Sep १०, २०२० १६:३४ Asia/Kolkata
  • 9/11 हमले के इतने वर्षों बाद अमेरिका ने क्या बोया क्या काटा? सच का आइना दिखाती रिपोर्ट, फ़ैसला आपका

9/11 की घटना को लगभग दो दशक का समय बीत रहा है। यहां सवाल यह पैदा होता है कि इन दो दशकों में अमेरिकी राजनीति में क्या-क्या बदलाव आए और इसका दुनिया सहित विशेषकर पश्चिमी एशिया पर क्या असर पड़ा है?

11 सितंबर की घटना को 11 वर्षों का समय बीत रहा है और साथ ही अमेरिका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर किए गए हमले को भी इतने ही साल गुज़र रहे हैं। यह हमले एक निर्धारित लक्ष्य को सामने रखकर शुरू किए गए थे। इसलिए ज़रूरी है कि अमेरिका द्वारा थोपे गए युद्ध और उसके द्वारा फैलाई गई नफ़रतों के बारे में इतने साल गुज़रने के बाद समीक्षा की जाए। अमेरिका ने कुछ युद्धों को सीधे तौर पर शुरू किया है या यह कि कुछ युद्धों का उसके द्वारा समर्थन किया गया है। लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि हम समीक्षा करें और यह मालूम करें कि दुनिया और विशेषकर पश्चिमी एशिया में अमेरिका द्वारा जो युद्ध और आतंकवाद का बीच बोया गया है उससे उसने क्या पाया है।

अमेरिका का सैन्य ख़र्च

अमेरिका ने 11 सितंबर की घटना के बाद कई युद्ध छेड़े, जिनमें अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ का युद्ध सबसे ऊपर है। डोनल्ड ट्रम्प के अनुसार, इन युद्धों के कारण अमेरिका को 7 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ा है। ब्राउन यूनिवर्सिटी के वाटसन इंस्टीट्यूट ने अपने एक शोध में इस बात का एलान किया है कि 11 सितंबर 2001 से वित्तीय वर्ष 2020 तक की गई जांच में सामने आया है कि अमेरिका ने इन वर्षों के दौरान 6 ट्रिलियन 400 अरब डॉलर की लागत लगाई है।

अमेरिकी युद्ध से होने वाली क्षति

प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, इतने वर्षों के युद्ध में विशेषकर अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, पाकिस्तान, सीरिया और यमन में कम से कम 8 लाख लोगों की जान जा चुकी है जबकि यह स्वभाविक है कि घायल होने वालों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा होगी। लगभग 5 लाख 70 हज़ार लोग केवल अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और पाकिस्तान में ही मारे गए हैं। इसी तरह अब तक 84 लाख अफ़ग़ानी, पाकिस्तानी और इराक़ी अपना देश और अपना घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं और अब दुनिया के अलग-अलग देशों में शरणार्थी के तौर पर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी तरह इन युद्धों में लगभग 7 हज़ार अमेरिकी सैनिक भी मारे गए हैं। इसके अलावा लगभग 8 हज़ार अमेरिकी एजेंट भी मारे गए हैं। वहीं सैकड़ों मरने वाले ऐसे लोग भी जो युद्ध में घायल हुए थे और बाद में उसी की वजह से उनकी मौत हो गई, जबकि घायलों की संख्या लाखों में है। ऐसे ही 1 लाख 10 हज़ार से अधिक गठबंधन के सैनिक, इराक़ी और अफ़ग़ानी पुलिसकर्मी भी हताहत हुए हैं।

तबाही और आतंकवाद, युद्धग्रस्त देशों के लिए अमेरिकी विरासत

अमेरिका द्वारा इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान सहित अन्य देशों पर किए गए हमले और थोपे गए युद्ध से इन सभी देशों और क्षेत्रों को केवल अशांति, तबाही और राजनीतिक संकट के अलावा कुछ नहीं प्राप्त हो सका है। इन देशों में अमेरिकी की उपस्थिति और जनता की भागीदारी का न होना इस बात का कारण बना कि यह सभी देश आज भी अशांति, तबाही और राजनीतिक संकट से जूझ रहे हैं। इसी तरह अमेरिका ने इन युद्धों में होने वाले ख़र्चों का जो हिसाब लगाया है वह केवल वही किया है जो उनकी जेब से ख़र्च हुआ है, क्योंकि जिन देशों पर युद्ध थोपे गए हैं उन देशों का इन युद्धों में कितना ख़र्च हुआ है और उनकी क्या लागत आई है अभी तक उसका कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है। विशेषकर अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में जहां इंसानी जानों का भारी नुक़सान हुआ है वहीं इन देशों को आर्थिक और स्ट्रैटेजिक भी उतनी ही क्षति पहुंची है। इसी तरह अमेरिका द्वारा थोपे गए युद्ध के कारण लाखों की संख्या में ऐसे भी बच्चे हैं जिनका भविष्य अंधेरे में चला गया है और उनके स्वास्थ्य और स्वच्छता को भारी ख़तरे का सामना है।

कभी न समाप्त होने वाला अमेरिकी युद्ध

अफ़ग़ानिस्तान

अमेरिका ने अपने अस्तित्व के अधिकांश वर्षों को केवल युद्ध लड़ने और युद्ध भड़काने में बिताए हैं। 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अमेरिका ने आतंकवाद से युद्ध के बहाने कई देशों पर हमला किया। 2001 में ही अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया। अफ़ग़ानिस्तान युद्ध आज तक जारी है और अब अफ़ग़ानिस्तान युद्ध अमेरिका के लिए एक दलदल परिवर्तित हो गया है।

