Mar २६, २०२० १३:५४ Asia/Kolkata
  • तेल की क़ीमतों की लड़ाई में अपनी जड़ काट रहा है सऊदी अरब, बिन सलमान की नीतियों के चलते चरमरा गई सऊदी अर्थ व्यवस्था, आयल प्राइस मैगज़ीन ने दिखाई भयावह तसवीर

यह तो तय है कि जब तेल की क़ीमत ऊंची रखने के लिए सऊदी अरब और रूस के बीच तीन साल से जारी सहयोग रुका तो मास्को और रियाज़ दोनों को अंदाज़ा होगा कि अब क़ीमतें तेज़ी से गिर जाएंगी।

अमरीकी मैगज़ीन आयल प्राइज़ ने अपने एक लेख में लिखा है कि तेल की क़ीमतें नीचे आने के बाद रूस और सऊदी अरब दोनों को अपने बजट घाटे को रोकने के लिए मेहनत करनी पड़ रही है।

रूस को भी अंदाज़ा था कि इस नई नीति के नतीजे में तेल की क़ीमतें तेज़ी से गिरेंगी क्योंकि ब्रेंट तेल तो 30 डालर के आसपास रुका हुआ है और कोरोना वायरस की महामारी के बाद भी ब्रेंट की कीमत इससे नीचे नहीं गई है।

सऊदी अरब की बात की जाए तो उसने इसी हफ़्ते एलान किया है कि सरकारी ख़र्च में 13 अरब 20 करोड़ डालर की कटौती करनी है जो 2020 के लिए सऊदी अरब के कुल बजट का 5 प्रतिशत है। सऊदी अरब ने तेल की क़ीमतों में आने वाली गिरावट को देखते हुए कई तरह के उपाय किए हैं।

मगर सऊदी अरब के लिए वर्ष 2020 में अपने बजट घाटे को पूरा करने का रास्ता यह है कि तेल की क़ीमत 91 डालर प्रति बैरल तक पहुंचे और यह फ़िलहाल असंभव नज़र आता है। इस समय कोरोना के कारण डिमांड बहुत कम हो गई है। बताया जाता है कि रोज़ाना 4 मिलियन बैरल तेल डिमांड से ज़्यादा बाज़ार में मौजूद है।

इस समय ब्रेंट लगभग 27 डालर प्रति बैरल और अमरीकी क्रूड आयल तो 24 डालर प्रति बैरल से भी कम रेट पर बिक रहा है।

रूस को भी तेल और गैस से होने वाली आमदनी में लगभग 40 अरब डालर का नुक़सान होने जा रहा है मगर रूस की अर्थ व्यवस्था चूंकि केवल तेल पर निर्भर नहीं है इसलिए वह सऊदी अरब से ज़्यादा बेहतर स्थिति में है।

इस समय रूस और सऊदी अरब के बीच यह लड़ाई है कि दोनों में से कौन कमज़ोर होकर पहले पीछे हटता है। इस लड़ाई में सऊदी अरब की समस्या यह है कि उसने कोरोना से उत्पन्न होने वाली स्थिति के लिए उस स्तर पर तैयारी नहीं की थी जिसकी ज़रूरत अब पड़ रही है।

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