Apr २८, २०२० १७:०० Asia/Kolkata
  • जल संकट, आशा व निराशाः ज़रूरी पानी का प्रंबंध करके प्रकृति अपना कर्तव्य निभा देती है लेकिन क्या हम अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करते हैं?

जल ही जीवन है हर जीवित प्राणी के अधिकांश सेल्स, पानी से बने होते हैं। मानव शरीर में सेल्स का जो जाल है उसका अधिकांश भाग पानी होता है और अगर पानी नहीं तो फिर जीवन भी नहीं।

पिछले आर्टिकल में हमने बताया था कि प्रकृति ने हमारे लिए बहुत से रूपों में और अलग अलग जगहों पर पानी जैसी क़ीमती चीज़ रखी है और अलग अलग समय में अलग अलग शैलियों में यह जीवन दायक पदार्थ हमें मिलता है। हमारे जीवन क लिए ज़रूरी पानी का प्रंबंध करके प्रकृति अपना कर्तव्य निभा देती है लेकिन क्या उसे सही रूप से प्रयोग करने की अपनी ज़िम्मेदारी हम पूरी करते हैं? बिल्कुल नहीं।

प्रकृति ने बादलों की शक्ल में पानी का अथाह भंडार धरती की प्यास बुझाने के लिए रखा है। बादलों के अलावा धरती ने बर्फ के रूप में, भाप के रूप में भी पानी संजो कर रखा है। यह भाप और यह बादल पानी के अलावा भी इन्सानों का बहुत तरह से भला करते हैं। बारिश हवा के प्रदूषण को खत्म करती है। धरती के ऊपर जो पानी मौजूद है वह अलग अलग मौसमों में अलग अलग तरह का होता है लेकिन यह निश्चित है कि  पानी, भूमिगत जल भंडारों की तुलना में अधिक प्रदूषित होता है।

 

इन्सान को मीठे पानी ज़रूरत होती है। मीठा पानी यानि वह पानी जिसमें नमक की मात्रा बहुत कम होती है। सागरों और महासागरों का पानी खारा होता है और उसे मीठा बनाने में काफी बजट लगता है। वैसे आप को यह भी पता ही है कि धरती पर मौजूद मीठे पानी का बड़ा हिस्सा, पहाड़ों  पर और उत्तरी व दक्षिणी धुर्वों में बर्फ के रूप में मौजूद है लेकिन इन्सानों की पहुंच वहां तक नहीं है इस लिए इन्सान सब से अधिक भूमिगत जलाशयों, झीलों और नदियों का पानी ही इस्तेमाल करता है।

आप को यह पता ही है कि पानी धरती पर सब से अधिक पाया जाने वाला पदार्थ है और सब से अधिक ज़रूरी भी। जल, जीवन का आरंभिक बिन्दु है। एक इन्सान के शरीर का 75 प्रतिशत से अधिक भाग पानी से बना होता है और पानी धरती के 70 प्रतिशत से अधिक भाग पर छाया है। इन सब के बावजूद उनका केवल 2 प्रतिशत भाग ही पीने योग्य है बाकी लवण से मिलने की वजह से पीने योग्य नहीं होता। धरती पर पीने योग्य 2 प्रतिशत पानी का 90 प्रतिशत से अधिक भाग दोनों ध्रुवों में बर्फ के रूप में मौजूद हैं लेकिन इन्सान की पहुंच से बाहर है।

 

पानी का फार्मूला H2O है पानी का मॉलिक्यूल, हाइड्रोजन के दो एटम और आस्कसीजन के एक एटम से बना है। पानी गंधहीन, रंगहीन व स्वादहीन पदार्थ है लेकिन उसमें ऐसी विशेषताएं होती हैं जो उसे अन्य पदार्थों से बिल्कुल अलग बना देती हैं। पानी भारी तापमान सहन कर सकता है, जमने की दशा में उसका आकार बढ़ जाता है, बहुत कम गुरुत्वाकर्षण होता है। पानी एक एटमास्फियर के दबाव में और 100 सेन्टीग्रेड तापमान में खौलने लगता है और शून्य सेन्टीग्रेड तापमान में जम जाता है।

पानी एकमात्र प्रकृतिक पदार्थ है जो तीन रूप में बदल सकता है। वह द्रव्य, ठोस और गैस अर्थात भाप का रूप ग्रहण कर सकता है। धरती पर इस प्रकार का दूसरा पदार्थ नहीं है। जब वह बर्फ बनता है तो उसका घनत्व कम हो जाता है इस लिए वह पानी पर तैरता है। पानी में सिकुड़ने की क्षमता भी बहुत अधिक होती है दूसरे शब्दों में पानी रबर की तरह होता है और वह फैलने के बजाए सिकुड़ना और बूंद बनने को अधिक  पसंद करता है पानी का यही गुण उसमें केशिका क्रिया का कारण है और इसी की वजह से पानी और उसमें मौजूद पदार्थ पेड़ पौधों की जड़ों में और इन्सान के शरीर में गतिशील होता है।

 

खेती बाड़ी और पेड़ पौधों के लिए पानी का महत्व सब पर उजागर है। इसके अलावा हर इलाक़े का पानी और उसकी दशा यह तय करती है कि उस इलाक़े में कौन सी चीज़ उगायी जा सकती है। पेड पौधे की बहुत सी विशेषताओं का निर्धारण भी पानी ही करता है। पानी विलायक भी है और पेड़ पौधे के भीतर विभिन्न पदार्थ पहुंचाने का साधन भी है। पौधे को अगर पानी की कमी हो जाती है तो उसका फलना फूलना सब रुक जाता है।

अलग अलग पौधे अलग अलग तरह और अलग अलग मात्रा में पानी का प्रयोग करते हैं लेकिन कुल मिलाकर पेड़ पौधे 300 से लेकर 1000 ग्राम तक पानी का प्रयोग करते हैं। बढ़ते समय पौधे निरंतरता के साथ धरती से पानी लेते हैं और पत्तों की मदद से उसका वाष्पीकरण करते हैं। वाष्पीकरण की प्रक्रिया, मौसम, हवा, तापमान और आर्द्रता जैसी कई चीज़ों पर निर्भर होती है। अब अगर धरती से पानी सोखने और वाष्पीकरण में संतुलन रहता है तो पेड़ पौधे का सब कुछ ठीक रहता है। (Q.A.)

 

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