Sep ०२, २०२० ११:४१ Asia/Kolkata
  • इब्ने ज़्याद से दरबार में इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब की एतिहासिक बहस!

मुहर्रम की दस तारीख़ को कर्बला में पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों को शहीद कर दिया गया और इमाम हुसैन के कारवां के शेष बचे लोगों को क़ैदी बना लिया गया।

दो दिन बाद 12 मुहर्रम को  यज़ीदी सेना इमाम हुसैन के कारवां के बचे हुए लोगों को साथ लेकर कूफ़ा नगर पहुंची जहां यज़ीद के गवर्नर उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद शासन कर रहा था। 12 मुहर्रम को इमाम हुसैन के कारवां के लोगों को क़ैदियों के रूप में कूफ़ा नगर की गलियों में फिराया गया और 13 मुहर्रम को इब्ने ज़्याद के सामने पेश किया गया।

जब इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब और बेटे इमाम सज्जाद सहित सारे क़ैदी इब्ने ज़्याद के दरबार में पेश किए गए तो इब्ने ज़्याद के सामने एक थाल में इमाम हुसैन का कटा हुआ सर रखा था।

इब्ने ज़्याद की मां का नाम मरजाना था जो अपनी चरित्रहीनता के लिए बहुत बदनाम थी इसलिए वह कभी भी अपने लिए मरजाना का बेटा का शब्द नहीं सुनना चाहता था।

इब्ने ज़्याद ने दरबार में हज़रत ज़ैनब से कहा कि सारी तारीफ़ें उस पालनहार के लिए जिसने तुम्हारे ख़ानदान को अपमानित और क़त्ल किया और साबित कर दिया कि तुम लोग जो कहते थे वह झूठ था। हज़रत ज़ैनब ने जवाब दिया सारी तारीफें ईश्वर के लिए जिसने पैग़म्बरे इस्लाम से जिनका संबंध हमारे ख़ानदान से है हमें सम्मानित किया और हर बुराई से पवित्र रखा। अपमानित पापी होता है और झूठ कुकर्मी बोलता है और कुकर्मी हम नहीं दूसरे लोग हैं। हज़रत ज़ैनब का इशारा ख़ुद उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद की तरफ़ था।

इब्ने ज़्याद ने कहा कि तुमने देखा कि ईश्वर ने तुम्हारे ख़ानदान के साथ क्या किया? हज़रत ज़ैनब ने उत्तर दिया हमने अच्छाई के अलावा कुछ नहीं देखा। हमारे लोग वह थे जिनके लिए ईश्वर ने शहादत लिखी थी और वह ईश्वर के आदेश पर अमल करते हुए अपनी अमर मंज़िल की ओर चले गए बहुत जल्द ईश्वर तुझे उनसे रूबरू कराएगा। वह ईश्वर की बारगाह में तेरी शिकायत और इंसाफ़ की मांग करेंगे तो तू देखना कि उस दिन कौन विजयी होता है। तू मौत के मुंह में चला जाए हे मरजाना के बेटे!

इस बहस से इब्ने ज़्याद ग़ुस्से से पागल हो गया और वह दरबार में हज़रत ज़ैनब की हत्या कर देना चाहता था मगर दरबार के लोगों ने उसे डराया कि इस तरह हालात बिगड़ जाएंगे। इब्ने ज़्याद ने क़ैदियों को जेल में भिजवा दिया जहां वह सात दिन रहे और फिर क़ैदियों को दमिश्क़ की ओर रवाना कर दिया गया.....

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