May ३०, २०२० १९:१६ Asia/Kolkata
  • फ्रांस ने कभी मुस्लिम महिलाओं के चेहरे से नकाब हटाने का कानून बनाया था आज सब को चेहरा छुपाने का निर्देश , अमरीकी पत्रिका ने फ्रांस पर कसा तंज़

अमरीका से प्रकाशित होने वाली पत्रिका न्यूज़ वीक ने फ्रांस में बदलते हालात का जायज़ा लेते हुए अपने एक लेख में लिखा है कि फ्रांस ने सन 2010 में सार्वाजनिक स्थलों पर चेहरा छुपाने पर प्रतिबंध लगा कर इस देश में रहने वाली मुस्लिम महिलाओं को नकाब लगाने के अधिकार से वंचित कर दिया था लेकिन दस वर्षों के बाद जब कोरोना फैला तो आज उसी फ्रांस की सरकार ने अपने नागरिकों को निर्देश दिया है कि वह सार्वाजनिक स्थलों पर मास्क लगाएं और यह रिपोर्ट लिखे जाने तक दोनों कानून साथ साथ थे।

     लेखक ने व्यंग्य करते हुए कहा है कि  यह सही है कि नकाब और मास्क में बहुत फर्क है ! मास्क पहनना ज़रूरी है लेकिन नकाब नहीं लगाया जा सकता!

     फ्रांस ने यह कानून बना कर यह साबित करना चाहा था कि प्रजातंत्र खुले चेहरे के साथ ही आगे बढ़ सकता है। उस समय बहुत से सरकारी बयानों और सूचनाओं से इस का पता चलता है बहुत सी सूचनाएं आज भी बाज़ारों और दुकानों में नज़र आ जाती हैं जिनमें खुले चेहरे को " प्रजातंत्र के मूल्य " का नाम दिया गया है।

     आज जब लोगों को अपना चेहरा छुपाने और मास्क लगाने पर मजबूर किया जा रहा है तो आज वह प्रजातंत्र के मूल्य ही संदिग्ध और परस्पर विरोधी हो गये हैं।

     अब हाल यह है कि फ्रांस में अगर कोई मुस्लिम महिला अपने धर्म की वजह से अपना चेहरा छुपाती है तो उसे जुर्माना देना होगा और उसे नागरिकता की क्लास में भाग लेना होगा जहां उसे यह सिखाया जाएगा कि वह किस तरह से योग्य नागरिक बन सकती है मतलब उसे अपना चेहरा खोलना सिखाया जाएगा लेकिन उसी दौरान फ्रांस की सरकार अपने सभी नागरिकों को निर्देश दे रही होगी कि अगर उन्हें योग्य नागिरक बनना है तो उन्हें कोरोना से बचने के निर्देशों का पालन करना होगा जिनमें से एक निर्देश चेहरे को छुपाना भी है।

     यह परस्पर विरोधी स्थिति है और एक तरह से भेदभाव पूर्ण थी क्योंकि इससे सरकार को यह अधिकार मिल रहा है कि वह लोगों की नीयत के हिसाब से व्यवहार करे यानि वह यह देखे कि कौन किस नीयत से क्या काम कर रहा है, काम से उसे मतलब नहीं, उसे नीयत  से मतलब है अगर कोई धर्म के पालन की नीयत से चेहरा छुपाता है तो अपराध है लेकिन अगर कोरोना से बचने के लिए यह काम करता है तो ज़िम्मेदार नागरिक होने की पहचान है। इस तरह से फ्रांस में हम देखते हैं कि अगर इस्लामी धार्मिक स्वतंत्रता की बात होगी तो फांस की सरकार सोच पर भी अपराधी बना सकती है।

     पेरिस में पुलिस मुख्यालय पर हमले के बाद फ्रांस के गृहमंत्री ने चरमपंथ के कई चिन्हों का उल्लेख किया था जिसे जानना ज़रूरी है। उनके अनुसार एक दूसरे का गाल चूमने से इन्कार, हाथ न मिलाना और सहयोगियों  के साथ मेल जोल न रखना चरमपंथी होने का चिन्ह है!

     लेकिन आज फ्रांस की सरकार महामारी से बचने के लिए खुद इस तरह के व्यवहार से दूर रहने की सिफारिश कर रही है तो क्या फ्रांस की सरकार यह कह रही है कि देश के नागरिक ज़िम्मेदार नागरिक बनने के लिए चरमपंथी बन जाएं? ज़ाहिर सी बात है ऐसा नहीं है। तो अगर सरकार कहे कि हाथ न मिलाओ, एक दूसरे को किस न करो तो ठीक और यह सब करना ज़िम्मेदार नागरिक होने की पहचान है लेकिन अगर कोई फ्रांसीसी नागरिक, अपने धर्म के आदेश पर यह सब करे तो वह चरमपंथी है!!

     क्या वजह है कि स्वास्थ्य नियमों  को मानने से व्यक्ति बेहद ज़िम्मेदार और धर्म आदेश मानने से बेहद गैर ज़िम्मेदार बन जाता है? जबकि धर्म के नियमों के पालन से किसी को तकलीफ भी न पहुंच रही हो?  इनपुट, अलजज़ीरा से  Q.A.

 

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