Aug १९, २०२१ १६:०४ Asia/Kolkata

आशूर के दिन या इस्लामी कैलेंडर के अनुसार मुहर्रम की 10 तारीख़ को दुनिया भर में करोड़ों लोग पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे और हज़रत अली व हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के सुपुत्र हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का ग़म मना रहे हैं।

19 अगस्त को ईरान और इराक़ समेत कई देशों में आशूर का दिन है, जबकि भारत  सहित कई देशों में 20 अगस्त को मुहर्रम की 10 तारीख़ यानी आशूर का दिन है।
तासूआ यानी मोहर्रम की 9 तारीख़ को दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावान साथियों की शहादत से एक दिन पहले की याद मनाई और कोरोना गाइड लाइन का ख़याल रखते हुए अज़ादारी की।
गुरुवार की सुबह से ही ईरान में मजलिसों और मातम का सिलसिला शुरू हो गया और लोग नम आंखों से इमाम हुसैन और उनके साथियों को श्रद्धांजलि पेश कर रहे हैं।
इराक़ के पवित्र नगर कर्बला में जहां इमाम हुसैन और उनके साथियों के रौज़े हैं दसियों लाख श्रद्धालु इमाम हुसैन का शोक मना रहे हैं जबकि ईरान के सभी छोटे बड़े शहरों और गांवों में गुरुवार की सुबह की नमाज़ के बाद से मजलिस और जुलूस का सिलसिला जारी है।
हमारे संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार इराक़ के अन्य नगरों और पवित्र नगर कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मना बहुत ही श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है जबकि कोरोना की वजह से विदेशी तीर्थयात्री और श्रद्धालु कर्बला नहीं पहुंच सके हैं। रिपोर्ट के अनुसार बुधवार की शाम तक हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु इमाम हुसैन का शोक मनाने के लिए कर्बला पहुंच चुके थे जिन्होंने आशूर से पहले वाली रात इमाम हुसैन, उनके भाई हज़रत अब्बास के रौज़ों तथा दोनों रौज़ों के बीच बड़े मैदान में नौहे, मातम और विशेष उपासनाओं में बिताई। कर्बला में सुबह की नमाज़ के बाद शोक कार्यक्रम फिर आरंभ हो गए जो अब तक जारी हैं।
कर्बला के अलावा इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ और कूफ़े में भी गुरुवार को सुबह की नमाज़ के बाद से ही आशूर के विशेष शोक कार्यक्रम आरंभ हो गए और जुलूसों का तांता लग गया। हज़ारों श्रद्धालु हज़रत अली अलैहिस्सलाम के रौज़े तथा मस्जिदे कूफ़ा में नमाज़े सुबह अदा करने के बाद सामूहिक रूप से कर्बला के लिए पैदल रवाना हुए।
इस्लामी गणतंत्र ईरान की राजधानी तेहरान सहित सभी छोटे बड़े शहरों और गावों में नमाज़े सुबह के बाद से ही आशूर के शोक कार्यक्रम आरंभ हो गए और जुलूस निकाले गए। बीच में नमाज़े ज़ोहर और अस्र के अंतराल के बाद मजलिस और मातम का क्रम पुनः आरंभ हो गया जो अब तक जारी है।
ईरान के पवित्र नगर मशहद में पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का रौज़ा कल पूरी रात श्रद्धालुओं से छलकता रहा। उनकी बहन हज़रत फ़ातेमा मासूमा के रौज़े में भी आशूर से पहले वाली रात और फिर आशूर के दिन मातम, नौहे और मजिलसों का क्रम जारी रहा और पूरा वातावरण हुसैन हुसैन की आवाज़ों से गूंजता रहा।
क़ुम नगर में भारत और पाकिस्तान के धार्मिक छात्रों ने भी जुलूस निकाला और उर्दू भाषा में नौहे पढ़ते और मातम करते हुए हज़रत मासूमा के रौज़े में गए जहां जुलूस समाप्त हुआ।
सीरिया में पश्चिमी देशों तथा क्षेत्र की रूढ़िवादी सरकारों का समर्थन प्राप्त आतंकवादी संगठनों के आक्रमणों की भय के बावजूद बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के रौज़े में एकत्रित होकर आशूर की रात नौहे और मजलिस में बिताई तथा आशूर को भी पूरा दिन शोक कार्यक्रम चलते रहे। सीरिया में आशूर के उपलक्ष्य में आयोजित मजलिसों में वक्ताओं ने इमाम हुसैन के आंदोलन के लक्ष्यों पर प्रकाश डाला तथा कर्बला के संदेश की समीक्षा की। वक्ताओं ने देश में निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने वाले आतंकवादियों को यज़ीदी तत्व ठहराया।
लेबनान में भी आशूर का दिन धार्मिक भावना और श्रद्धा के साथ मनाया गया। बैरूत और दक्षिण लेबनान के शहरों तथा गांवों में लोगों ने आशूर का शोक मनाया और साथ ही फ़िलिस्तीनी जनता से अपनी एकजुटता की घोषणा की।
अफ़ग़ानिस्तान पर तालेबान के क़ब्ज़े के बावजूद काबुल और अन्य शहरों में नवीं मुहर्रम की रात के कार्यक्रम हुए और गुरुवार की सुबह से ही जूलसों और मातमी अन्जुमनों के निकलने का सिलिसिला जारी है। तालेबान ने स्थानीय शीया समुदाय के लोगों को जूलूसों और कार्यक्रमों की सुरक्षा की गैरेंटी दी है। ओमान, संयुक्त अरब इमारात, सऊदी अरब, बहरैन, तुर्की, मिस्र तथा अन्य देशों में भी आशूर के उपलक्ष्य में नौहा, मातम और मजलिसों का सिलसिला जारी रहा।
इमाम हुसैन (अ) 680 ईसवी में बनी उमय्या के ख़लीफ़ा के अन्याय और इस्लाम धर्म को मिटाने की साज़िश के ख़िलाफ़ आंदोलन किया और अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ, उसकी बहुत बड़ी सेना से टकरा गए।
10 मोहर्रम को इराक़ स्थित कर्बला में यज़ीदी सेना ने इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों को भूख और प्यास की हालत में बहुत ही निर्मम तरीक़े से शहीद कर दिया। अपनी और अपने साथियों की जान की क़ुर्बानी देकर इमाम हुसैन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि ज़िल्लत की ज़िंदगी से इज्ज़त की मौत बेहतर है।
झूठ और अत्याचार के मुक़ाबले में इमाम हुसैन (अ) के आंदोलन से हमें, एक सीख यह मिलती है कि अत्याचारी कितना भी शक्तिशाली और ताक़तवर क्यों न हो, उसके मुक़ाबले में डट जाओ, आख़िरकार जीत सत्य की होगी। इसी प्रकार, कर्बला के आंदोलन से हम, साहस, धैर्य, संकल्प, प्रतिरोध, वफ़ादारी, समानता, बलिदान और दुश्मनों को माफ़ कर देने का सबक़ हासिल करते हैं और उसे अपने जीवन में व्यवहारिक बनाने का प्रयास करते हैं। (AK)

 

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