Oct २७, २०२० १०:५१ Asia/Kolkata
  • मैक्रां का शुक्रिया जिन्होंने इन कठिन हालात में इस्लामी जगत को एकजुट कर दिया..जवाबी हमले में तीन देश क्यों सबसे आगे और सऊदी अरब क्यों ग़ायब है?

जब ईरान, तुर्की और पाकिस्तान मुसलमानों और उनकी आस्थाओं पर फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां के भारी प्रहार के ख़िलाफ़ एकजुट हो गए जिनकी कुल आबादी इस्लामी जगत की आबादी का एक तिहाई हिस्सा है, तो इसका मतलब यह है कि मैक्रां की विचारधारा और बेलगाम ज़बान के विध्वंसकारी परिणाम सामने आने लगे हैं जिसका असर केवल फ़्रांस नहीं बल्कि पूरे यूरोप पर पड़ेगा। यही नहीं इससे सलीबी जंगों की शुरुआत का रास्ता तैयार होगा।

पैग़म्बरे इस्लाम के अनादर पर आधारित कार्टूनों का समर्थन करके फ़्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रां नफ़रत के प्रतीक बन गए हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान ने अपने देश की आठ करोड़ जनता से अपील की है कि फ़्रांसीसी उत्पादों का बहिष्कार करें। पाकिस्तान की धार्मिक संस्थाओं ने फ़्रांसीसी उत्पाद को हराम घोषित कर दिया है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली शमख़ानी ने कहा कि मैक्रां का बयान उनकी राजनैतिक अज्ञानता का चिन्ह है।

यह दुख की बात है कि जहां एक ओर सारे शीया सुन्नी संगठन, संस्थाएं और नेता फ़्रासीसी राष्ट्रपति की ओर से होने वाले हमले का जवाब दे रहे हैं वहीं अरब नेताओं का दूर दूर तक कुछ पता ही नहीं कि कहां ग़ाएब हो गए हैं। विशेष रूप से सऊदी अरब की ख़ामोशी बहुत हैरत अंगेज़ है जो मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थलों का मेज़बान है। इसी तरह फ़ार्स खाड़ी के दूसरे अरब देश भी ख़ामोश हैं।

मैक्रां की राजनैतिक जेहालत की दलील यह है कि उन्होंने पलक झपकते एक बयान दाग़ कर अपने कट्टर विरोधी तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान को सुनहरी मौक़ा दे दिया जिन्होंने साहसिक स्टैंड लेकर पूरे इस्लामी जगत का समर्थन हासिल कर लिया।

फ्रांस जो कोरोना वायरस की महामारी के कारण बेहद कठिन आर्थिक हालात से गुज़र रहा है जहां रोज़ाना 50 हज़ार से अधिक नए केस सामने  आ रहे  हैं उसके राष्ट्रपति एक बयान देकर दो अरब मुसलमानों की दुशमनी मोल ले लेते हैं।

कुवैत जैसे देशों में शापिंग माल्ज़ की शेल्फ़ फ्रांसीसी उत्पादों से ख़ाली हो गई हैं और इस्तांबूल जैसे शहरों में फ्रांस की बनी गाड़ियों की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस्लामी जगत के स्तर पर इस तरह की अनगिनत मिसालें हैं जिन्हें यहां बयान कर पाना संभव नहीं है। इससे पता चलता है कि मैक्रां कितने परले दरजे के मूर्ख इंसान हैं।

मोरीतानिया, मोरक्को, अलजीरिया, ट्यूनीशिया और लीबिया में तो फ़्रांस के खिलाफ़ बाक़ायदा आंदोलन शुरू हो गया है। वहां केवल फ्रांसीसी उत्पादों का बहिष्कार नहीं हुआ बल्कि कई सम्मेलन कैंसिल कर दिए गए, जगह जगह फ्रांस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए।

फ्रांस में ज़ायोनियों की लाबी इन दिनों बहुत ख़ुश थी कि उसने कई अरब देशों को इस्राईल से शांति समझौते पर मजबूर कर दिया। इसी लाबी ने मैक्रां को आपत्तिजनक बयान देने के लिए उकसाया है और पूरे फ़्रांसीसी समाज को गंभीर संकट में झोंक दिया है।

मैक्रां के विरोध का मतलब मुसलमान युवा के हाथों फ्रांसीसी शिक्षक सैमुएल बाटी की निर्मम हत्या का समर्थन करना हरगिज़ नहीं है। हम भाईचारे के साथ जीवन गुज़ारने के पक्षधर हैं। मगर फ्रांस  में मुसलमानों और प्रवासियों के साथ जिस तरह का बेरहमी वाला बर्ताव किया जाता है और उन्हें हाशिए पर रखा जाता है वह भी फ्रांसीसी शिक्षक की हत्या से कम गंभीर अपराध नहीं है। इन्हीं अपराधों के क्रम में एक घटना हाल ही में हुई कि एफ़ेल टावर के क़रीब दो मुस्लिम महिलाओं पर चाक़ू से हमला किया गया।

अभिव्यक्तित की आज़ादी का यह मतलब नहीं है कि दो अरब मुसलमानों की भावनाओं को आहत करने की छूट दे दी जाए। इस प्रकार की ख़तरनाक नीति फ़्रांस के लिए विनाशकारी साबित होगी जो ख़ुद को प्रकाश का देश और सहनशीलता व समानता के कल्चर का केन्द्र कहता है।

स्रोतः रायुल यौम

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