Oct २७, २०२० २१:२२ Asia/Kolkata
  • जर्मनी का दोग़ला रवैयाः पैग़म्बर का अनादर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मैक्रां को दिमाग़ का इलाज करने की नसीहत, बर्दाश्त नहीं!

जर्मन सरकार ने फ़्रान्स के राष्ट्रपति की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अनादर को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया है लेकिन अर्दोग़ान की ओर से मैक्रां को मानसिक स्वास्थ्य का टेस्ट देने की नसीहत को अस्वीकार्य बताया है।

फ़्रान्स के राष्ट्रपति अमानोएल मैक्रां के इस्लाम विरोधी रुख़ और उनकी ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अपमानजनक कार्टूनों के प्रकाशन के समर्थन के बाद तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान ने कहा था कि मुसलमानों के संबंध में अपनी नीतियों की वजह से मैक्रां को मानसिक टेस्ट देने की ज़रूरत है। मैक्रां के इस्लाम विरोधी रुख़ की वजह से पूरी दुनिया के मुसलमानों में फ़्रान्स के ख़िलाफ़ भावनाएं भड़क उठी हैं और फ़्रान्सीसी वस्तुओं की बहिष्कार की कैम्पेन शुरू हो गई है। तुर्की के राष्ट्रपति ने भी फ़्रान्स की वस्तुओं के बाॅयकाॅट की अपील की है।

 

मैक्रां द्वारा इस्लामी मान्यताओं के अनादर पर तुर्क राष्ट्रपति के बयान को बीबीसी व फ़्रान्स-24 जैसे पश्चिमी संचार माध्यमों ने मुसमानों की प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए केवल अन्कारा व पेरिस के बीच तनाव बढ़ने के रूप में पेश किया लेकिन पश्चिम ने इस बयान पर जो प्रतिक्रिया दिखाई है वह उसके दोग़लेपन की परिचायक है। उदाहरण स्वरूप फ़्रान्स सरकार ने फ़्रान्सीसी वस्तुओं के बहिष्कार की कैम्पेन शुरू होने के बाद अरब देशों से अपील की है कि वे बाॅयकाॅट की इस लहर को रोकें और इस तरह के व्यवहार का ख़ात्मा करें। फ़्रान्स के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में दावा किया है कि यह निराधार कैम्पेन एक चरमपंथी अल्पसंख्यक गुट की ओर से शुरू की गई है। यह दावा ठीक फ़्रान्स के राष्ट्रपति द्वारा इस्लामी मान्यताओं के अनादर की तरह है जिन्होंने चरमपंथी गुटों से निपटने के बजाए इस्लाम और फ़्रान्स के इस्लामी समाज को निशाना बनाया और दावा किया कि अल्पसंख्यक मुसलमान, एक समानांतर समाज बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

 

फ़्रान्स के राष्ट्रपति से पूछना चाहिए कि क्या फ़्रान्स में रहने वाले सभी मुसलमान और इसी तरह दुनिया के सभी मुसलमान चरमपंथी हैं जो वे इस तरह चिंता प्रकट कर रहे हैं और इस्लाम का अनादर कर रहे हैं? या एक-दो चरमपंथी गुट हैं जो इस तरह की हरकतें करते हैं और यह भी स्पष्ट है कि उनका वैचारिक व आर्थिक पोषण कहां से होता है? क्या मैक्रां की नीतियां यह नहीं दर्शातीं कि इस्लाम के बारे में मैक्रां व अन्य पश्चिमी नेताओं में वैचारिक ग़लतियां पाई जाती हैं वे स्वयं इस्लाम ही को चरमपंथ का स्रोत समझते हैं और इसी कारण उन्होंने इस्लाम को लक्ष्य बना रखा है? जैसा कि जाॅर्ज बुश जूनियर ने 9/11 की संदिग्ध घटना के बाद मुसलमानों को आतंकवादी बताया था और इस्लामोफ़ोबिया की एक नई लहर शुरू कर दी थी। इसके बाद उन्होंने आतंकवाद से युद्ध के नाम पर अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर चढ़ाई कर दी थी।

 

शायद मैक्रां और पश्चिम में उनके जैसे विचार रखने वाले वास्तविक इस्लाम और दुनिया के लगभग दो अरब मुसलमानों और कुछ चरमपंथी व तकफ़ीरी गुटों के बीच के अंतर को अच्छी तरह समझते हैं और इस्लाम के बारे में सही सोच उनकी समस्या नहीं है लेकिन उन्हें यह चिंता खाए जा रही है कि अमरीका के पतन और इसके परिणाम स्वरूप दुनिया से लिब्रलिज़म के ख़ात्मे के बाद दुनिया में कहीं इस्लाम का बोल-बाला न हो जाए। अगर इस्लाम चरमपंथी धर्म है और सभी मुसलमान चरमपंथी हैं तो फिर दाइश जैसे आतंकी गुट ने क्यों इराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और दुनिया के अन्य स्थानों पर दसियों हज़ार मुसलमानों को शहीद कर दिया? और क्यों इन आतंकी गुटों को पश्चिमी देशों की इंटेलीजेंस एजेंसियों का समर्थन हासिल है? और क्यों पश्चिम अब भी सीरिया के इदलिब में बाक़ी बचे इन आतंकियों को ख़त्म करने की अनुमति नहीं दे रहा है बल्कि इनका समर्थन कर रहा है? क्या इन सब सवालों का इसके अलावा कोई और जवाब है कि पश्चिम ने इन चरमपंथी व तकफ़ीरी गुटों को अस्तित्व प्रदान किया है और सऊदी अरब जैसे रुढ़िवादी सरकारों का समर्थन करके पूरी दुनिया में इस्लामोफ़ोबिया फैलाने की कोशिश की है ताकि इस्लामी सभ्यता को नाकाम बनाया जा सके?

 

पश्चिमी सरकारों का यह दोग़लापन, मैक्रां के बारे में अर्दोग़ान के बयान पर जर्मन सरकार की प्रतिक्रिया में भी देखा जा सकता है। जर्मन सरकार इस्लामी मान्यताओं और दुनिया के लगभग दो अरब मुसलमानों के अनादर को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर सही ठहराती है लेकिन अर्दोग़ान की ओर से मैक्रां को दी गई नसीहत को अस्वीकार्य कहती है। जर्मन सरकार के प्रवक्ता स्टीफ़न ज़ायबर्ट ने कहा कि अर्दोग़ान का बयान अस्वीकार्य है। दूसरी ओर जर्मनी के विदेश मंत्री हाइको मास ने कहा है कि मैक्रां का रुख़ समझ में आने वाला है। उन्होंने इसी के साथ मैक्रां के संबंध में अर्दोग़ान के बयान को अस्वीकार्य बताया। स्पषट है कि हाइको मास मैक्रां की नीति को इस दृष्टि से समझने योग्य बता रहे हैं कि जर्मनी में भी दसियों लाख मुसलमान रहते हैं और वे पश्चिम की पतन की ओर बढ़ रही संस्कृति में घुलने-मिलने के बजाए नई सभ्यता बना सकते हैं। इस लिए यह बात विचित्र नहीं है कि वे मैक्रां का समर्थन कर रहे हैं लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि क्यों वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मैक्रां को तो यह अधिकार देते हैं कि वे अपना गंदा मुंह खोल कर इस्लाम के बारे में कुछ भी कहते रहें और दुनिया के सभी मुसलमानों का अनादर करें लेकिन अर्दोग़ान की ओर से मैक्रां को मानसिक संतुलन का टेस्ट देने की नसीहत को अस्वीकार्य कहते हैं? (HN)

 

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