Nov ०७, २०२१ १४:१९ Asia/Kolkata

विश्व में ऊर्जा की बढ़ती ज़रूरतों के बीच 2021 की शुरूआत से अब तक ओपेक के तेल की क़ीमतों में 30 डॉलर से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। अक्टूबर के महीने में तेल की क़ीमतों ने 84 डॉलर प्रति बैरल से अधिक की रिकॉर्ड ऊंचाई को छू लिया है। ओपेक प्लस के उत्पादक देशों ने उत्पादन में वृद्धि के अमरीका के अनुरोध को ख़ारिज कर दिया है, जिसके बाद वैश्विक बाज़ार में तेल की क़ीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है।

हालांकि पिछले साल इन दिनों में कोरोना महामारी के प्रसार और आर्थिक गतिविधियों के रुक जाने की वजह से तेल की क़ीमत 20 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे गिर गई थी। जिसके बाद ओपेक सदस्य देशों ने तेल उप्तादक ग़ैर सदस्य देशों के साथ मिलकर कि जिन्हें ओपेक प्लस कहा जाता है, उत्पादन में 9.7 मिलियन बैरल की कटौती करने का फ़ैसला किया था। इसी के साथ आर्थिक गतिविधियों के पटरी पर लौटने के साथ ही धीरे-धीरे उत्पादन को सामान्य करने पर भी सहमति बनी थी।

ओपेक प्लस अब भी तेल की क़ीमतों को सामान्य स्तर पर बनाए रखने के लिए धीरे-धीरे उत्पादन में वृद्धि पर ज़ोर दे रहा है, हालांकि अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी देश क़ीमतों में कटौती के लिए उत्पादन में वृद्धि की मांग कर रहे हैं।

ओपेक प्लस ने अपनी 22वीं बैठक में इस बात पर सहमति जताई है कि दिसम्बर में तेल के उत्पादन में 4 लाख बैरल की वृद्धि की जाएगी। इस बैठक से पहले उपभोक्ता देशों ने ओपेक प्लस समूह पर उत्पादन में वृद्धि के लिए काफ़ी दबाव भी बनाया था।

तेल मामलों के विशेषज्ञ जूलियन गीगेरे का कहना हैः अमरीकी बैंक ने भविष्यवाणी की है कि कच्चे तेल की क़ीमतों में वृद्धि जारी रहेगी और यह जून 2022 तक 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएगी।

इसके बावजूद, रूस ने तेल के उत्पादन में वृद्धि की अमरीका की मांग का विरोध किया है। दर असल, कई मोर्चों पर अमरीका और रूस का टकराव चल रहा है और अब यह तेल के क्षेत्र तक पहुंच गया है। रूस किसी भी तरह की और अचानक वृद्धि का विरोधी है। मास्को का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में तेल के उत्पदान में वृद्धि से विश्व बाज़ार में उसकी मांग में कमी का कारण बन सकती है।

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