Sep १३, २०२१ १३:४६ Asia/Kolkata
  • अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत पर पाकिस्तान का जश्न क्या मातम में बदल सकता है?

पिछले हफ़्ते पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख फ़ैज़ हमीद ने काबुल के सेरेना होटल में चाय की चुस्कियां लेते हुए तालिबान गुटों के बीच नई सरकार के गठन के लिए जारी खींचतान में मध्यस्थता की। सबकुछ ठीक हो जाएगा, अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर उन्होंने भविष्यवाणी की। कुछ ही दिन बाद कुछ ऐसे नेताओं के नामों की घोषणा कर दी गई, जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीका के क़ब्ज़े के दौरान, पाकिस्तान में शरण ले रखी थी।

पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख ने अफ़ग़ानिस्तान में उच्च पदों पर चरमपंथी नेताओं के चयन में मदद की और विश्व समुदाय की चिंताओं की कोई परवाह नहीं की। उन्हें एक विजेता के रूप में काबुल की सड़कों पर चलते हुए देखा गया। वह यह देखकर भी ख़ुश हो रहे थे कि पाकिस्तान के कट्टर दुश्मन भारत को अफ़ग़ानिस्तान से कैसे अपना बोरिया बिस्तरा लपेटना पड़ रहा है।

इसमें कोई शक नहीं है कि आने वाले समय में पाकिस्तान, भारत के ख़िलाफ़ अपने हितों को साधने के लिए अफ़ग़ानिस्तान का इस्तेमाल करेगा। पाकिस्तान, चीन को सुरक्षा की गारंटी देने में भी सफल रहा है, जो युद्धग्रस्त देश में खनिजों का खनन करना चाहता है और अरबों डॉलर ख़र्च करके एक आर्थिक गलियारा बनाना चाहता है, जो पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान होकर मध्य एशिया तक जाता है।

लेकिन पाकिस्तान के लिए जिसे एक राजनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है, वह आगे चलकर कहीं इस देश के लोगों के लिए एक त्रासदी साबित न हो जाए। पड़ोसी देश में अगर तालिबान जैसी सरकार हो तो निश्चित रूप से सुरक्षा की चिंता करना स्वभाविक है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन से प्रभावित होकर पाकिस्तान में भी शरिया शासन लागू करने की मांग तेज़ हो जाएगी।

पाकिस्तान के एक सुरक्षा विश्लेषक अमीर राना का कहना है कि तालिबान से ज़्यादा से ज़्यादा पाकिस्तानी प्रभावित होंगे और देश में तालिबान शैली के शासन की मांग करेंगे। भ्रमित पाकिस्तानी युवाओं के लिए तालिबान प्रेरणा का स्रोत बन जायेंगे। धार्मिक संगठन पहले से ही जश्न मना रहे हैं। तालिबान की बढ़ती लोकप्रियता से अन्य संप्रदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है और कुल मिलाकर समाज और अधिक असहिष्णु बन सकता है।

इसके अलावा, ऐसे भी संकेत हैं कि तालिबान अपने मुख्य संरक्षक के आदेशों का पालन करने से इनकार भी कर सकते हैं, कम से कम अफ़ग़ान जनता के सामने अपनी स्वतंत्रता को दर्शाने के लिए। अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान बेहद अलोकप्रिय है, और तालिबान सावधान हैं कि कहीं उन्हें पूरी तरह से उसकी कठपुतली न समझ लिया जाए। तालिबान के एक नेता का कहना है कि हम पाकिस्तान की कठपुतली नहीं हैं, हम स्वतंत्र हैं, और हां, तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं।

तहरीके तालिबान पाकिस्तान के सदस्य भी उन्हीं मदरसों से पढ़कर निकले हैं, जिनमें अफ़ग़ान तालिबान ने तालीम हासिल की है। इस चरमपंथी गुट ने पाकिस्तान में कई बहुत ही घातक और विनाशकारी हमले किए हैं। टीटीपी पाकिस्तान की नीतियों का ही नतीजा है।

बहरहाल, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी पाकिस्तान के लिए आगे चलकर एक बड़ा सिर दर्द बन सकती है। जिसे पाकिस्तान अपनी फ़तह समझ रहा है, वही उसकी नींव को खोखला कर सकती है। msm

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