Sep २०, २०२० १९:४९ Asia/Kolkata
  • नया सवेराः डेविड फ़्लिप, ईश्वर की दया और उसकी कृपा से बहुत प्रभावित हैं।  इस अमरीकी नागरिक ने इसी आधार पर इस्लाम को अपनाया है। 

वे कहते हैं कि इस्लाम में मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ ईश्वर की कृपा है।  हम इंसान इस बात को समझ ही नहीं सकते कि ईश्वर की कृपा कैसी और कितनी है।  पवित्र क़ुरआन में ईश्वर कहता है कि मेरी कृपा ने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है।  जो भी मेरी कृपा को जितना महत्व देता है वह उससे उतना ही अधिक लाभ उठाता है। 

 

डेविड के अनुसार मैं समझता हूं कि यह ईशवर की कृपा ही थी जिसके कारण मैंने इस्लाम को स्वीकार किया।  वे बहुत से उन धर्मों और विचारधाराओं को रद्द करते हैं जिनमे ईश्वर को बहुत ही भयानक एवं क्रोधित दर्शाया गया है।  उनका मानना है कि ईश्वर का पूरा अस्तित्व ही कृपा का प्रतीक है।

अमरीकी नागरिक डेविड फ़्लिप ने इस्लाम को गले लगाने के बाद अपना नाम "लतीफ़" रख लिया।  डेविड का जन्म सन 1982 में न्यूयार्क में एक कैथोलिक ईसाई परिवार में हुआ था।  दूसरे अन्य बच्चों की भी भांति डेविड का भी झुकाव, खेल-कूद और मनोरंजन में था।  इसके बावजूद उनके भीतर एक अन्य बात थी जो उसकी आयु के बच्चों में कम देखी गई।  डेविड में आरंभ से भी पढ़ाई और खोजबीन में विशेष लगाव था।  इस बारे में वे कहते हैं कि मुझको शुरू से पढ़ने-लिखने और शोधकार्यों का शौक़ था।  अपने इर्दगिर्द घटने वाली घटनाओं से मैं निश्चेत नहीं था।  डेविड फ़्लिप का कहना है कि मैं समझता हूं कि शायद मेरी यही आदत मुझको इस्लाम तक ले गई।  इस बात के लिए मैं ईश्वर का आभार व्यक्त करता हूं।

यह भी एक वास्तविकता है कि जिन लोगों ने इस्लाम को अपनाया उनमें से बहुत से वे लोग थे जिन्होंने पहले लंबे समय तक अध्ययन और शोध किया फिर उसके बाद वे मुसलमान बने।  डेविड ने भी इस्लाम के बारे में पहले बहुत अधिक गहन अध्ययन किया।  इसी दौरान उनके किसी दोस्त ने उसे क़ुरआन की एक प्रति दी जिसका उन्होंने अध्ययन किया।  उन्होंने कहा कि मैंने क़ुरआन को शुरू से आख़िर तक पढ़ा।  मुझको इसमें कहीं भी विरोधाभास नहीं दिखाई दिया।  डेविड कहते हैं कि क़ुरआन पढ़कर मुझको अपने बहुत से सवालों के जवाब मिल गए।  मैंने क़ुरआन को एक बार नहीं बल्कि सात बार पढ़ा।  इसके बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि क़ुरआन शत-प्रतिशत सही है।  लतीफ़ कहते हैं कि क़ुरआन वास्तव में मार्गदर्शन की किताब है।  यह लोगों के सवालों के जवाब देने में पूरी तरह से सक्षम है।

पवित्र क़ुरआन से अवगत होने के बाद डेविड फ़लिप ने औपचारिक रूप में इस्लाम को गले लगा लिया।  बहुत से लोगों ने डेविड के मुसलमान होने का स्वागत नहीं किया।  इस बारे में वे कहते हैं कि मेरा यह प्रयास रहता है कि वे लोग जो मेरी पसंद को महत्व नहीं देते उनसे मैंने दूरी बनाई जबकि जिन्होंने मेरे चयन को महत्व दिया उनकी मैं इज़्ज़त करता हूं चाहे वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों।  वे हमारे दोस्त हैं।  मैंने इस्लाम को सोच-समझकर अपनाया।

 

डेविड कहते हैं कि लतीफ़ बनने के बाद मेरे सामने कई क्षितिज नज़र आने लगे।  वे कहते हैं कि इस्लाम को अपनाने के बाद मेरे भीतर जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया वह मेरी विचारधारा में आया बदलाव था।  अब दुनिया के बारे में मेरा दृष्टिकोण बदल चुका था।  अब मेरी समझ में आया कि मनुष्य, उसके जीवन और जीवन के अंत के बाद की दुनिया में एक संपर्क पाया जाता है।  पहले मैं यह सोचता था कि दुनिया बेहतर है या मरने के बाद का जीवन।  मुसलमान बनने से पहले मैं इस बारे में बहुत ही कम सोचता था।  अब मैं अधिकांश इस बारे में सोचता रहता हूं कि मरने के बाद हम कहां जाएंगे और हमारा क्या होगा?

