Feb १४, २०२० २०:२१ Asia/Kolkata
  • तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोग़ान का पाकिस्तान दौरा, क्षेत्र और मुस्लिम जगत के लिए कितना महत्वपूर्ण? क्या सीरिया में फंसे अंकारा को इस्लामाबाद से कोई मदद चाहिए?

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यब अर्दोग़ान एक उच्चस्तरीय शिष्टमंडल के साथ दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर पाकिस्तान गए। उन्होंने शुक्रवार 14 फ़रवरी को पाकिस्तानी संसद के संयुक्त सत्र को चौथी बार संबोधित किया। इस संबोधन में अर्दोग़ान ने पाकिस्तान को समर्थन जारी रखने का वादा किया और कश्मीर के साथ अन्य मुद्दों पर भी इस्लामाबाद को पूरा समर्थन देने की बात कही।

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यब अर्दोग़ान ने अपने पाकिस्तान दौरे पर कहा कि, वह ईश्वर के आभारी हैं कि उन्हें पाकिस्तान की संसद को संबोधित करने का मौक़ा मिला। तुर्की के राष्ट्रपति ने कहा कि पाकिस्तान में उनका जिस तरह से स्वागत किया गया उससे वह अभिभूत हैं। अर्दोग़ान ने कहा, ''पाकिस्तान में आने के बाद किसी भी मामले में अजनबीपन जैसा नहीं लगता है। हमें लगता है कि यह अपना घर है। एशिया में पाकिस्तान इस्लामिक दुनिया का एक समृद्ध इलाक़ा है। पाकिस्तान और तुर्की में जिस भाईचारे का संबंध है वह दो राष्ट्रों में कम ही देखने को मिलता है। हम दोनों के संबंध प्रशंसनीय हैं। पाकिस्तान ने तुर्की का हर मुश्किल समय में साथ दिया है।'' यह सब वह शब्द हैं जो अर्दोग़ान ने पाकिस्तान की अपनी यात्रा में कहा है।

 

इस बीच तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान ने कुछ ऐसा भी कहा है जिसको लेकर काफ़ी चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए है उतना ही तुर्की के लिए भी है। अर्दोग़ान ने कहा, ''हमारे कश्मीरी भाई और बहन दशकों से पीड़ित हैं, हम एक बार फिर से कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ हैं। हमने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में उठाया था। कश्मीर का मुद्दा जंग से नहीं सुलझाया जा सकता, इसे इंसाफ़ और निष्पक्षता से सुलझाया जा सकता है। इस तरह का समाधान ही सबके हक़ में है। तुर्की इंसाफ़, शांति और संवाद का समर्थन करता रहेगा।'' जब तुर्क राष्ट्रपति ने कश्मीर पर बोलना आरंभ किया तो पाकिस्तानी संसद तालियों से गूंज उठी। पाकिस्तानी सांसद संसद में देर तक टेबल थपथपाते रहे। अर्दोग़ान अर्दोआन ने कहा कि वह कश्मीरियों को कभी नहीं भूल सकते हैं।

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यब अर्दोग़ान पाकिस्तान के संसद में भाषण देते हुए।

वैसे तो पाकिस्तान और तुर्की के बीच संबंध भारत की तुलना में काफ़ी अच्छे रहे हैं। जब जुलाई 2016 में तुर्की में सेना का अर्दोग़ान के ख़िलाफ़ विद्रोह नाकाम रहा तो पाकिस्तान खुलकर उनके पक्ष में आया था। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने अर्दोग़ान को फ़ोन करके उनके समर्थन का एलान किया था। इसके बाद नवाज़ शरीफ़ ने तुर्की का दौरा भी किया था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुर्की-पाकिस्तानी एकता दशकों से साफ़ दिखती रही है। दोनों देश एक दूसरे को अपने आतंरिक मसलों पर समर्थन करते रहे हैं। इस बीच इन दोनों देशों के संबंध में एक बार फिर आई गर्मजोशी को लेकर राजनीतिक हल्कों में कई तरह के विश्लेषण किए जा रहे हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि सीरिया में जिस दो राहे पर आकर तुर्की फंस गया है, उसके हल के लिए या तो तुर्की सीरिया छोड़ दे या फिर उसे वहां एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। इस लंबी लड़ाई के लिए उसको यूरोप और अमेरिका का समर्थन मिलना मुश्किल लग रहा है। इसका कारण बताया जाता है कि सीरिया की लड़ाई अब ज़मीन पर है और यूरोप एवं अमेरिका ज़मीन पर आकर नहीं लड़ना चाहते हैं इसलिए तुर्की को ज़मीन पर लड़ने वाले लड़ाके चाहिए और वह उनकी तलाश में उन देशों का रुख कर रहा है जहां वह इस्लाम और मुसलमान के नाम पर लड़ाकों को इकट्ठा कर सके। इसकी सीधी सी वजह भी है और वह यह है कि, अर्दोग़ान स्वयं को मुस्लिम दुनिया के बड़े नेता और समर्थक के तौर पर भी पेश करते हैं। वैसे बहुत से जानकारों का यह भी मानना है कि सीरिया की जंग में अब कुछ नहीं बचा है और सीरियाई सेना स्वयंसेवियों के साथ मिलकर अब आतंकियों के अंतिम गढ़ तक पहुंच गई है और वह दिन दूर नहीं जब सीरिया से आतंकवाद की समाप्ति की घोषणा हो जाए। जहां तक तुर्की और सीरिया के बीच तनाव की बात है उसे ईरान, रूस के साथ मिलकर हल कर लेगा। अब देखना यह है कि तुर्की पाकिस्तान का आर्थिक संकट से उभारने के लिए और कश्मीर समस्या को सुरझाने के लिए कितनी मदद करता है और पाकिस्तान, सीरिया युद्ध में फंसे तुर्की की किस हद तक सहायता कर सकता है। (RZ)

 

 

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