Feb २१, २०२० ०९:१४ Asia/Kolkata
  • अरब सरकारों से बढ़ती दोस्ती पर इतरा रहा है इस्राईल, नेतनयाहू का दावा कि ईरान का बढ़ता ख़तरा और इस्राईल की आधुनिक तकनीक है दोस्ती की वजह! बहुत जल्द मिट्टी में मिल जाएगी नेतनयाहू की ख़ुशी!

आजकल इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू बहुत इतरा रहे हैं कि दो या तीन को छोड़कर सारी अरब सरकारों से उनके दोस्ताना रिश्ते हैं।

कोई भी मौक़ा हो, कोई भी इंटरव्यू हो वह अरब देशों के अपने ख़ुफ़िया दौरों की बातें करते हैं और कहते हैं कि अभी इन देशों का नाम वह नहीं बता सकता। नेतनयाहू ने इस्राईल के हला टीवी चैनल को साक्षात्कार देते हुए सूडान की प्रशासनिक परिषद के प्रमुख अब्दुल फ़त्ताह बुरहान से अपनी मुलाक़ात के बारे में बात की। उन्होंने यह भी कहा कि इस्राईली यात्री विमान सऊदी अरब और सूडान की वायु सीमा का प्रयोग कर रहे हैं।

बड़े दुख की बात है कि नेतनयाहू जो कुछ रहे हैं उसमें कुछ सच्चाई भी है। इन दिनों अरब सरकारों ने इस्राईल से दोस्ती के लिए अपने दरवाज़े पूरी तरह खोल दिए हैं। ख़ास तौर पर फ़ार्स खाड़ी के अरब देश तो इस्राईल से दोस्ती के लिए बहुत बेताब हैं। इमारात अपनी प्रदर्शनी में इस्राईली टीम को जगह देता है तो क़तर अपने खेल मुक़ाबलों और सेमीनारों में इस्राईल से मेहमान बुलाना नहीं भूलता। वाशिंग्टन में ओमान के राजदूत ट्रम्प की योजना डील आफ़ सेंचुरी के एलान के समय ताली बजाने वालों में थे।

नेतनयाहू कहते हैं कि अरब देशों से इस्राईल की दोस्ती बढ़ने की वजह ईरान का ख़तरा ही नहीं बल्कि इस्राईल की आधुनिक तकनीक और आधुनिक कृषि शैली है। मगर नेतनयाहू का यह दावा झूठा है। क्यों कि अरब देशों के संबंध जिन देशों से है उनमें आस्ट्रेलिया और अमरीका सहित कई देश हैं जिनके पास आधुनिकतम तकनीक और बेहतरीन कृषि मौजूद है।

अमरीका और इस्राईल ने ईरान के बारे में झूठा प्रोपैगंडा करके और ईरान के ख़तरे की बात बार बार दोहरा कर अरब सरकारों को डराया है और उन्हें हर रेड लाइन पार करके इस्राईल से दोस्ती बढ़ाने पर तैयार किया है।

यह सही है कि इस्राईल के पास मज़बूत अर्थ व्यवस्था और आधुनिक तकनीक है लेकिन यह स्थिति जारी नहीं रह सकती। वर्ष 2000 में जब इंतेफ़ाज़ा आंदोलन शुरू हुआ था तो सारी इस्राईली कंपनियां न्यूयार्क, लंदन और पेरिस भाग गई थीं और इस्राईल की अर्थ व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। एक बार फिर अगर गज़्ज़ा पट्टी या दक्षिणी लेबनान से इस्राईल पर मिसाइल बरसने लगे तो वही हालात दोबारा पैदा हो जाएंगे।

नेतनयाहू जिस दोस्ती की बात कर रहे हैं वह अरब सरकारों से हो रही है अरब जनता से नहीं। कुछ अरब देशों से अगर कुछ लोग इस्राईल के दौरे पर जाते हैं तो यह दरअस्ल सऊदी अरब तथा अन्य अरब देशों की सरकारों के एजेंट होते हैं जो अधिकारियों के आदेश पर इस प्रकार के दौरे करते हैं।

सवाल यह है कि जिन अरब सरकारों ने इस्राईल से दोस्ती कर ली थी और इस्राईल को मान्यता दी क्या उनकी हालत में कोई सुधार हो गया? जार्डन की अर्थ व्यवस्था बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है जिसने इस्राईल को मान्यता दी। इस देश पर 42 अरब  डालर का विदेशी क़र्ज़ है। मिस्र की बात की जाए तो उस पर 250 अरब डालर का विदेशी क़र्ज़ है। फ़िलिस्तीनी प्रशासन तो दिवालिया हो चुका है।

फार्स खाड़ी के अरब देश जो इस्राईल से दोस्ती के लिए बेचैन हैं उनके बारे में भी आईएमएफ़ ने भविष्यवाणी की है क वह 2034 तक दीवालिया हो चुके होंगे। कारण यह है कि तेल और गैस की क़ीमतें गिर रही हैं, इन देशों का बजट घाटा बढ़ रहा है, तेल के बजाए बिजली से चलने वाली गाड़ियों का प्रयोग बढ़ रहा है।

इस्राईल से दोस्ती मुफ़्त नहीं है बल्कि अरब देशों को इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगा। इन सरकारों को अपमान और बेइज़्ज़ती के अलावा कुछ भी मिलने वाला नहीं है, यही इस्राईल से दोस्ती की क़ीमत है।

साभार रायुल यौम

 

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