 

डेविड कहते हैं कि मैने पहली बार जो नमाज़ पढ़ी थी वह मुझको हमेशा याद रहेगी।  वे कहते हैं कि नमाज़ पढ़ने से पहले मेरे भीतर बहुत व्याकुलता थी।  मैं यह सोच रहा था क्या मैं नमाज़ पढ़ भी पाऊंगा या नहीं?  लेकिन जब मेरी नमाज़ ख़त्म हो गई तो मुझको जो संतोष और शांति हासिल हुई उसका वर्णन मैं शब्दों में कर ही नहीं सकता।  अब मुझको नमाज़ पढ़ने में बड़ा मज़ा आता है।  डेविड कहते हैं कि रमज़ान के पवित्र महीने में कलमा पढ़कर मैं मुसलमान बना था इसलिए मैंने नमाज़ और रोज़ा एक साथ शुरू किया।  पहले तो मैं यह सोच रहा था कि रोज़ा रखना बहुत कठिन काम है किंतु जब मैंने रोज़ा रखा तो यह मुझको बहुत कठिन नहीं लगा बल्कि इससे मुझको आनंद प्राप्त हुआ।  अब मैं प्रतिदिन नमाज़ पढ़ता हूं और रमज़ान के सारे रोज़े रखता हूं।

फ्लिप डेविड से लतीफ़ बनने वाले अमरीकी नागरिक का कहना है कि ईश्वर के कृपालू होने के बाद जिस चीज़ ने मुझको बहुत अधिक प्रभावित एवं आकर्षित किया वह पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों का जीवन और उनके कथन हैं।  इस संबन्ध में  वे कहते हैं कि पहले तो मुझको इस बारे में कुछ पता नहीं था।  इस्लाम को जानने के लिए जब मैं अध्ययन कर रहा था तो मैंने इस बारे में कुछ सुना तो था किंतु विस्तार से मुझको इस बारे मेंं कुछ भी पता नहीं था।  बाद में जब कुछ लोगों से मैंने इस बारे में जानना चाहा तो उनके जवाबों से मैं संतुष्ट नहीं हो पाया।  बाद में मेरे एक दोस्त ने मुझको "नहजुल बलाग़ा" नामकी एक किताब दी।  मैंने उसको पढ़ा।  इस किताब को पढ़कर मेरे मन में कई प्रकार के सवाल उठे जिनके मैं जवाब जानना चाहता था।  फिर अपने उसी दोस्त की मदद से मैं एक धर्मगुरू से मिला जिन्होंने मेरे कई सवालों के जवाब दिये और पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके पवित्र परिजनों के बारे में विस्तार से बहुत सी बातें बताईं।  अब मुझको पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके पवित्र परिजनों के बारे में बहुत कुछ ज्ञात हो चुका था। 

 

डेविड कहते हैं कि धर्मगुरू की बातें सुनने के बाद मैं सबसे अधिक पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे हमाम हुसैन से प्रभावित हुआ।  वे कहते हैं कि इमाम हुसैन के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का वह कथन सुनकर मेरे मन में उनके प्रति अधिक सम्मान बढ़ गया जिसमें कहा गया है कि हुसैन की शहादत के बाद मोमिनों के मन में एसी ज्वाला भड़क उठेगी जो फिर कभी ठंडी नहीं होगी।  वे करबला की घटना को एक बहुत बड़ी त्रासदी बताते हैं।  डेविड के अनुसार इमाम हुसैन की शहादत के बाद उनकी याद में मनाए जाने वाले कार्यक्रमों में मैंने भाग लिया किंतु सबसे आकर्षक कार्यक्रम मुझको उनके चेहलुम का कार्यक्रम लगा जिसमें लाखों की संख्या में लोग एकत्रित होकर करबला जाते हैं।  वे कहते हैं कि मैने स्वयं इस कार्यक्रम में भाग लिया और कई मील की पदयात्रा की।  डेविड के अनुसार यह कार्यक्रम हमें मनोबल देता है।  लाखों की संख्या में लोगों को देखकर मन में ढारस बढ़ती है।  उनका कहना है कि अरबई का कार्यक्रम, सच्चे और क्रांतिकारी लोगों के एकत्रित होने का सबसे सुनहरा अवसर है।

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