Aug १८, २०२१ १६:३७ Asia/Kolkata
  • अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी ब्लंडर एक दो नहीं पूरी श्रंखला है, काबुल एयरपोर्ट से बाइडन के भाषण तक शर्मनाक ग़लतियां ही ग़लतियां!

अमरीका की शर्मनाक ग़लतियों की श्रंखला जिसकी कुछ कड़ियां हमने हालिया दिनों में देखीं और जिसकी आख़िरी कड़ी अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडन का भाषण था, एक ही चीज़ को साबित करती है कि अमरीकी और पश्चिमी विचारधारा अब अपनी मौत मर चुकी है। हम उस विचारधारा की बात कर रहे हैं जिसके तहत पश्चिमी देशों ने दूसरे देशों की सरकारों का तख़्ता उलटा और वहां लोकतांत्रिक शासन स्थापित करने की कोशिश की।

पश्चिमी मीडिया से भी बहुत बड़ी ग़लती हुई है कि वह पूरी तरह इस बात पर केन्द्रित हो गया है कि तालेबान का शासन बहाल हो जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकारों और महिलाओं के अधिकारों का क्या होगा? मीडिया ने इस बड़ी सच्चाई को नज़रअंदाज़ ही कर दिया कि अमरीकी साम्राज्य बिखराव का शिकार हो गया है और यह स्थिति हमें सोवियत संघ और ब्रिटेन के बिखराव के दिनों की याद दिलाती है। यह दोनों साम्राज्य भी इसी अफ़ग़ानिस्तान और मध्यपूर्व में भारी पराजय उठाने के बाद बिखर गए थे। अमरीका को अगर अफ़ग़ान जनता और महिलाओं के अधिकारों की इतनी ही फ़िक्र होती तो वह इस तरह अफ़ग़ानिस्तान को उसके हाल पर छोड़कर न भागता।

हमने राष्ट्रपति बाइडन का पूरा भाषण सुना। बीस मिनट के भाषण में उन्होंने कम से कम चार बड़े झूठ बोले।

  1. बाइडन ने कहा कि अमरीकी सेनाओं का मिशन अफ़गानिस्तान में शासन का निर्माण नहीं था। यह सबसे बड़ा झूठ और बहकावा है। जार्ज बुश का बयान देख लीजिए जो उन्होंने अकतूबर 2001 में दिया था। साबित हो जाएगा कि बाइडन कितनी ढिठाई से झूठ बोल रहे हैं।
  2. बाइडन ने कहा कि हमने अफ़ग़ानों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत मौक़ा दिया मगर हम उन्हें भविष्य के लिए संघर्ष का इरादा नहीं दे सकते। अमरीकी सैनिकों के लिए यह संभव नहीं कि उस जंग में जान दें जिसे अफ़ग़ान सैनिक लड़ना ही नहीं चाहते। यह भी झूठ है। अमरीका ने इराक़, लीबिया, वियतनाम कहीं भी ताक़तवर सेना बनाने की कोशिश ही नहीं की। वरना अफ़ग़ान नागरिकों की बात की जाए तो तालेबान भी तो अफ़ग़ान नागरिक हैं क्या उनमें जंग का इरादा नहीं है?
  3. बाइडन ने सारा मल्बा अशरफ़ ग़नी के सिर पर डालने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह अपने परिवार के साथ अफ़ग़ानिस्तान से भाग निकले इसी लिए अफ़ग़ान सेना बिखर गई। यह बात सही तो है लेकिन भागने की शुरुआत तो अमरीकी सैनिकों ने की।
  4. अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर अपने क़ब्ज़े के दौरान कभी भी मज़बूत शासन व्यवस्था के निर्माण में दिलचस्पी नहीं ली। वह मौक़ा देने की बात करते हैं मगर अफ़ग़ान सैनिकों की यह हालत कर दी थी कि वह अपने हथियार बेच कर पेट पालने के लिए मजबूर हो जाते थे।

काबुल एयरपोर्ट पर जो कुछ हुआ वह पश्चिम और अमरीका के इतिहास पर एक धब्बा है। कहां गए अमरीकी थिंक टैंक और अमरीकी इंटेलीजेन्स संस्थान जो इतनी तेज़ी से अफ़ग़ान सरकार और सेना के ढह जाने का अनुमान लगाने में नाकाम रहे।

हालांकि इस स्थिति को समझने और इसका अनुमान लगाने के लिए बहुत ज़्यादा अक़्ल लगाने की ज़रूरत भी नहीं है। 46 साल पहले वियतनाम में जो हुआ वह छोटे से बच्चे को भी समझाने के लिए काफ़ी है कि हालात क्या होंगे।

अब अरब सरकारों और इस्राईलियों को बहुत गहराई से सोचने की ज़रूरत है जो अमरीका के क़रीबी घटक होने पर बड़ा गर्व किया करते थे।

 

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

 

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