Feb २७, २०२० १३:३९ Asia/Kolkata
  • अमरीका इस तरह से मजबूर होगा ईरान से वार्ता करने पर ... रायुल यौम का रोचक जायज़ा

तालिबान की रणनीति सफल रही और उन्होंने वाशिंग्टन को वार्ता की मेज़ पर खींच लिया।

अफगानिस्तान में अमरीकी विमान मार गिराए जाने के बाद तालिबान के बारे में अमरीका का नज़रिया थोड़ा बदल गया क्योंकि उसने अपनी शक्ति के नये आयाम से पर्दा हटाया था।  

इस घटना के बाद सब ने देखा कि तालिबान ने अमरीका पर अपनी शर्तें थोपना आरंभ कर दी । तालिबान को अमरीका सन 2001 से दबाने की कोशिश कर रहा है लेकिन जब तालिबान के मुक़ाबले में अमरीका के स्मार्ट बम और आधुनिक युद्धक विमान व मिसाइल विफल हो गये तो वह हाथ उठा कर वार्ता की मेज़ पर बैठ गया, वार्ता को अमरीका, अफगानिस्तान में बने रहने का अंतिम साधन मान रहा है। अमरीका सन 2001 से पहले भी तालिबान के साथ शांति समझौता कर चुका है। 

तालिबान से वार्ता का जो अमरीका ने फैसला किया है वह केवल इस लिए है ताकि अमरीका के घरेलू और विदेशी उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। आतंरिक स्तर पर अमरीका यह चाहता है कि उसके खिलाफ अफगानिस्तान में हमले न हों और तालिबान अमरीकी सैनिकों पर हमले न करे ताकि उसे जानी नुक़सान न उठाना पड़े जैसाकि काबुल में अमरीकी विमान गिरा कर तालिबान ने उसे नुक़सान पहुंचाया है। जब अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हों तो ज़ाहिर सी बात है ट्रम्प यह कदापि नहीं चाहेंगे कि अमरीकी सैनिकों के मारे जाने की खबरों अमरीकी मीडिया में आएं। अमरीका के लिए अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों और स्ट्रेटजिक स्थिति  को छोड़ना भी संभव नहीं है इस लिए उसने बीच का रास्ता निकाला और तालिबान से वार्ता करके समझौता कर लिया। 

 

अमरीका जैसे भी संभव हो, तालिबान के मन में प्रतिशोध की ज्वाला बुझाना चाहता है ताकि वह शांति व सुरक्षा के साथ अफगानिस्तान को लूट सके। हमें नहीं लगता कि अमरीका का अफगानिस्तान से निकलने का कोई इरादा है। अमरीका जब तक अफगानिस्तान का पूरी तरह से दोहन नहीं कर लेगा तब तक वह इस देश से निकलने वाला नहीं है क्योंकि अफगानिस्तान से निकलने का एक मतलब यह भी है कि उसने एशिया में अपने पैर पसारने का इरादा भी छोड़ दिया है। 

तालिबान से वार्ता का एक मक़सद यह भी है कि अमरीका विश्व स्तर पर अपनी शांतिप्रेमी छवि बनाने के चक्कर में है और दुनिया वालों पर यह ज़ाहिर करना चाहता है कि वह एक शांतिप्रेमी देश है और वार्ता द्वारा मुद्दों के समाधान में विश्वास रखता है जबकि सच्चाई यह है कि वह एेसे दलदल में फंस चुका है जहां से वह तालिबान से हाथ मिलाए बिना निकल नहीं सकता। अमरीका को अच्छी तरह से मालूम है कि तालिबान एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है और अलकायदा से भी उसके निकट संबंध हैं लेकिन फिर भी चूंकि उसके हितों की रक्षा होती है इस लिए वह तालिबान से वार्ता और समझोता सब कुछ कर रहा है। 

तालिबान से अमरीका की वार्ता और उसके परिणाम से एक बार फिर यह सच्चाई सब के सामने आ गयी कि अमरीका को केवल ताक़त की ज़बान ही समझ में आती है और ताक़त ही उसे किसी भी मुद्दे पर वार्ता पर मजबूर कर सकती है, अगर तालिबान ने अफगानिस्तान में अमरीका के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन न किया होता तो वह कभी भी तालिबान के साथ वार्ता पर तैयार न होता। 

इन हालात में सवाल यह है कि अमरीका, ईरान के सिलसिले में कब इस रणनीति की शरण में जाएगा? जिस तरह से ईरान  शक्ति प्रदर्शन कर रहा है और जिस तरह से उसने इराक़ में अमरीकी छावनी पर मिसाइल बरसाए हैं उससे तो यही लगता है कि अमरीका धीरे धीरे ईरान से वार्ता की मेज़ की ओर बढ़ रहा है क्योंकि ईरान ने अमरीका और पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि वह अपनी रक्षा की क्षमता रखता है। इन हालात में ईरान की रणनीति, धीरे धीरे अमरीका को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगी। तालिबान तो एक गुट है और अफगानिस्तान की आबादी के एक हिस्से का प्रतिनिधत्व करता है जबकि ईरान की सरकार, पूरे ईरानी राष्ट्र का समर्थन करती है इसी लिए अमरीका के लिए ईरान की दीवार में सेंध लगाना अंसभव हो गया है जबकि तालिबान के घर में सेंध लगाने में वह सफल रहा है। फिलहाल अफगान और ईरानी पक्षों के मध्य अमरीकी वर्चस्व पर अंकुश लगाने पर सहमति बन गयी है अब देखना यह है कि आगे क्या होता है  ? Q.A.

 

 

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