Aug ०३, २०२० ११:३१ Asia/Kolkata
  • आसमान से ज़मीन पर आता अमेरिका, कई अरब देश दिवालिया होने के लिए हो जाएं तैयार, चीन और रूस का मास्टर प्लान आया सामने!

अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले में सीरिया, लेबनान, ईरान और तुर्की की राष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्यों का नीचे आना, यह वॉशिंग्टन का एक ऐसा आर्थिक हथियार है जो वह अमेरिका विरोधी देशों के ख़िलाफ़ हमेशा से इस्तेमाल करता रहा है। क्योंकि राष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्यों के नीचे आने का संबंध सीधे तौर पर अमेरिका के प्रतिबंधों से है, कि जो उसने ज़्यादातर अरब और मुस्लिम देशों के ऊपर लगा रखा है।

वर्तमान समय में, डॉलर संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए देशों को नीचा दिखाने और सरकारों को अपमानित करने के साथ-साथ अमेरिका-विरोधी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को ध्वस्त करने का एक साधन बन गया है और इस चीज़ ने इससे प्रभावित देशों को इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया देने पर मजबूर कर दिया जो वैश्विक वित्तीय प्रणाली के नष्ट होने का कारण बन रही है। अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को अपने देश की रीढ़ हड्डी बना दिया है। इसीलिए वह चाहता है कि एक वैश्विक वित्तीय प्रणाली का निर्माण हो जिसमें यूरो, पाउण्ड, येन और रूब्ल जैसी मुद्राएं शामिल हों। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व वैश्विक मुद्रा भंडार का 60 प्रतिशत और विदेशी मुद्रा एक्सचेंज का 85 प्रतिशत से अधिक है। जैसा कि जर्मन समाचार एजेंसी डॉयचे वेले की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि डॉलर के टूटने का असर केवल ब्रिक्स और तीसरी दुनिया तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका प्रभाव सीधे यूरोप के दिल पर भी होगा।

इस संबंध में चीन, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने में संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है, वह लगातार डॉलर के प्रभुत्व का समाप्त करने और दुनिया भर की मुद्राओं को एक तनाशाह मुद्रा से आज़ादी दिलाने का प्रयास करता रहा है। इस रिपोर्ट में अमेरिकी डॉलर के पतन के लिए चीन द्वारा बनाई जाने वाली रणनीतियों का उल्लेख किया गया है।

  • चीन की राष्ट्रीय मुद्रा "युआन" को मज़बूत बनाना और उसे विश्व मुद्रा में बदलना और अमेरिकी डॉलर के प्रतिद्वंद्वी के रूप में "पेट्रो-युआन" का निर्यात करना।

 

  • दक्षिण अमेरिका और अफ़्रीक़ा में सोने की खदानों से अधिकतम ख़रीद, जहां चीन का वार्षिक उत्पादन लगभग 500 टन है।

 

  • कागज़ी मुद्रा के विकल्प के रूप में डिजिटल मुद्राओं के निर्यात की तैयारी, जिनका प्रयोग चार देशों में आरंभ हो चुका है कि जिसका आरंभिक परिणाम भी उत्साहजनक था।

 

  • रूस, भारत, ईरान, तुर्की और ब्रिक्स देशों के कुछ सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में वर्ल्ड ट्रेड क्लब की स्थापना। साथ ही पेट्रो-युआन के माध्यम से चीन में तेल अनुबंधों के व्यापार के लिए शंघाई में स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना।

 

  • 100 अरब डॉलर की प्रारंभिक पूंजी के साथ 60 देशों के सदस्य के रूप में एशिया निवेश बैंक की स्थापना।

 

  • सिल्क रोड, जो एशिया से अफ़्रीक़ा होते हुए दक्षिण अमेरिका तक जाएगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन नहीं चाहता है कि डॉलर का प्रभाव पूरी तरह से समाप्त हो जाए, क्योंकि चीन के पास तीन ट्रिलियन डॉलर का अमेरिकी मुद्रा के रूप में बहुत बड़ा भंडार और निवेश है जिसका अधिकतर हिस्सा अमेरिकी बॉन्ड में निवेश किया गया है। इसलिए चीन की इस चरण में रणनीति केवल अमेरिकी डॉलर के मूल्यों को सीमित करना है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी शक्ति और प्रभुत्व को कम करना है। यह वह चीज़ है जिसे वॉशिंग्टन और बीजिंग के बीच तनाव का मुख्य कारण माना जाता है। जानकार इसे चीन और अमेरिका के बीच कोल्ड वॉर का नाम देते हैं। मॉर्गन के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री स्टीफन रोच का कहना है कि अमेरिका के कई बड़े बैंकों की संस्थाओं ने यह संभावना व्यक्त की है कि जारी वर्ष के अंत तक या नए साल के आरंभ में अमेरिकी डॉलर का पतन हो जाएगा। स्टीफन रोच का कहना है कि, इस बात की बहुत संभावना है कि डॉलर के मूल्य में वर्ष 2021 में 35 प्रतिशत तक कमी आ जाएगी। रोच ने इस बात पर बल दिया कि, अमेरिकी समाज में राजनीतिक भावना और स्थानीय विभाजन के मामलों में आई तीव्रता 60 के दशक के बाद से अभूतपूर्व है, साथ ही कोरोना वायरस महामारी से निपटने में मिली असफलता ने अमेरिकी समाज के आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाई है जिसका सीधा असर अमेरिका की अर्थव्यवस्था और डॉरल पर हुआ है।

दुर्भाग्य से, अधिकांश अरब देश, विशेष रूप से फ़ार्स की खाड़ी के देश, जिन्होंने अपनी मुद्राओं को अमेरिकी डॉलर में बदल दिया है और अपने खज़ाने के भंड़ार में इकट्ठा कर रखा है उन्हें सबसे अधिक नुक़सान उठाना पड़ेगा। वैसे रूस और चीन द्वारा डॉलर के ख़िलाफ़ उठाए जा रहे यह क़दम इसलिए भी सही है क्योंकि अमेरिका ने हमेशा से इसका इस्तेमाल अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ एक हथियार के रूप में किया है। सीरिया, लेबनान, ईरान, तुर्की और वेनेज़ोएला जैसे देशों की जनता अमेरिका के आर्थिक आतंकवाद का सबसे ज़्यादा शिकार हुई है। यही कारण है कि आज अमेरिका का दुनिया पर से राजनैतिक, आर्थिक और सैन्य वर्चस्व तेज़ी से कम होता जा रहा है और नई वित्तीय और सुरक्षा प्रणाली तेज़ी से आगे बढ़ती जा रही है। यह एक ऐसा काम है जिससे दुनिया भर के कई ऐसे राष्ट्र जो अमेरिका की तानाशाही की वजह से कठिनाईयां सहन कर रहे थे उनके चेहरे पर सूकून औऱ ख़ुशहाली देखने को मिल रही है। (RZ)

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