इराक़

वर्ष 2003 में अमेरिका ने इराक़ में सामूहिक विनाश के हथियारों के होने का बहाना बनाकर इस देश पर युद्ध थोपा था, लेकिन ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था कि उसका झूठ पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ गया था। यही कारण है कि अमेरिका को इराक़ पर युद्ध थोपने को लेकर काफ़ी बदनामी उठानी पड़ी थी। वैसे तो नाम के लिए इराक़ युद्ध वर्ष 2011 को समाप्त हो गया था, लेकिन इसके बावजूद आज तक इराक़ में अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। विशेषकर वर्ष 2014 में दाइश से मुक़ाबले का बहाना बनाकर उसने दोबारा इराक़ अपने सैनिक भेजे थे।

पाकिस्तान

अमेरिका ने आतंकवाद से मुक़ाबले का बहाना बनाकर वर्ष 2004 के बाद से अब तक कई बार पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में हमले किए हैं। ज़्यादातर यह हमले ड्रोन के द्वारा किए गए हैं।

सोमालिया

अमेरिका ने एक बार फिर आतंकवाद से मुक़ाबले का बहाना बनाकर सोमालिया में जारी गृह युद्ध में फांद गया। इस देश में भी ज़्यादातर अमेरिका द्वारा किया जाने वाला हमला ड्रोन से किया गया है या फिर अमेरिका के विशेष बलों द्वारा। अमेरिका के अलावा कई अन्य आफ़्रीक़ाई एवं ब्रिटेन भी इस युद्ध में शामिल है, जो अभी तक जारी है।

लीबिया

लीबिया भी उन देशों में शामिल है कि जिसपर अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों और नाटो की आड़ में इसपर हमला किया है। युद्ध के आरंभ में अमेरिका और उसके सहयोगी यह दावा कर रहे थे कि वह लीबिया को लोकतंत्र का तोहफ़ा देना चाहते हैं, लेकिन हुआ बिल्कुल उसके विपरीत अन्य देशों की तरह लीबिया आज आग में जल रहा है और इस देश में राजनीतिक संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। इस बीच अमेरिका ने 2011 से 2017 तक यूगांडा में भी अपने सैनिक भेजे थे।

सीरिया

अमेरिका ने अपने सहयोगियों और आतंकवादी गुटों की मदद से सीरिया में गृह युद्ध का आग भड़काई और उसके जारी रहने पर समर्थन किया। अमेरिका ने सीरिया की क़ानूनी सरकार की बिना इजाज़त के वर्ष 2014 से इस देश के कुछ भागों पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया, यहां तक की वह इस देश के यात्री विमानों को भी कई बार नुक़सान पहुंचाने का प्रयास किया है। हाल ही में अमेरिकी सैनिकों ने ईरान की विमान कंपनी महान एयर के यात्री विमान को इसी तरह के ख़तरे में डाला था। अमेरिका का हस्तक्षेप ही है कि आज सीरिया अशांति है और इस देश में भारी तबाही हुई है।

यमन

यमन युद्ध भी अमेरिका के ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद सऊदी अरब और उसके गठबंधन द्वारा शुरू किया गया है। यमन युद्ध में जहां हज़ारों बेगुनाह लोगों की जान गई है वहीं इस देश का मूलभूत ढांचा पूरी तरह तबाह हो गया है। मरने वालों में ज़्यादातर बच्चे और महिलाएं शामिल हैं।

आतंकवाद और कट्टरवाद

अमरिका की कथित आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध नीति ने पश्चिमी एशिया सहित दुनिया के कई देशों में युद्ध थोप दिया है। इन युद्धों से न केवल आतंकवाद का अंत नहीं हुआ बल्कि आतंकवाद और ज़्यादा फल-फूल गया। अगर अमेरिका की आतंकवाद के ख़िलाफ़ कथित तौर पर चलाए गए अभियान की गहन तरीक़े से जांच की जाए तो यह बात सामने आएगी कि आज दुनिया में फैलता आतंकवाद और सिर उठाता कट्टरवाद अमेरिका की इस नीति का ही नतीजा है। तकफ़ीरी आतंकवादी गुट दाइश कि जिसका बहाना बनाकर अमेरिका ने हालिया वर्षों में कई देशों पर हमला किया है। स्वयं उसके बारे में वर्तमान के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने वर्ष 2016 में अपने चुनावी अभियान के समय यह बात कही थी कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने ही दाइश को अस्तित्व दिया है। ट्रम्प ने कहा था कि “ओबामा और क्लिंटन दोनों झूठे हैं, यह वहीं लोग हैं जिन्होंने दाइश को अस्तित्व दिया है, हिलेरी क्लिंटन ने ओबामा के साथ मिलकर दाइश को बनाया है”

कुल मिलाकर दुनिया भर के टीकाकारों, जानकारों और राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो आज दुनिया के ज़्यादातर देशों विशेषकर पश्चिमी एशिया में फैली अशांति और बढ़ते आतंकवाद को अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वह अमेरिका और उसकी कथित आतंकवाद से मुक़ाबले के लिए बनाई गई नीति है। युद्ध ग्रस्त और युद्ध की आंच से तपने वाले देशों की समीक्षा करने से पता चलता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका जहां अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है वहीं न तो राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में और न ही आर्थिक और सुरक्षा क्षेत्रों में उसके हाथ कोई सफलता लगी है। 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद उसके द्वारा थोपे गए युद्ध का उद्देश्य केवल अपनी विश्व शक्ति और प्रभुत्व का विस्तार करना ही था। दो दशक बीत जाने के बाद अमेरिका की स्थिति पर अगर ग़ौर किया जाए तो हम पाएंगे कि आज अमेरिका उसी गड्ढे में दफ़्न होता जा रहा है जो उसने दूसरों के लिए खोदा था। (RZ)

 

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