Aug २६, २०२१ ०९:२७ Asia/Kolkata
  • क्या तालेबान की हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए अहमद शाह मसऊद की मदद करने के बारे में सोच रहे हैं बाइडन? क्या तालेबान से समन्वय जनरल क़ासिम सुलैमानी की हत्या की थी मुख्य वजह?

अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका के बाहर निकलने की वजह का अनुमान लगाने के संदर्भ में शायद बहुत से लोगों से ग़लती हुई जो यह समझ बैठे के बाइडन प्रशासन ने दरअस्ल तालेबान को तोहफ़े में अफ़ग़ानिस्तान पेश कर दिया है।

मगर हालिया दिनों जो घटनाएं काबुल एयरपोर्ट पर देखने में आई हैं, ख़ास तौर पर अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में ख़ौफ़ का जो माहौल देखने में आया उससे साफ़ ज़ाहिर हो गया कि मामला कुछ और ही है।

इस प्रकार के विचार रखने वालों को शायद अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने के फ़ैसले के पीछे अमरीका की साज़िश की गहराई का अंदाज़ा नहीं है। अमरीका दरअस्ल अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान और अन्य संगठनों के बीच गृह युद्ध की आग के शोले देखना चाहता है जो पूरे मध्य एशिया की शांति और स्थिरता को भस्म कर दें और जिसके नतीजे में ईरान, चीन और रूस सब गंभीर संकट में पड़ जाएं।

चूंकि तालेबान ने 1996 में अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा किया था तो मज़ार शरीफ़ में ईरान के काउंसलेट पर हमला करके 11 कूटनयिकों और पत्रकार की बर्बरता से हत्या कर दी थी, इसलिए कुछ लोगों को यह उम्मीद थी कि तालेबान की दोबारा हुकूमत बन जाने की स्थिति में ईरान और तालेबान के बीच ज़ोरदार टकराव शुरू हो जाएगा।

तालेबान ने अभी औपचारिक रूप से सत्ता नहीं संभाली है और अमरीका के पूर्ण निष्कासन से पहले वह एसा करेंगे भी नहीं। सीआईए प्रमुख विलियम बर्न्ज़ से तालेबान मुखिया मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर की ख़ुफ़िया मुलाक़ात का विषय अफ़ग़ानिस्तान से पश्चिमी देशों के सैनिकों और नागरिकों की वापसी ही थी। दरअस्ल तालेबान ने डेडलाइन का एलान करके अमरीका को धमकी दे दी थी जिसकी वजह से अमरीकियों में ख़ौफ़ पैदा हो गया था।

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका को मिलने वाली शिकस्त की वजह केवल ज़ोरदार प्रतिरोध नहीं था बल्कि यह ईरान, चीन और रूस के महत्वपूर्ण कोआर्डिनेशन का नतीजा है कि अमरीका को अफ़ग़ानिस्तान में रुक पाना असंभव नज़र आने लगा था।

हमारे पास जो जानकारियां हैं वह तो बताती हैं कि ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर क़ासिम सुलैमानी अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की भारी शिकस्त के मुख्य योजनाकार थे। उन्होंने इस विचार को भलीभांति अपनाया कि अफ़गानिस्तान में अमरीका को शिकस्त देने में तालेबान की निर्णायक भूमिका हो सकती है जिनका संबंध पश्तून जाति से है जिनकी संख्या अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 18 मिलियन है, इसलिए तालेबान के साथ मतभेद को नज़रअंदाज़ करके आगे बढ़ना होगा और तालेबान के साथ संपर्क बहुत ज़रूरी है। जनरल क़ासिम सुलैमानी ने अपने उत्तराधिकारी इसमाईल क़ाआनी को उस समय इस अभियान की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। शायद उनके सिपुर्द यह ज़िम्मेदारी थी कि वह तालेबान के संबंध में संपर्क कड़ी की भूमिका निभाएं। शायद जनरल क़ासिम सुलैमानी की यह महत्वपूर्ण योजना भी उनकी टारगेट किलिंग का कारण बनी।

तालेबान को अपनी सरकार आज भी ख़तरे में नज़र आ रही है क्योंकि अमरीका ने दाइश के तत्वों को अच्छी ख़ासी संख्या में अफ़ग़ानिस्तान पहुंचा दिया है इसलिए तालेबान ने ईरान से मदद मांगी है। यहीं से ईरान और तालेबान के बीच सहयोग के कई चैनल खुल गए। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि तालेबान के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख ने बयान दिया कि भाई अपने भाई को क़त्ल नहीं करता। हम यह तथ्य तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मुहम्मद मरंदी के लेख से बयान कर रहे हैं।

अहमद शाह मसऊद और अमरुल्ला सालेह का ताजिक कमांडर के रूप में उभरना और उनका अमरीका और यूरोप से मदद मांगना खुला संदेश है कि अमरीका और यूरोप अब अफ़ग़ानिस्तान में क़बायली दुशमनी की आग लगाना चाहते हैं।

अब आने वाले दिनों में यह तसवीर और साफ़ हो जाएगी कि अफ़ग़ानिस्तान में किस प्रकार के मोर्चे बनेंगे।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

हमारा व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए क्लिक कीजिए

हमारा टेलीग्राम चैनल ज्वाइन कीजिए

हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब कीजिए!

ट्वीटर  पर हमें फ़ालो कीजिए

टैग्स