Jan २६, २०२२ ०६:४९ Asia/Kolkata
  • ऐसी सच्चाई और ऐसे सवाल जिन्हें जानने के बाद हर इंसान का माथा ठनक जायेगा!!

दोस्तो 73 वर्षों से अधिक समय से फ़िलिस्तीन समस्या जारी है और आज तक इस इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया? सवाल यह पैदा होता है कि क्यों? उसका जवाब बहुत आसान है पर इस सवाल का जवाब देने से पहले यह सवाल किया जाना चाहिये कि फिलिस्तीन समस्या अस्तित्व में आयी कैसे? इसकी बुनियाद किसने रखी? इसका भी जवाब बिल्कुल स्पष्ट है।

इस संकट की बुनियाद ब्रिटेन ने रखी। 73 साल पहले फिलिस्तीन ब्रिटेन के अधीन क्षेत्रों में था। ब्रिटेन ने फिलिस्तीन में जायोनियों और यहूदियों को बसाने की योजना की बुनियाद रखी। बिलफौर घोषणा पत्र को इस दिशा में एक मनहूस क़दम के रूप में देखा जा सकता है।

फिलिस्तीन में यहूदियों और जायोनियों को बसाने के लिए उन्हें मज़लूम बताया गया और कहा गया कि यहूदियों पर जर्मनी में हिटलर ने बहुत अत्याचार किये हैं। यहूदियों को मज़लूम बताने के लिए कहा गया कि हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को भट्ठियों में ज़िन्दा जला दिया। जब इस दावे पर प्रश्न उठने लगे और कहा जाने लगा कि उस वक्त पूरी दुनिया में यहूदियों की जनसंख्या ही 60 लाख नहीं थी तो हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को कैसे ज़िन्दा जला दिया?

यह बात कभी भी न तो बतायी है और न ही कही जाती है कि हिटलर ने यहूदियों को क्यों ज़िन्दा जलाया? अगर हिटलर ने यहूदियों को ज़िन्दा जलाया तो इसमें फिलिस्तीनियों या ग़ैर फिलिस्तीनियों का क्या दोष है? हिटलर के दोष की सज़ा फिलिस्तीनी क्यों भुगतें? अगर हिटलर ने यहूदियों को मारा है तो जर्मनी में मारा है न कि फिलिस्तीन में। अगर यहूदियों को ज़मीन दी जानी थी और उन्हें बसाया जाना था जो जर्मनी या यूरोप के किसी देश में बसाया जाना चाहिये था न कि फिलिस्तीन में।

अगर हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को मारा है तो हिटलर को आतंकवादी व महाआतंकवादी कहा जाना चाहिये था जबकि मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वाला कोई भी देश हिटलर को आतंकवाद नहीं कहता! ऐसा सौतेला बर्ताव क्यों किया जाता है? पश्चिमी व यूरोपीय देशों में किसी को भी होलोकॉस्ट के बारे में कोई सवाल करने की अनुमति नहीं है ऐसा क्यों है? जबकि पश्चिमी व यूरोपीय देश स्वंय को आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पालना कहते व समझते हैं।

पश्चिमी व यूरोपीय देशों में जब शांति, न्याय और प्रेम के पैग़म्बर का अपमान किया जाता है और उनके अपमान में कार्टून छापे जाते हैं तो इस घिनौने कृत्य का औचित्य दर्शाने के लिए कहा जाता है कि सबको अपनी बात कहने का हक है।

सवाल यह है कि जब सबको अपनी बात कहने का हक है तो होकोकास्ट के बारे में सवाल करना क्यों मना है? होलोकॉस्ट के बारे में क्यों किसी को अपनी बात कहने का हक नहीं है? पश्चिमी व यूरोपीय देशों में होलोकास्ट के बारे में सवाल करना अपराध है और अगर किसी ने सवाल किया तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि दाल में कुछ काला है? बहुत से जानकार हल्कों का मानना व कहना है कि दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।

अवैध जायोनी शासन ने फिलिस्तीनियों के खिलाफ अत्याचार का जो बाजार गर्म कर रखा है उसका औचित्य दर्शाने के लिए यहूदियों को मज़लूम बताया जाता है। यहूदियों को मज़लूम बताकर पश्चिमी व यूरोपीय देशों में उनके प्रति सहानुभूति हासिल की जाती है। यही नहीं यहूदियों को मजलूम बताकर दूसरे देशों से इस्राईल के लिए धन उगाही की जाती है। अगर होलोकास्ट का सच ज़ाहिर जायेगा तो यहूदियों के उस महाझूठ की पोल खुल जायेगी जिसे आधार बनाकर वे फिलिस्तीनियों पर अत्याचार कर रहे हैं। वास्तविकता खुल जाने के भय से पश्चिमी व यूरोपीय देशों में होलोकास्ट के बारे में सवाल करना मना और अपराध घोषित किया गया है।  

बहरहाल जब तक अरब व इस्लामी देश फिलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं करेंगे, मानवाधिकारों का राग अलापने वाले इस्राईल की सुरक्षा को अपना परमदायित्व समझते रहेंगे, फिलिस्तीनियों के खिलाफ इस्राईल के अत्याचारों पर अर्थपूर्ण चुप्पी साधे रहेंगे और इस्राईल का अंधा समर्थन करते रहेंगे तब तक फिलिस्तीन समस्या के समाधान की आशा अपेक्षा से परे है पर इन सबके बावजूद कुछ राजनीतिक टीकाकारों और विश्लेषकों का मानना है कि वह दिन ज़्यादा दूर नहीं है जब समूचा फिलिस्तीन आज़ाद हो जायेगा। ये टीकाकार उदाहरण के तौर पर कहते हैं कि कुछ साल पहले फिलिस्तीनी हर प्रकार के आधुनिकतम हथियारों से लैस इस्राली सेना से पत्थरों से लड़ते थे और अगर उस समय कोई यह कहता कि वह दिन अधिक दूर नहीं है जब फिलिस्तीनी मिसाइल और राकेटों से इस्राईल का मुकाबला करेंगे और उसे अविस्मरणीय सबक सिखायेंगे तो शायद किसी को विश्वास न आता पर आज सब अपनी आंखों से देख रहे हैं कि फिलिस्तीनियों ने किस तरह से इस्राईल की नींद हराम कर रखी है और उसके पाश्विक हमलों का जवाब मिसाइलों और राकेटों से दे रहे हैं। इस बात को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि वह दिन अधिक दूर नहीं है जब फिलिस्तीनी ईंट का जवाब पत्थर से देंगे और समूचा फिलिस्तीन आज़ादी की मिठास चखेगा।

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नोटः ये व्यक्तिगत विचार हैं। पार्सटूडे का इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं है। MM

 

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