पिछले दो प्रस्तावों के मुक़ाबले में तुम्हारा यह प्रस्ताव बिल्कुल ही बेकार है क्योंकि तुम एक जादूगर को अपने शहर से बाहर निकाल दोगे और फिर वह जादूगर दूसरे क्षेत्रों में जाकर अपने जादू से लोगों को अपनी ओर खींचेगा और बाद में एक बड़ी सेना बनाकर हमपर हमला कर देगा।  इस प्रकार से तुम्हारा ख़ात्मा हो जाएगा।

 

दारुन्नदवा में मौजूद अरब सरदारों ने उस बूढ़े सरदार से कहा कि अगर यह उचित नहीं है तो फिर उचित क्या है? उस बूढ़े अरब ने कहा कि मेरा मानना यह है कि अरबों के हर क़बीले से एक-एक सदस्य लिया जाए जिसमें बनी हाशिम क़बीले का भी कोई सदस्य अवश्य शामिल हो।  बाद में यह सारे लोग मिलकर मुहम्मद पर हमला करें और उनका काम तमाम कर दें।  इस प्रकार हत्यारे का पता नहीं चलेगा और बनी हाशिम क़बीले के लोग अरब के सारे क़बीलों से युद्ध कर ही नहीं सकते ऐसे में अंत में हमे मुहम्मद का ख़नूबहा ही देना होगा जो हम सब मिलकर दे देंगे।

वहां पर मौजूद सारे लोगों को यह प्रस्ताव बहुत पसंद आया और सब इसपर सहमत हो गए।  बाद में हर क़बीले से एक सदस्य लिया गया और क़ुरैश से अबू लहब का चयन किया गया।  इस प्रकार चालीस लोगों ने यह तै किया कि हमसब एक साथ मिलकर रात के समय मुहम्मद पर हमला करेंगे और सोते समय उनकी हत्या कर देंगे।  जैसे ही अरब के क़बीलों ने हज़रत मुहम्मद को जान से मारने का षडयंत्र रचा उसी समय ईश्वर ने अपने फरिश्ते, जिब्रईल के माध्यम से उनको यह ख़बर दे दी और कहा कि वे पलायन करके "यसरब" अर्थात मदीने चले जाएं।

अंततः वह रात आई जिस रात अरब के क़बीलों ने हज़रत मुहम्मद की हत्या का षडयंत्र तैयार किया था।  मक्का नगर अंधेरे में डूब चुका था।  यह अंधेरा हज़रत मुहम्मद के घर पर ही दिखाई दे रहा था।  हमले की तैयारी पूरी की जा चुकी थी।  अरब क़बीलों के लोग हाथों में तलवारें लिए हुए पैग़म्बरे इस्लाम के घर की ओर नज़र रखे हुए थे।  वे लोग मौक़े की तलाश में थे।  इसी बीच पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने चचेरे भाई "अली इब्ने अबी तालिब" से कहा कि वे उनके बिस्तर पर लेट जाएं ताकि अनेकेश्वरवादियों को ऐसा लगे कि बिस्तर पर हज़रत मुहम्मद लेटे हुए हैं।  इसपर हज़रत अली ने पैग़म्बरे इस्लाम से पूछा कि अगर मैं आपके बिस्तर पर लेट जाऊं तो क्या आप अनेकेश्वरवादियों के षडयंत्र से सुरक्षित रह जाएंगे? पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि हां ऐसा ही होगा।  पैग़म्बरे इस्लाम की यह बात सुनकर हज़रत अली मुस्कुराए और सजदे में चले गए।  सजदा करने के बाद उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम से कहा कि आपको जो ज़िम्मेदारी दी गई है उसे आप निभाइए मैं पूरी तरह से आपके साथ हूं।  आप जो आदेश देते हैं उसे मैं मानने के लिए तैयार हूं।  इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली को गले लगाया और फिर वे उनसे अलग होकर मदीने की ओर चल दिये।

 

वे चालीस लोग जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के घर का घेराव कर लिया था, लगातार उनके घर पर नज़र लगाए हुए थे।  उनका यह मानना था कि पैग़म्बरे इस्लाम इस समय अपने बिस्तर पर लेटे हुए होंगे।  पहले तो आक्रमणकारियों ने आधी रात को हमला करने का फैसला किया था किंतु बाद में कुछ कारणों से उन्होंने अपना फैसला बदल दिया। बाद में यह तै हुआ कि पैग़म्बरे इस्लाम के घर पर हमला भोर समय किया जाएगा।

रात अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रही थी और वह अपने अन्तिम पहर में पहुंच चुकी थी।  जैसे ही भोर का समय हुआ यकायक 40 लोगों ने एक साथ पैग़म्बरे इस्लाम के घर पर धावा बोल दिया। वे लोग यह सोचकर बहुत ही खुश थे की उनकी हार्दिक इच्छा अब पूरी होने वाली है।  उनका यह मानना था कि रोज़-रोज़ की मुसीबत अब ख़त्म होने जा रही है।  वे सब बहुत ही तेज़ी से पैग़म्बरे इस्लाम के बिस्तर की ओर बढ़े।  उन्होंने जैसे ही चादर हटाई तो यह देखकर अचंभित रह गए कि बिस्तर पर पैग़म्बर नहीं बल्कि अली लेटे हुए हैं।  यह दृष्य देखकर वे बहुत क्रोधित हुए।  उन्होंने बहुत ही आश्चर्च और क्रोध से पूछा कि मुहम्मद कहां हैं? इसपर हज़रत अली ने कहा कि क्या तुम उनको मेरे हवाले करके गए थे जो मुझसे पूछ रहे हो कि वे कहां हैं?  यह सुनने के बाद हमला करने वाले बहुत ही ग़ुस्से में वहां से चले गए।

उस रात ईश्वर ने अपने दो बड़े फरिश्तों जिब्रईल और मीकाईल को संबोधित करते हुए कहा कि मैं तुमको दो भाई बनाता हूं।  अब अगर मैं तुममें से एक भाई के लिए मौत का चयन करूं और दूसरे के लिए जीवन का तो तुममें से कौन ऐसा है जो अपने पर दूसरे भाई को प्रथमिकता देता है।  उस समय दोनों में से कोई भी मृत्यु को प्राथमिकता नहीं दे पाया। इसके बाद ईश्वर ने दोनों को संबोधित करते हुए कहा कि जाओ तुम ज़मीन पर जाओ और अली के बलिदान को देखो जो उन्होंने मुहम्मद के लिए किया है।  हज़रत अली,  हज़रत मुहम्मद के बिस्तर पर लेट गए और अपनी जांन दांव पर लगा दी।  अब तुम दोनो धरती पर जाकर मुहम्मद और अली को उनके शत्रुओं की चालों से सुरक्षित रखो।  जिब्रईल, हज़रत अली के सिरहाने और मीकाईल उनके पैतियाने जाकर खड़े हो गए।  जिब्रईल ने हज़रत अली को संबोधित करते हुए कहा कि हे अबू तालिब के बेटे, आपको मुबारक हो।  आपके इस बलिदान के कारण ईश्वर, आसमान में फ़रिश्तों के बीच गर्व कर रहा है।  उसी समय सूरे बक़रा की आयत संख्या 207 नाज़िल हुई जिसका अर्थ हैः और ईमानों वालों में से कोई ऐसा भी है जो ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपनी जान भी दे देता है और ईश्वर अपने बंदों के प्रति अत्यंत मेहरबान है।

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