Mar ३१, २०२० ०८:१३ Asia/Kolkata
  • अमरीका में इतनी तेज़ रफ़तार से क्यों फैल गया कोरोना? ट्रम्प प्रशासन ने कैसे छिपाए गंभीर तथ्य? क्या कोरोना की तबाही के बाद चीन सुपर पावर बन जाएगा?

इस समय कोरोना वायरस के संक्रमण की दृष्टि से अमरीका दुनिया में पहले नंबर पर पहुंच गया है उसने चीन, इटली, स्पेन और दक्षिणी कोरिया को पीछे छोड़ दिया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि कुछ ही दिनों में संक्रमितों की संख्या मिलियनों में पहुंच जाएगी।

कोरोना की तेज़ रफ़तार ने गुमराह करने वाली उन सारी ख़बरों पर पानी फेर दिया जो पिछले दो महीने के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प फैला रहे थे और कोरोना को कंट्रोल करने में अपनी सरकार की नाकामी पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे। पहले तो उन्होंने बयान दिया कि 12 अप्रैल तक महामारी नियंत्रण में आ जाएगी। फिर उन्होंने अपना बयान बदला और कहा कि जून में कोरोना का चैप्टर क्लोज़ होगा। इससे पता चलता है कि ट्रम्प किस तरह बौखलाए हुए हैं। प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने कहा कि ट्रम्प नाकाम भी रहे और उन्होंने झूठ भी बोला।

अमरीका में इतनी तेज़ रफ़तार से कोरोना वायरस का फैलना शायद उस विचार को बल देता है जिसके अनुसार यह वायरस सबसे पहले अमरीका में सामने आया था चीन के वुहान शहर के मछली बाज़ार में नहीं। वायरस अमरीका के मैरीलैंड राज्य से शुरू हुआ जहां अमरीकी प्रशासन ने सेना की बायोलोजिकल प्रयोगशालाओं को बंद करवा दिया और वैज्ञानिकों को गिरफ़तार या ग़ायब करवा दिया। यह नज़रिया भी दिया जा रहा है कि इस वायरस ने उस समय भी अमरीका में हज़ारों लोगों की जान ली थी।

चीन से पहले यह वायरस अमरीका, कैनेडा और इटली में फैल चुका था मगर इन देशों ने सच्चाई छिपाई। वायरस का मुद्दा पहली बार चीन के वुहान में सार्वजनिक हुआ जबकि अमरीका और यूरोपीय देश चीन पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाते हैं।

चीन की ओर से आरोप लगाया गया कि वुहान में यह वायरस अकतूबर महीने में वहां होने वाले मिलिट्री गेम्ज़ में भाग लेने पहुंचे अमरीकी सैनिकों के माध्यम से फैला। अब इस आरोप पर बहुत से लोगों को यक़ीन होने लगा है।

यहां यह सवाल पैदा होता है कि आख़िर अमरीका में यह वायरस इतनी तेज़ी से क्यों फैल रहा है जबकि चीन, ईरान और दक्षिणी कोरिया में इस पर कामयाबी के साथ क़ाबू पा लिया गया है।

इस संबंध में कई संभावनाएं हैं।

एक तो यह कि अमरीका को पहले से पता था कि उसकी धरती पर यह वायरस फैल चुका है लेकिन उसने इसे ख़ास महत्व ही नहीं दिया।

दूसरे यह कि अमरीकी सरकार को इस वायरस के गंभीर ख़तरे की जानकारी रही हो लेकिन यह देखकर उसके हाथ पांव फूल गए कि वायरस से निपटने की उसके पास तैयारी नहीं है।

तीसरे यह कि अमरीका ने यह वायरस चीन पहुंचा दिया हो ताकि सारी निगाहें चीन पर केन्द्रित हो जाएं और साथ ही चीन की अर्थ व्यवस्था को भी नुक़सान पहुंचे। इस तरह सारी ज़िम्मेदारी चीन के सिर डाली जा सकेगी और उससे हर्जाना वसूलने का रास्ता भी निकाला जा सकेगा।

इतना तो तय है कि इस महामारी में सबसे बड़ा नुक़सान अमरीका को पहुंचने वाला है। वायरस ने अमरीका की सारी दबंगई निकाल दी है। दुनिया भर में अमरीका की सुपर पावर की हैसियत पर सवालिया निशान लग गया है।

दूसरी ओर चीन ने साबित किया है कि उसके पास दुनिया को लीड करने की क्षमता है। चीन ने अपनी वैज्ञानिक, चिकित्सा, जियो पोलिटिकल क्षमताओं को प्रयोग करते हुए बड़ी सूझबूझ से अपनी स्थिति मज़बूत की है। उसने इटली, स्पेन, फ़्रांस और ईरान की मदद की जबकि अमरीका ने किसी भी देश के लिए कुछ नहीं किया। अमरीका ने तो वह प्रतिबंध भी नहीं हटाए जो उसने ईरान, वेनेज़ोएला, क्यूबा, चीन, रूस और उत्तरी कोरिया पर लगा रखे हैं। अमरीका के इस रवैए से यूरोप के साथ भी उसका तनाव बढ़ेगा।

यदि हम इस बहस को सही मानें की आने वाले समय में जैविक लड़ाइयां हुआ करेंगी तो चीन ने साबित किया है कि वह इस प्रकार के युद्ध का सामना करने के लिए तैयार है।

चीन कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई में भी कामयाब रहा और अमरीका की ओर से छेड़े गए आर्थिक युद्ध से भी  निपटने में सफल रहा। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में चीन की ताक़त और बढ़ेगी।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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